Books Authored By – Swami Buddh Puri Ji

A Handbook to Siddhamrit Surya Kriya Yoga
SSKYoga is an incomparable boon for any spiritual aspirant as the practice performed for spiritual attainment also cures physical ailments and strengthens mental faculties, which has been experienced by thousands of people worldwide. This book talks about the philosophy, the practice and whole lot of frequently asked questions.

Surya Kriya: The Pathway to Immortality
The present book is about ‘Physical Immortality’. This concept has been in vogue since ancient times. Yet, this is a novel book which resurrects the practical aspects of this concept lost in the whirls of time. Prior to this, such practices had existed, but only within the hearts of ancient adepts. This book has been especially written for all those people who do not wish to confine within themselves their inherent desire for Immortality and their desire to be free from maladies, old age and death. This book shall bust up many misconceptions and will really inspire a seeker to set foot on the path of Physical Immortality.
Sanjivani Kriya (Esoteric Science of Pranayam)
This book discusses the 1st level of Sanjivani Kriya that revitalizes our body & revivify our mind by upgrading our normal breathing into complete yogic breath. As we progress, pranayama happens in every breath that keeps us connected with the source of life, all the time.

An ultimate & rare creation – Human body ‘Arena of God’s play’
The whole creation is manifested in the so called mortal physical human form -the body- measuring just a few feet. This manifestation is unique in its own way- obvious, but concealed. Exploration of the esoteric secrets of human form, is the simplest path for exploration of the universe, and beyond. The Mahasadhana of permeating even the grossness and mortality with the nectar of blissful consciousness is possible only in the human body. This book is a treasure of guidance for the sincere seekers, desirous of venturing on to the supreme path of this most exalted Mahasadhana.

कुण्ड अग्नि शिखा
यह त्रैमासिक पत्रिका, हिन्दी वा पंजाबी में अक्टूबर 2001 से लगातार प्रकाशित होती रही थी। इसमें जपुजी साहिब की व्याख्या, सिद्ध सन्तों के साधना जीवन की चर्चा के अलावा गम्भीर साधना रहस्यों को सरल एवं वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। सफल जीवन जीने के तरीके, प्रेरणादायक बोध कथायें और साधकों की जिज्ञासाओं के समाधान भी इसमें दिये गये हैं।

सिद्धामृत सूर्य क्रियायोग
सूर्य जीवन का आधार है, यह एक अटल सत्य है, जिसे धर्मशास्त्र ही नहीं विज्ञान भी मानता है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने सामान्य रोगों में ही नहीं वरन् कैंसर, ओस्टियोपोरोसिस, मल्टीपल स्क्लैरोसिस, पक्षाघात एवं हृदय रोग जैसी अनेक जटिल समस्याओं तथा डिप्रेशन आदि मनोरोगों में भी सूर्य किरणों के द्वारा उपचार करने में सफलता प्राप्त की है। आरोग्य के साथ ध्यान-साधना का आधार भी सनातन परम्परा में सूर्य को माना गया है। यह पुस्तक उन प्राचीन सिद्धान्तों, नवीन प्रयोगों, सूर्य से रोग निवारण की प्रक्रिया तथा साधना विधि की कुंजी है।
संजीवनी क्रिया (प्राणायाम का प्रामाणिक विज्ञान)
यह तो सभी जानते हैं कि श्वास है तो जीवन है और इसीलिये योग का प्रचार होने के बाद घर-घर में प्राणायाम शुरू हो गया, लेकिन अनेक लोगों को इससे लाभ होने के स्थान पर कष्ट हो गया, कुछ तो रोगी भी हो गये। आश्चर्य है कि अनेक प्राणायाम कराने वाले भी रोगी और स्थूलकाय बने हुये हैं, जबकि प्राणायाम का लक्षण ही है, शरीर का हल्का और स्फूर्तिवान होना। कारण- श्वास के विज्ञान का पता न होना। संजीवनी क्रिया हमें उस विज्ञान से परिचित कराती है और अत्यन्त सहज ढंग से, जिसे बच्चा-बूढ़ा-रोगी कोई भी कर सकता है, हमें अपने शरीर में प्राण का संचार करना सिखाती है। इसके साथ-साथ बैठने, खड़े होने, चलने आदि का सही तरीका तथा आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों को स्वस्थ रखने वाली अनेक सूक्ष्म क्रियायें सिखाती है।

अग्नि क्रिया योग (यज्ञ से कुण्डलिनी जागरण)
अग्नि को देवताओं का मुख कहा गया है, उसके माध्यम से हम किसी भी देवी-देवता तक अपनी प्रार्थना पहुँचा सकते हैं और उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं। प्राय: सुनते-पढ़ते ही हैं कि प्राचीन काल में वर्षा के लिये, सन्तान के लिये और सभी कामनाओं की पूर्ति हेतु यज्ञ किये जाते थे एवं फल भी प्राप्त होता था। यज्ञ तो आज भी होते हैं किन्तु प्राय: निष्फल, क्यों? क्योंकि यज्ञदेव से सम्बन्ध नहीं जुड़ता, शरीर के भीतर कुण्डलिनी-अग्नि जागरण नहीं होता। यह पुस्तक हमें वे सारे सिद्धांत और विधि बताती है।

श्रीयन्त्र की चमत्कारी साधना और त्रिपुर शिवा पीठम्
श्रीयन्त्र साधना को प्राय: अत्यन्त शक्तिशाली किन्तु रहस्यमयी और जटिल माना जाता है। महायोगी स्वामी बुद्ध पुरी जी ने शास्त्रों में वर्णित श्रीविद्या के रहस्यों को साधना द्वारा प्रत्यक्ष करके अपने अनुभूत ज्ञान को जिज्ञासुओं की प्रेरणा के लिये इस पुस्तक में अत्यन्त सरल एवं सहज रूप में प्रस्तुत किया है। श्रीयन्त्र-निर्माण की जटिल विधि तथा उपासना की विधियों एवं मन्त्रों को भी अत्यन्त रोचक एवं सरल रूप में प्रस्तुत किया है। किसी भी साधक के लिये यह एक अनमोल ग्रन्थ है।

एक जाग्रत महायोग परम्परा
भारत भूमि मुनियों की भूमि है, किन्तु काल के प्रभाव से प्राय: अधिकांश साधना परम्परायें लुप्त-गुप्त होती जा रही हैं। मानव समाज के उत्थान के लिये सर्वस्व समर्पण तो दूर की बात है, भौतिक चकाचौंध से भरे इस युग में निज मुक्ति का प्रयास करने वाले भी अल्प ही हैं। फिर भी इसी कलियुग से सत्ययुग का जन्म होना है और इसके लिये कहीं-कहीं सन्त-महापुरुष प्राण-प्रण से युग परिवर्तन की महायोग साधनाओं में जुटे हुये हैं। ऐसी ही एक जाग्रत परम्परा के तीन महायोगियों, मृत्युञ्जयी स्वामी मेवापुरी जी, युगावतार स्वामी देवपुरी जी ‘काली कम्बली वाले’ और परमहंस स्वामी दयालुपुरी जी के दिव्य साधना जीवन की कुछ झलकियाँ जिज्ञासुओं की प्रेरणा हेतु इस पुस्तक में प्रस्तुत हैं।

अगम्य साधना स्थल: सतोपन्थ
यह सत्य गाथा है बद्रीनाथ धाम से 25 कि.मी. दूर, लगभग 14000 फीट की ऊँचाई पर स्थित दिव्य स्थली सतोपन्थ की अभूतपूर्व दुर्गम यात्रा तथा एक मास चली अलौकिक साधना की। एकादशी की मंगलमयी बेला में महाशक्ति विष्णु का साक्षात् रोमांचकारी अवतरण तथा साधकों की अलौकिक स्थिति किसी भी जिज्ञासु के मन को झकझोर कर रख देती है।

अमृतानुभव
महायोगी स्वामी बुद्ध पुरी जी के जप यज्ञ सम्बन्धी प्रवचनों का यह अनमोल संग्रह किसी भी जिज्ञासु के लिये महान मार्गदर्शन है। नाम की महिमा, नाम जप द्वारा शक्ति जागरण और जाप की विभिन्न विधियों तथा स्तरों का गूढ़ विवेचन, युक्तियों और शास्त्र प्रमाणों के साथ अनुभवपूर्ण इतनी सरल भाषा में दिया गया है कि कोई भी साधक सहज ही प्रेरणा और मार्गदर्शन ले सकता है।

ज्ञानामृत (काव्यग्रन्थ)
जब तन-मन पूर्णत: प्रभु प्रेम में रंगे जाते हैं तो दिव्य प्रेम रस का दरिया स्वाभाविक ही वाणी के माध्यम से छलकने लगता है। श्री महाराज जी के बद्रीनाथ धाम में एक वर्ष के गुफावास के समय प्रभु की ऐसी ही कृपा हुयी। इस कृपा प्रसाद को ही, जिसमें आम जीवन को साधनामय बनाने के स्वर्णिम सूत्र दिये हुये हैं, पुस्तक रूप में प्रकाशित किया गया है।

बोध कथायें
कथा-कहानियाँ मात्र बाल-मनोरंजन का साधन नहीं वरन् चरित्र निर्माण का आधार हैं। इसी तथ्य को प्रमाणित करते हुये मुनियों ने परमात्म तत्त्व विषयक गूढ़ वेद-ज्ञान को सरस एवं सरल पुराण कथाओं के रूप में जनसामान्य में प्रचारित किया जो कि निज बोध के जागरण की प्रेरणा रूप में आप सबके समक्ष इस पुस्तक में प्रस्तुत है।

पत्रालोक
प्राय: गृहस्थ साधकों के लिये सदा गुरु चरणों में निवास अथवा बार-बार मिलन सक्वभव नहीं किन्तु बिना मार्गदर्शन के साधन पथ पर बढऩा भी असम्भव है। यह दूरी पत्रों के माध्यम से मिटाई जा सकती है। इस पुस्तक में ऐसे ही कुछ पत्रों के श्री महाराज जी (महायोगी स्वामी बुद्ध पुरी जी) द्वारा लिखे गये कृपा पूर्ण उत्तरों को सर्वसामान्य के कल्याण हेतु दिया गया है। श्री महाराज जी के गुरु स्वामी दयालुपुरी जी के मार्गदर्शक दुर्लभ पत्रों का संग्रह भी दो भागों में पत्रावली के नाम से उपलब्ध है।

गुरुदेव चरितावली
सन्तों का चरित्र सदा ही भक्तों को सन्मार्ग पर चलाने में सहायक होता है। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु स्वामी दयालुपुरी जी द्वारा अत्यन्त मनोहारी भाषा एवं अलंकारिक शैली में रचित प्रभु कम्बली वालों का जीवन चरित प्रस्तुत किया गया है। कालान्तर में उनके परम भक्त डा. लक्ष्मण दास सद्दी ‘पिताजी’ द्वारा परम वेदज्ञ स्वामी दयालुपुरी जी का जीवन चरित भी (दो भागों में) श्री गुरुदेव चरितावली नाम से प्रकाशित हुआ।

साधना सूत्र
यथा नाम तथा गुण के आधार पर इस पुस्तिका में परम पूज्य स्वामी बुद्ध पुरी जी के प्रवचनों से साधना सम्बन्धी प्रायोगिक सूत्रों का संकलन किया गया है। जिज्ञासुजन निस्संदेह इन सूत्रों का प्रयोग करके अपने जीवन को निर्मल, आध्यात्मिक रूप से प्रगतिशील, सुखी तथा स्वस्थ बना सकते हैं।

सुदुर्लभ मानव तन (हिन्दी वा पंजाबी वा अंग्रेज़ी)
साढ़े तीन हाथ के मानव पिण्ड में, गुप्त-प्रकट रूप में सारा ब्रह्माण्ड ही समाया हुआ है। यदि ब्रह्माण्ड के रहस्यों की खोज करनी है तो मानव पिण्ड के रहस्यों की खोज ही सीधा पथ है। दुर्लभ मानव तन को, परमेश्वरी महाशक्ति की क्रीड़ास्थली बनाकर, आनन्दधाम में रूपान्तरित करने की महासाधना के इस संक्षिप्त विवरण से जिज्ञासु सुधीजन स्वानुभव-आधारित क्रमानुसार-वर्णित मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।

भजनामृत (पंजाबी)
महायोगी स्वामी बुद्ध पुरी जी समय पाकर संगीत साधना विषयक अनेक प्रयोग करते रहते हैं, जिनमें सात सप्तकों में स्वर विस्तार भी शामिल है। उनके अनुसार संगीत को साधना बनाने के लिये उसे अन्तर्निहित भगवान के अर्पण करना होगा। श्री महाराज जी द्वारा रचित भजनों का यह संग्रह है।

चिंगार तों ब्रह्मज्योति (पंजाबी)
परमब्रह्म परमात्मा ने सृष्टि के विस्तार हेतु बीजरूप से अपने ही अंश को इस सृष्टि में प्रसारित कर दिया। इस बीजरूपी चिंगार को पूर्ण ब्रह्मज्योति के रूप में कैसे पुनर्प्रकाशित करना है, इसकी खोज में धर्म और विज्ञान सदियों से लगे हुये हैं। सृष्टि के रहस्य की सारभरी विवेचना तथा उस पर विजय पाने के जप, तप, भक्ति, ज्ञान, सेवा, योग आदि अनेकानेक साधनों का सूक्ष्म विश्लेषण ही इस वृहद् ग्रन्थ की विषयवस्तु है।

कलियुग सर्वश्रेष्ठ है – क्यों? कैसे?
सृष्टि में चार युग —सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग— एक चक्र में चलते हैं। सत्ययुग में धर्म अपनी पूर्णता पर होता है, और हर अगले युग में धर्म का थोड़ा-थोड़ा ह्रास होता जाता है। कलियुग में अधर्म अपने चरम पर पहुँच जाता है। कलियुग की विशेषता यह है कि यहाँ थोड़ी साधना से भी बड़ा फल मिलता है। इसीलिये शास्त्र कहते हैं कि कलियुग सर्वश्रेष्ठ है — क्योंकि यहाँ आत्म-जागरण का अवसर सबसे सुलभ है।

व्याख्या श्री जपुजी साहिब- साधना भाष (पंजाबी)
कई वर्षों तक पंजाबी अखबार जगबाणी में यह व्याख्या हर मंगलवार को क्रमवार प्रकाशित होती रही। यह जगबाणी के लाखों पाठकों की पहली पसंद रही। साधना भाष का शाब्दिक अर्थ है— वह व्याख्या जिसके माध्यम से श्री जपुजी साहिब में बताये गये गुप्त और प्रकट साधना सूत्रों को इस प्रकार समझाया जाये कि एक गुरसिख साधक उन सूत्रों को अपने मन, प्राण और इंद्रियों में उतार सके, उन्हें आत्मसात (अंदर तक ग्रहण) कर सके और उनके साथ एकरूप होकर परम पुरुष का साक्षात्कार कर सके।

सप्त सप्तकीय क्रिया योग स्वर साधना
कुछ कलाकार स्वर ताल में भी गाते हैं, फिर भी वे ईश्वरी संगीत से बहुत दूर हैं, क्योंकि उनका मन मान, प्रतिष्ठा, धन, वाह-वाही में जाने अनजाने उलझ जाता है। वे तीन सप्तक की सीमा को लांघ नहीं पाते। इसके आगे की गायिकी मानव से महामानव बनने की साधना है। सात सप्तकों के भी आर-पार की संगीत धारा के द्वारा ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश पूर्वक परमेश्वर और पारमेश्वरी संगीत धारा में निमग्न होने की साधना है। यह ग्रन्थ इस सप्त सप्तकीय क्रिया योग स्वर साधना का सांगोपांग दिग्दर्शन है।

महापुरुषों का जीवन-चरित्र (साधना और सिद्धांत) प्रथम खण्ड
महापुरुषों की जीवनी का उद्देश्य उनके जन्म, आश्रम, चमत्कार या बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उस साधना-धारा को समझना और अपनाना होना चाहिये, जिसके द्वारा वे मानव से महामानव बने। यह पुस्तक विभिन्न युगों के महासाधकों, जैसे शुकदेव, चुडाला और शिखिध्वज, आदि शंकराचार्य, रमण महर्षि, और श्री अरविन्द के साधना-सिद्धांतों को सामने रखती है और बताती है कि युग बदलते हैं, पर ब्रह्मविद्या का पथ अपरिवर्तित रहता है।