Lineage
गुरु परम्परा — एक सामान्य परिचय

गुरु परम्परा – एक सामान्य परिचय
अनेक सिद्ध परम्परायें सनातन धारा में चल रही हैं। किसी भी परम्परा का मूल स्रोत तो आदि पुरुष ईश्वर ही होता है।
जैसा कि पा. यो. द. में कहा गया है:
'स एष पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात्॥’ (1/26)
वह परमेश्वर ही जो काल से अनविच्छिन्न है; पूर्व-पूर्व सभी गुरुओं का गुरु है और फिर सनकादि, वशिष्ठ, अंगिरा, नारदादि सिद्ध गुरुओं से गुरु-शिष्य-गुरु-शिष्य की परम्परायें चलती हैं। यह भी सम्भव है कि कोई सिद्ध महापुरुष, जिसमें पारमेश्वरी चेतना पूर्ण अवतरित हो, तो वह किसी भी काल में एक नई परम्परा का वाहक बन जाता है। सम्भव है कभी कोई परम्परा किसी एक देश-काल में लुप्त हो जाये और किसी अन्य देश-काल में फिर प्रकट हो जाये। यह जान लेना जरूरी है, किसी भी परम्परा का सम्बन्ध डेरों, आश्रमों, महन्तियों आदि से कभी नहीं होता।
एक सूत्र में सारी बात आ जाती है -परमेश्वर ही किसी अधिकारी के शरीर में अवतरित होकर गुरु पद को सुशोभित करता है- न कि कोई शरीर धारी गुरु होता है।
वर्तमान परम्परा जिससे यह प्राणी जुड़ा हुआ है, एक सनातन परम्परा है। आदि शंकराचार्य के बाद इस परम्परा के साथ 'पुरी’ यह विशेषण भी जुड़ गया। हरियाणा में 'बालू बाता’ तथा अन्य स्थानों से इसका सम्बन्ध रहा है। स्वा. सरस्वती पुरी, स्वा. राज पुरी, स्वा. भण्डार पुरी, स्वा. बाण पुरी, स्वा. अमर पुरी आदि सिद्ध पुरुष इस परम्परा में रहे हैं। विश्व विश्रुत परमहंस रामकृष्ण को निर्विकल्प समाधि प्रतिष्ठापित करने वाले उनके संन्यास गुरु स्वामी तोतापुरी इसी परम्परा से सम्बद्ध थे।
स्वामी मेवापुरी जो किला रायपुर के नन्दूआणा आश्रम में अनेक वर्ष रहे, स्वामी तोतापुरी के गुरु भाई थे।
मृत्युञ्जयी सिद्ध मूर्ति स्वामी मेवापुरी

गाँव से बाहर आश्रम में बने एक बुर्ज में ही प्राय: रहते थे। कभी-कभी वे मस्ती में आकर कह देते कि इस शरीर का त्याग, हरिद्वार जाकर गंगा जी में करेंगे। समागत भक्त कहते, 'महाराज जी, आपका शरीर तो उत्तरोत्तर अधिक वृद्ध होता जा रहा है। हरिद्वार जाने का कोई गाड़ी, मोटरादि का रास्ता भी नहीं है। फिर यह कैसे सम्भव है कि हरिद्वार-गंगा में शरीर त्यागें'। तो हाथ ऊपर उठाकर मस्ती भरा वे उत्तर देते, 'यदि यह भी नहीं पता कि कब और कहाँ शरीर छोड़ना है, तो फकीरी ही काहे की करी’। जैसा वे कहते थे, वैसा ही दीर्घ भविष्य में हुआ। 108 वर्ष की आयु में, वे अपने शिष्य देवपुरी (कम्बली वाले) के साथ पैदल ही लगभग 200 मील की यात्रा करके हरिद्वार पहुँचे। कुम्भ का पर्व था। कुछ मास वे वहीं रहे। कुम्भ की समाप्ति पर ज्येष्ठ की संक्रान्ति के पर्व पर हरिद्वार, कनखल की मध्य गंगा धारा में पैदल ही प्रवेश किया। वहाँ समाधिस्थ होकर गंगा धारा में लीन हो गये। कलियुग में भीष्म पितामह जैसे इच्छा मृत्यु महात्मा सुदुर्लभ हैं, इसमें क्या शक है।
तपो सिद्ध मूर्ति कम्बली वाले देवपुरी

युवावस्था में ही श्री देवपुरी जी ने सद्गुरु की खोज में हरिद्वार, ऋ षिकेषादि अनेकों तीर्थों, में हर कदम राम नाम का उच्चारण करते, यात्रायें कीं। कहीं भी बात बनी नहीं। किन्तु मेवापुरी जी का नाम सुनते ही, किसी अदृश्य डोर से जुड़ी उनके दिल की धड़कनें तेज हो गयीं। कठिन परीक्षाओं के बाद सद्गुरु चरणों में शरण मिली। संन्यास दीक्षा के बाद नन्दूआणे आश्रम के एक पेड़ के नीचे धूणे के पास वे बैठ गये। कठोर निरीक्षण और मार्गदर्शन में साधना प्रारम्भ हुयी। छ:-सात वर्ष लगभग निराहारी रहकर साधनारत रहे। प्राणों को चाबी देने के लिये कभी धूणे की राख से पवित्र करके जल पी लेते या कभी-कभी कुछ अन्न का ग्रास भी प्राप्त हो जाता। चूहे-साँप स्वच्छन्द उनके शरीर पर घूम जाते थे। सर्दी, गर्मी या बरसात में एक काली कम्बली का टुकड़ा ही उनके शरीर पर देखने को मिलता। साधना की स्थिति ऐसी थी कि उनका शरीर अनेकों दिव्यनाद, अलौकिक ज्योति रश्मियों की क्रीड़ास्थली बन गया; मानो शरीरस्थ देवता जाग्रत होकर आरतियाँ कर रहे हों। श्री मेवापुरी ने जब देखा कि कम्बली वाले परम पद में स्थित हो गये हैं, तो वे अपने कथनानुसार देवपुरी जी के साथ हरिद्वार पहुँचे और कनखल की गंगा धारा में लीन हो गये। कम्बली वाले तट पर ही तीन दिन बैठे रहे; ऐसी स्थिति में तीन दिन बाद मेवापुरी जी ने गंगा से निकलकर फिर दर्शन दिये, और अपना सन्देश देकर फिर वहीं अदृश्य हो गये।
ज्ञान सिद्ध मूर्ति सद्गुरु दयालुपुरी

दस वर्ष की आयु में ही आप अग्रज भ्राता के साथ हरिसर आश्रम में आ गये। बाल्यकाल सेवा, सत्संग और साधना में बीता। सरलता और करुणा की मूर्ति, दयालु जी की बुद्धि इतनी तीक्ष्ण और शुद्ध थी, कि बड़ों को भी समझ न आने वाली सारी सत्संग वार्ता, एक बार सुनने पर ही अक्षरश: सुना देते थे। कम्बली वालों ने बचपन में ही उन्हें देखते ही कह दिया था, 'तू जन्मान्तरीय पण्डित है; उस विद्या को पुन: जाग्रत करने के लिये इस बार भी कुछ पढ़ना पड़ेगा।’
बाद में गुरु आज्ञा से विद्याध्ययन के लिये वे आश्रम से बाहर निकले। अनेक विद्वानों, सन्तों का सान्निध्यलाभ करते हुये आप वाराणसी पहुँचे। वहीं पर, सर्वतन्त्र स्वतन्त्र स्वामी शंकर चैतन्य भारती जी से उनका मिलन हुआ। ये महापुरुष ही उनके विद्या गुरु के पद पर विराजित हुये। आश्चर्य की बात है कि महाराज श्री भारती जी को, आन्तर ब्रह्मविद्या स्रोत परमेश्वर की कृपा से सहज ही खुला मिला। वेद विद्या में पारंगत होने के साथ ही विद्या दान करने का अखण्ड भण्डारा खुल गया। देहात्मबोध के ऊपर आसनस्थ होकर अंगों, उपांगों सहित ब्रह्मविद्या का दान करते रहे, कोई भी उनके दर से खाली नहीं लौटा। अनेकों मण्डलेश्वर, महन्त, शंकराचार्य बने, उनके चरणों में बैठकर विद्या ग्रहण करते हुये। यहाँ तक कि आँखें जवाब देने लगीं, तब भी विद्या वितरण का द्वार बन्द नहीं हुआ। आँखें बेचारी क्या करतीं, ब्लड प्रेशर पौने तीन सौ तक पहुँच गया; किन्तु उन दयालु प्रभु ने गम्भीर विद्या धारा में सारे शरीर को ही डुबो दिया। वस्तुत: यह सब तभी सम्भव हो सका क्योंकि वे ब्रह्मज्ञता के स्वातन्त्र्यमय राज्य में विराजित रहते थे, जहाँ से करुणा रस की बौछारें उनके हृदय को बहिर्मुखता की ज्वालाओं से मुक्त कर, शान्त शीतल बनाये रखती थीं।
इस परम्परा की तप, योग, भक्ति, ज्ञान तथा करुणामयी आत्म धारा गंगा से ईश्वर की कृपा पूर्वक वर्तमान समय में दैवी सप्त सप्तकीय स्वर साधना के रहस्यों का प्राकट्य सम्भव हुआ है। जो स्वर लहरियाँ धन, मानादि की एषणाओं से संकुचित हो जायें, वे तीन सप्तकों की सीमा के पार जा ही नहीं सकतीं। सात सप्तक तो बहुत दूर हैं।
योग सिद्ध मूर्ति स्वामी बुद्ध पुरी जी

ऐसी सिद्ध महायोग की परम्परा के वर्तमान वाहक हैं, योग सिद्ध मूर्ति स्वामी बुद्ध पुरी जी। जैसा संन्यास नाम अपने गुरु महाराज जी द्वारा प्राप्त हुआ, वैसी ही शुद्ध एवं तीक्ष्ण बुद्धि के स्वामी होते हुये भी उससे पार स्थित हैं। उन्होंने शिव स्वरूप स्थित गुरु की कृपा से मानव शरीर में रहते हुये, अनेक गुप्त या लुप्त साधना धाराओं का इस कलियुग में पुन: धराधाम पर प्राकट्य किया। करुणा को आधार बनाकर ये महायोगी जगत में विचरण करते हुये महाकरुणा की उज्जवल धरा पर ही ज्ञान-भक्ति-योगादि की साधना धारायें पृथ्वी मण्डल में जिज्ञासुओं के लिये प्रवाहित कर रहे हैं। महायोगी ने तत्त्वचर्या का आचरण करते हुये, सूर्य क्रिया योग, अग्नि क्रिया योग, संजीवनी क्रिया योग, सप्त सप्तकीय क्रिया योग स्वर साधना आदि इत्यादि को जनसमूह तक सहज सुलभ करवाया। इन साधनाओं के रहस्य, पद्धति, विज्ञान को साधकों तक स्वयं रचित बीस से अधिक पुस्तकों के माध्यम से भी पहुँचाया है। इन साधनाओं को सेवा रूप में नि:शुल्क, नि:स्वार्थ भाव से साधकों तक पहुँचा रहे हैं। श्री गुरु महाराज स्वामी बुद्ध पुरी जी अपने अध्ययन काल में ही उनके गुरु जी के शरीर के सम्पर्क में आये और उनके ही हो कर रह गये। आपने दूसरी कक्षा से ही (जब बच्चा ढंग से बोल भी नहीं पाता), रामायण जैसे ग्रन्थों का पाठ करना प्रारम्भ कर दिया था। 'होनहार बिरवान के होत चिकने पात’, आपके जीवन की कुछ घटनायें यही चरितार्थ करती हैं। बचपन में आप स्वामी रामानन्द जी साधनाधाम वालों की उंगली पकड़ कर चला करते थे। स्वामी जी आपके बारे में कहा करते थे कि यह बड़ा अच्छा साधक बनेगा। महापुरुषों की वाणी सच्ची साबित होती है और भविष्य में ऐसा ही हुआ। आप जब पाँचवीं कक्षा में पढ़ते थे, एक दिन आसमान की तरफ देखते-देखते ही दृष्टि व्यापक हो गयी और आध्यात्मिक अनुभव होने शुरू हो गये। नन्हा बालक यह सब देख कर असमंजस में पड़ गया कि यह हमारे साथ क्या हो रहा है। आप रात को सोने के लिये अलग घर में चले जाते, जहाँ एकान्त में निर्विघ्न ध्यान करते रहते। आप अपने विद्या काल में स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय में हमेशा खेलकूद-पढ़ाई में अग्रणी रहे; लेकिन कभी मान-प्रतिष्ठा के लिये नहीं। IIT दिल्ली में M.Tech की पढ़ाई करते समय आप अपने गुरुदेव के सम्पर्क में आये और नित्य उनके शरीर का सामीप्य प्राप्त करने लगे। MNNIT इलाहाबाद (प्रयागराज) में अध्यापन करते समय भी आप सात्त्विक एवं सादा भोजन करके ज्यादा से ज्यादा समय शास्त्र अध्ययन या ध्यान साधना में व्यतीत करते थे। सेवा, भक्ति तथा आत्म भाव की त्रिवेणी ने आपके शरीर के रोम-रोम से दशम-द्वार के पथ का अनुसन्धान करना शुरू कर दिया और आप अपनी MNNIT की प्रोफेसर की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर गुरुसेवा में पूर्णकालीन हो गये। गुरुसेवा में आपने 9 वर्षों तक दिन रात एक कर दिये, यहाँ तक की गुरुशरीर के अन्तिम तीन वर्षों में आप प्राय: सोये ही नहीं। गुरुसेवा में इतने तल्लीन हो गये कि भोजन तक से उपरामता हो गयी, अगर बड़े महाराज जी की थाली में कुछ भोजन बच गया तो कर लिया, वरना जय श्री राम। गुरु जी की महासमाधि के बाद आप आश्रमों की अनुकूलता एवं आराम को छोड़ कर हिमालय में तप करने निकल गये। हरिद्वार में लक्ष्मी बेला, उत्तरकाशी, गंगोत्री, बद्रीनाथ आदि क्षेत्रों में तपोमयी जीवन व्यतीत करते हुये साधन रत रहे। अगर जगह मिल गयी तो ठीक, नहीं तो ऐसा भी समय था जब आप इतनी सी जगह में साधन रत रहे जहाँ पैरों को भी पूरी तरह लम्बे करके नहीं सो सकते थे, पर इस महायोगी ने तो शरीर की सारी भौतिक आवश्यकताओं पर विजय प्राप्त करके महायोग के पथ पर अपनी चेतना को आरूढ़ कर दिया था। आप भागवती महाशक्ति के ज्ञान-योग-भक्तिभावमय शक्तिशाली सूक्ष्म स्पन्दनों से इतने अधिक व्याप्त हो चुके हैं कि महाकरुणा से ओतप्रोत होकर आप अब कुछ चयनित साधकों के साथ हिमालय में स्थित 'श्री अंगिरा सिद्ध पीठ’, पिलंग में महायोग की साधना में, मार्गदर्शन देते हुये तल्लीन हैं।