Testimonial
A heartfelt reflection on Guru Kripa, sadhana, and the living spiritual tradition of Dera Harisar.
श्रीगुरवे नमः
परम्परा जन्मजन्मान्तरीय होती है। एक बार सिद्धपरम्परा में दृढ़ श्रद्धापूर्वक दीक्षित होकर मन्त्र की धारा में डूब जाने पर परमलक्ष्य की प्राप्ति असंदिग्ध हो जाती है। शरीर का परिवर्तन (जन्म-मरण) परमलक्ष्य की प्राप्ति तक भले चलता रहे, पर परम्परा की शक्ति जीव को ईश्वरीय योजना के अधीन अपनी आकर्षण शक्ति से बार-बार स्वयं में समाहित कर परमलक्ष्य की स्मृति करवाती रहती है।
गुरु कृपा और जन्मजन्मान्तरीय साधुसंग के प्रभाव से सत्प्रकुल में जन्म लेकर, माता-पिता के सरल साधु-मिलन की लालसा को आश्रय बना, लगभग सात वर्ष की अल्पायु में “मैं श्रीमहाराजजी के साथ पहाड़ों में रहूँगा” ऐसी बाल-हठ ठानकर दिल्ली से बिछौना (भुंतर, हिमाचल प्रदेश) श्रीमहाराजजी के साथ ही आ गया।
लगभग वर्ष 2000 के आसपास श्रीमहाराजजी विभिन्न साधकों को सामूहिक रूप से शरीर और मन के संयमन के लिए योग, लक्ष्य की स्पष्टता के लिए वेदान्तबोध और स्वरूप-विस्तार के लिए स्वर-साधना का साङ्गोपाङ्ग अभ्यास करवाते थे। खेचरी, शक्तिचालिनी, महामुद्रा आदि दिव्य क्रियाओं का अभ्यास हो या भक्तिभाव में डूबकर मन्त्रजाप, भजन-स्तोत्र आदि का गान; झाड़ू लगाने की सेवा हो या भोजन निर्माण — प्रत्येक कृत्य में स्वस्वरूपानुसंधान ही परमलक्ष्य है, यह बात श्रीमहाराजजी समय-समय पर स्मरण करा देते थे।
श्रुतिधरत्व, तीक्ष्ण मेधा, वाक्पटुता आदि गुणों का श्रीमहाराजजी के मातृस्नेह से उदात्तात्मक विकास हुआ। वेदान्त और योग के प्रकरणग्रन्थ — तत्त्वबोध, आत्मबोध, विवेकचूड़ामणि, योगसूत्र, नारदभक्तिसूत्र, हठयोगप्रदीपिका आदि — श्रीमहाराजजी के मुख से कई बार श्रवण करने का अवसर प्राप्त हुआ। इन सभी ग्रन्थों की आध्यात्मिक व्याख्या आज भी जीवन की नींव का कार्य कर रही है।
गुरु कृपा से प्राणों का ऊर्ध्वगमन, नादानुभव और भक्ति की उन्मत्तावस्था में प्रवेश प्राप्त हुआ। अभ्यास कब स्वभाव बना, पता ही नहीं चला। कुछ वर्ष श्रीमहाराजजी के सान्निध्य में रहने के उपरान्त आपजी की आज्ञा से लोक-शिक्षा के ज्ञानार्थ संस्कृत विद्या का लौकिक अध्ययन विभिन्न गुरुकुलों से गुजरता हुआ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पूर्ण हुआ।
शास्त्री, आचार्य, विद्यावारिधि, दो विषयों (संस्कृत एवं योग) से नेट-जे.आर.एफ. आदि की प्राप्ति वस्तुतः आपकी कृपाकटाक्ष का ही फल अनुभूत होता है। वर्तमान में केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के जम्मू परिसर में योग विभाग में सहायकाचार्य श्रेणी पद पर सेवारत हूँ।
न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम्।
शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः॥गुरु चरणचञ्चरीक
डॉ. मणिकान्त तिवारी