Spoken discourse excerpts (Hindi). Sung hymns, repetitive chanting, and standalone devotional recitation have been omitted. Verses quoted within the teaching and spoken meditation instructions are retained. These excerpts are based on automatically generated captions and have not been checked against the audio; recognition errors may remain.
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[23:03] आज नवरात्रों का भी प्रसंग चल रहे हैं और इसके साथ ही साथ आज संक्रांति का भी पर्व है। संक्रांति का पर्व और मास आता ही है। आप सब लोग इकट्ठे भी होते हैं। यहां पर संक्रांति के बारे में बार-बार वही शब्द कह रहे हैं। सूर्य की 12 राशियां हैं। जब एक राशि में से सूर्य दूसरी राशि में प्रवेश करने वाला है। तो बीज का जो समय है उसका नाम है संक्रांति। संक्रमणम इति संक्रांति एक जगह से दूसरी जगह जाने के बीच का क्षण
[23:51] है। उसका महत्व होता ही होता है। आज कार्तिक मास की संक्रांति है। तो परंपरा तो यही है। आमतौर पर कही जाता है कि संक्रांति में जो निश्चय कर लेंगे वह सारे मास तक निश्चय बना रहेगा। यदि निश्चय कैसे करें? कोई भी निश्चय करें उल्टा सीधा निश्चय तो फलदाई नहीं होगा। जहां एक मास खत्म हो रहा है। दूसरा मास प्रारंभ होने वाला है। बीच का क्षण ठहराव का क्षण है। ना इधर ना उधर। और यहां से फिर आज कार्तिक मास का शुरू
[24:37] होने वाला है। फिर ध्यान दीजिएगा। जब एक बात खत्म हो जाती है, एक धारा खत्म हो जाती है और दूसरी धारा शुरू होने वाली है। वह बीज का क्षण महत्व का है। जैसे मंत्र जाप में भी कहते हैं। मंत्र के जितने अक्षर हैं एक वर्ण मंत्र का एक अक्षर वर्ण एकाक्षर जहां वह समाप्त हुआ और वहां से मंत्र का दूसरा वर्ण अभी हमने उच्चारण नहीं किया
[25:24] तो बीच का जो क्षण है मंत्र जाप में वह बहुत ही महत्व का होता है। असली मंत्र जाप तो सभी शुरू होते हैं। जैसे वाल्मीकि जी ने कहा मा रा मा रा मा है ना आगे पीछे सब दोनों एक हो गए। इसी प्रकार जो कोई भी मंत्र ज ओ मा न मा श वा है ना विधान तो यही है हम फटाफट ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय वो शुरू की बात है वो शुरू में कर सकते हैं। इसमें कोई हानि नहीं लाभ ही होगा। लेकिन मंत्र का जो अर्थ है वो तो हृदय में प्रकाशित होता है
[26:11] धीरे-धीरे। तो जो भी पहला अक्षर ओ मा न मा शी व या ये तो क्या रुक रुक के करना है नहीं रुक रुक के नहीं है मन को अंदर लीन करते हुए करना है हर वर्ण को मन में लीन करते चले जाना है तो वो संक्रांति रोज ही बनी रहेगी हर वर्ण में संक्रांति इसी प्रकार श्वास लेते हैं। शस भरा हमने और कहां जाकर श्वास लीन होता है। शुरू में ही हृदय में तो नहीं होगा। मूलाधार ऊपर तो शुरू में श्वास तो पूरा लीन होगा नहीं पर
[26:58] कहां शस जाकर लीन हुआ है उस क्षण की उस स्थान के अपने हृदय में धारणा करें और वहां से विश्वास ऊपर को उठाएं जैसे भी ना रोकना है ना छोड़ना है अपने आप श्वास जैसे गहरे गया और वहीं से फिर वो बाहर को आएगा जब ऊपर को उठेगा तो श्वास श्वास में संक्रांति तेज प्रकाश होता है हर वर्ण में संक्रांति और जब तक ऐसी स्थिति नहीं बनती है लगातार करते चले जाओ लगातार करते चले जाओ तो संक्रांति का पर्व है कार्तिक की
[27:46] रामायण में प्रसंग है ना कार्तिकेय का शिव पार्वती के पुत्र हुए हैं जिन्होंने फिर तारकासुर का संहार किया। तो मान लीजिए शिव शक्ति का मिलन एक श्वास भरा और वहां से फिर दूसरा उठा इन दोनों का मिलन तो वो जो अंदर इतना संग्राम चल रहा है काम क्रोध लोभ मोह इधर उधर और हम चाहते हैं हमारा मन दया भाव शक्तियों से भर जाए तो बीज की स्थिति है तो बीज की स्थिति में ठहर जाए तो तारकासुर का भी वध हो जाएगा।
[28:31] कार्तिकेय ये महीना कार्तिक का है ना तो उसके साथ भी आप जोड़ सकते हैं। अब हम आगे रामायण की चर्चा शुरू करते हैं। कल की चर्चा में यहां तक बात हो गई थी कि खरद दूषण का वध हो गया। खरद दूषण रावण के भाई ही थे एक प्रकार से। शूरपखा की नाक कान काटी गई। और शूर प्रणखा रोती हुई कहां गई? रावण के पास।
[29:20] रावण के पास रोती है, कलपती है। राम के पास गई थी उनसे काम वासना को लेकर और खरदूषण के पास गई थी कि सीता को खार कर दो। सीता को खत्म कर दो और राम जी रहेंगे तो इनको भी खत्म कर दो। और रावण के पास गई है। यह मन चंचल होते हैं। बहिर्मुखी होते हैं। एक ही लक्ष्य तो होता नहीं है। और रावण के पास गई है। रावण के पास गई है कि आपने हमें दंडकारण्य का साम्राज्य दिया था। हम मालिक थे उसके।
[30:10] वहां पर तो राम सीता आ गए हैं और उनकी बहुत ही अद्वितीय सुंदरी सीता वह भी वहां पर है। तो हमारा साम्राज्य तो वहां राज्य तो हमारा खत्म हो गया। हमें कोई पूछता नहीं है। आपके रहते हुए रावण को कह रही है। हमें कोई नहीं वहां पर पूछ रहा है। तो यदि आपने हमें दंडकारण्य में रखना है साधु संतों के तप में विघ्न डालें जिससे आप चिरायु हो जाएंगे आप मरेंगे नहीं तो इस प्रकार की यदि आप स्थिति बनाना चाहते हैं तो आप जाकर राम रावण का वध करो
[30:55] और वह प्रलोभन भी देती है सीता द्वितीय सुंदरी है तो इसके लिए सीता का हरण कर लो ये चालाकियों की ऐसी बातें होती किसी को कुछ कहना, किसी को कुछ कहना, किसी को कुछ कहना। रावण समझदार था। ऐसा तो नहीं पागल था। जब उसने सुना कि अकेले राम जी ने खरदूषण का वध कर दिया। तो खरदूषण तो मेरे ही समक्ष मेरे जितने ही बलवान थे। उसको कैसे किसी ने वध किया? तो बड़ा व्याकुल बहुत चिंतन हुआ उसको। आखिर वह सोचता है उसके मन में ऐसा विचार
[31:43] आया कि यह कोई बात अजीब जैसी है। अलग जैसी है। क्या है? कहीं भगवान ने अवतार तो नहीं ले लिया। कहीं राम रूप में भगवान तो नहीं आ गए हैं। इतम विचिंत अखिला इंद्रो रामम विदित्वा परमेश्वरम हरम ऐसा उसने चिंतन किया रावण ने और वह धारणा करता है समझता है रामम विधित परमेश्वरम हरम राम तो परमेश्वर रूपी हो सकते हैं
[32:32] फिर आगे क्या सोचता है विरोध बुद्ध हरम प्रयामितम भक्त भगवान प्रसीत मैं विरोध बुद्धि के साथ रावण राम के पास जाऊंगा कि मुझसे भक्ति तो हो नहीं तामस तन कोई साधन नहीं विरोध बुद्धि इसके साथ में रावण राम को जीतूंगा यदि वह मनुष्य हुए तो सीता को ले आऊंगा और यदि मैं उनके हाथ से मारा गया तो मैं ऊपर के धाम में ब्रह्मलोक में चला जाऊंगा। तो इस प्रकार का उसने विचार किया लेकिन निर्णय नहीं है। क्यों नहीं निर्णय कर पा रहा कि यह राम ही है। इस वास्ते निर्णय
[33:20] नहीं कर पा रहा है कि तमोगुणी बुद्धि तो है ही। उसका चिंतन जो है सब कुछ जो कुछ है तमोगुण के आश्रित ही हो रहा है। तो खैर उसने निर्णय लिया। फिर योजना भी उसने बनाई और इधर राम कुछ और ही लीला रच रहे हैं। राम का तो प्रयोजन ही था कि निशाचरों का वध करना है। यही उनका लक्ष्य था। तो उस समय एकांत में लक्ष्मण भी वहां पर नहीं है। तो उन्होंने सीता को कहा तुम पावक मोह करो
[34:08] धरो शरीरा जब लग कर मैं निशाचर संहारा जब तक मैं निशाचरों का संहार करता हूं तुम अग्नि में प्रवेश कर जाओ यह गुप्त बात थी रावण लक्ष्मण को भी नहीं पता लगी अब अग्नि में प्रवेश का मतलब क्या है? अग्नि पांच तत्व होते हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश और सीता में तो पांचों तत्व आपस में घुले मिले हैं। और उनके मूल में है चैतन्य शक्ति। उनका भी आदर है। भगवान सर्वव्यापक ब्रह्म राम। इस प्रकार सीता की स्थिति है। तो सीता ने
[34:57] राम जी के कहने से अग्नि में प्रवेश कर लिया। कोई व्यक्ति अग्नि में प्रवेश करता है तो क्या होता है? जल जाएगा। लेकिन सीता तो अग्नि रूप ही हो गई। क्योंकि अग्नि के मूल में तो सीता तत्व ही है। अग्नि रूप हो गई। और जो बाहर का शरीर था जो अग्नि का तो कोई आकार नहीं बनता है व्यापक हो जाता है एक प्रकार से तो बाहर का जो शरीर है स्थूल शरीर है उसमें जल तत्वों की पृथ्वी तत्वों की भी धारणा कर दी
[35:45] लेकिन वह पहले तो चिन्मय रूप था सारा का सारा सीता का अब वह जो दिखाई देने वाला आकार है रूप है शरीर का उसमें पृथ्वी जल के तत्वों की प्रधानता है लेकिन सीता तो उसमें है ही है पांचों तत्व चित शक्ति उसमें तो है ही है ये नहीं कि सीता कहीं और चली गई उस शरीर में ही है लेकिन वह सीता का रूप कोई देख नहीं सकता है लक्ष्मण भी नहीं देख सके तो इस प्रकार उन्होंने योजना बनाई मायावी सीता माया की शक्ति सीता क्योंकि जो रावण है वह सीता का हरण कैसे कर सकता है सीता के
[36:34] तो पास तक नहीं फटक सकता है या तो सीता में लीन हो जाएगा या भाग जाएगा रावण की स्थिति ऐसी होगी यदि वहित शक्ति रूपी सीता के सानिध्य में आ जाए लेकिन उन्होंने तो योजना थी कि रावण सीता को लेकर चले जाए। फिर युद्ध की शुरुआत का कार्यक्रम साधारण रास्ता खुलना शुरू हो जाएगा। तो इस प्रकार सीता ने तो अपने राम जी ने लीला कर ली। लक्ष्मण को नहीं बताया क्योंकि उनके साथ खेल करना था। साथ रखना था। इधर रावण क्या करता है?
[37:21] रावण कहता है कि अब मैं सीता का हरण करूंगा। क्योंकि शूर प्रणखा ने उसके मन में ऐसे संस्कार भर दिए थे। तो सीता का हरण करने के लिए सीधा सीधा तो मैं कैसे जाऊंगा? राम लक्ष्मण वहां पर होंगे। फिर तो युद्ध हो जाएगा। फिर पता नहीं क्या हो। तो युद्ध किए बगैर ही मैं सीता को हरण करके यहां पर लंका में आकर बैठा दूंगा। फिर देखें क्या होता है। तो वहां पर वो मारीच के पास गया। मारीच बाहु की कथा पहले आ चुकी है। वहां पर विश्वामित्र के साथ वो तपस्वीयों के यज्ञ की रक्षा के लिए यह राम लक्ष्मण गए
[38:08] थे। वहां पर मारीश बाहु आदि भी आए थे। राक्षसों को साथ सु को तो राम ने एक बाण से खत्म ही कर दिया मारी को नहीं मारा था नहीं किया था क्योंकि वह तो खेल चलता है लीला चलती है ऊपर से कुछ भी हो लेकिन यहां पर एक बात और स्पष्ट कर दे खेल कैसा है ना ये कोई ड्रामा करते हैं कुछ अंदर है कुछ बाहर है कुछ अलग-अलग है ऐसा ड्रामा तो नहीं हो सकता भाई वो तो नकली आदमी करते हैं। अंदर कुछ है, बाहर कुछ है। क्या भगवान ऐसे ड्रामे करेंगे? भगवान ऐसे ड्रामे नहीं करते हैं। जैसे हम दृष्टांत देते हैं ये फिल्मों में होता है ना।
[38:55] बड़े-बड़े एक्टर हैं। दिलीप कुमार आदि फलाने फलाने अमिताभ बच्चन सब नाम जानते हैं। जब वह किसी रोल अभिनय करते हैं तो क्या कैसे करते हैं? है ना? वह भूल जाते हैं। मैं दिलीप कुमार मैं यह फलाना फलाना यह एक्टर यह एक्टर अपने आप को भूल जाते हैं बिल्कुल और जो कुछ वो पार्ट करते हैं उसी में बिल्कुल डूब जाते हैं। लेकिन अमिताभ बच्चन अमिताभ बच्चन ही रहते हैं। वो एक्टिंग करते हुए भी वो रोल प्ले करते हुए भी आंखों से आंसू है। ये बोल रहे हैं वो बोल रहे हैं अपना बाहर का सारे भूल
[39:41] जाते हैं लेकिन क्या वो भूल जाते हैं जब रोल खत्म हुआ फिल्म का फिर वही एक्टर अमिताभ बच्चन है दिलीप कुमार है सारे वही है ना तो यहां तो भगवान राम थे भगवान राम अपने स्वरूप को जरा नहीं भूले क्षण नहीं भूले सीता माता अपने स्वरूप को जरा भी नहीं भूली है लेकिन बाहर से असुरों का संहार करने के लिए सब लीला कर रहे हैं। झूठी नहीं कर रहे हैं। छलावा नहीं कर रहे हैं। किसी को धोखा देने की बात नहीं कर रहे हैं। है ना? यह दृष्टांत से तो समझ में आ ही जाता है। तो राम राम ही है। ब्रह्म रूपी है। सीता वही परमेश्वरी भी
[40:29] है। लेकिन वहां पर स्थित रहते हुए ही जैसे ऐसा वो कार्य कर रहे हैं। ऐसा वह खेल कर रही है कि लोगों को जरा भी नहीं लगता कि यह सीता है। चिदानंदमय सीता है। किसी को भनक तक नहीं लगने दी। रावण को भी यही शक हुआ। भगवान है पता नहीं है कि नहीं है। चलो चलते हरण कर लाते हैं। रावण के हाथ से वध हो गया तो भी ठीक है। नहीं हुआ तो सीता को ले आएंगे। इस प्रकार वो करते करते महाराज के पास गया। महाराज ने अपने
[41:15] सारी पुरानी प्रसंग बता दिया कि ऐसे सीता राम तो बहुत शूरवीर है भगवान के जैसे ही लगते हैं वह तो वहां आप ना जाओ आपका कल्याण नहीं होगा मर जाओगे आप मृत्यु हो जाएगी तो रावण ने तो हट जान ही ली थी कि इधर जा उधर कहते यदि तू मेरे साथ नहीं चलेगा मैं अभी तुझे मौत के घाट में उतार दूंगा तो कहते रावण के हाथ मरने के बजाय राम के हाथ ही शरीर छूटे तो ज्यादा अच्छा है तो वहां पर विमान पर आए और विमान बहुत
[42:03] पीछे छोड़ दिया और मरीज को कहा तू एक सोने के मृग का रूप धारण कर ले क्योंकि यह राक्षसों में शक्तियां होती हैं। इसी प्रसंग में हम यह भी बात कह दें मनुष्य असुर देवता इनके शरीरों में ही अंतर होता है। जो मानव शरीर पूर्ण शरीर है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश और आत्म तत्व तो है ही। इन पांच तत्वों का बना हुआ है और पुरुष शरीरों में पृथ्वी तत्व की प्रधानता जल तत्व की प्रधानता राक्षसों के शरीरों में पृथ्वी तत्व ना के
[42:49] बराबर है और उनमें जल तत्व है लेकिन पृथ्वी तत्व के कारण ही जल नीचे को ठहरता है नहीं पृथ्वी का आधार नहीं होगा तो व्यापक होता चला जाएगा तो जल तत्व राक्षसों में असुरों में प्रधान होने पर भी वह मनुष्य शरीर नहीं है। मनुष्य शरीर धरती पृथ्वी तत्व की प्रधानता के कारण धरती पर चलते फिरते हैं। लेकिन राक्षस आदि धरती पर चल भी सकते हैं और चाहे तो जल को अपने अधीन करके आकाश में भी उड़ान भरते हैं। यह कहते हैं रावण ने ऐसे किया वह आकाश
[43:35] मार्ग से गया इधर गया विभीषण भी आकाश मार्ग से आया आगे प्रसंग आते हैं और देवताओं के शरीर उनमें भी पांचों तत्व है जल पृथ्वी है लेकिन वह बहुत गुण है उनमें अग्नि तत्व की प्रधानता है उनमें तेजस्वीता ज्यादा होती है वो भी अपनी मर्जी से नीचे आ जाए बात है अब तो पृथ्वी लोक में पृथ्वी जड़ तत्वों की प्रधानता है तो देवताओं का संबंध भी कलयुग में एक प्रकार से टूट ही गया है। तो इस प्रकार से रावण आकाश मार्ग से पंचवटी में पहुंच गया। विमान है उसका वैसा ही
[44:20] और मारीच को कहा तुम सोने के मृग के रूप में बदल जाओ। उनमें मायावी शक्ति है यह और किसी बहाने से राम लक्ष्मण को इधर जंगलों में ले आओ। मारी ने कहा जैसी आज्ञा ऐसी करेंगे आपके हाथ से मरना थो है और फिर मारीज वहां जहां पर राम लक्ष्मण सीता रहते हैं उस कुटिया में घूमता फिरता है इधर चक्कर लगाता है कभी ओझल हो जाता है कभी और आगे निकल जाता है फिर दिखाई देता है और सीता देख रही हैं कि ऐसा सुंदर मृग
[45:05] तो हमने आज तक नहीं कभी देखा तो वह राम जी को कहते हैं आप यदि यह सोने का मृग मेरे पास ले आओ अपने अधीन करके मैं इसके साथ खेला करूंगी दौड़ लगाया करूंगी ऐसे करूंगी तो राम जी ने समझाया लक्ष्मण भी पास ही बैठे थे कि ऐसा कोई मृग होता भी है लक्ष्मण कहने लगा यह तो सब राक्षसों की चालाकियां हैं धोखा है माया है तो सीता कहती नहीं उसने भी स्त्री हट जैसे अब वह दूसरा रूप पैदा कर रही है कि नहीं मैंने तो यही मेरे मृग को लेकर आओ चाहे
[45:51] जिंदा लाओ मार के लाओ कैसे भी लाओ मैंने तो इसी के साथ जीवन बिताना है मर के लाएंगे तो उसकी खाल में पहन लूंगी जिंदा आएगा तो मैं उसके साथ खेला करूंगी राम जी ने और लक्ष्मण ने तो खास समझाया उसको तो पता ही नहीं था क्या खेल होने वाला है। तो राम जी कहते हैं अच्छा मैं जाता हूं। लक्ष्मण को कहा तुम यही रहकर सीता की रक्षा करना। जंगल है निश्चर है तो पूरा ध्यान से सीता को रक्षा करना। इनकी किसी प्रकार से इसको हानि ना हो। तो राम जी चले धनुष बाण लेकर और मरीज तो चलता कभी ओझल हो जाता है घाटियों में जंगलों में और कभी थोड़ा सा
[46:37] फिर प्रकट देता है फिर ओझल हो जाता है फिर प्रकट हो जाता है और कभी आगे कभी पीछे करता करता वो जहां पर पंचवटी में राम लक्ष्मण सीता रह रहे थे उस पंचवटी से बहुत दूर ले गया और वहां पर उसने राम जी ने एक बाण मारा काफी दूर हो गए काफी समय हो गया और मरीज का संघार कर दिया हिरण रूप खत्म हो गया और मरीज को रावण ने जैसे शिक्षा दी थी वो आकर में कहता हां लक्ष्मण
[47:23] लक्ष्मण को याद कर रहा है मरीज जोरों से आवाज लगा रहा है। हां लक्ष्मण मेरी रक्षा करो। ऐसे राम जी की वाणी में बोल रहा है। महाराज राम की आवाज निकालकर बोल रहा लक्ष्मण मेरी रक्षा करो। इधर सीता घबरा गई। कहते भी राम जी पर कोई संपत्ति आ गई है। विपत्ति आ गई है। लक्ष्मण कहता जी माता ऐसे कैसे हो सकता है? यह तो संभव ही नहीं है। तो सीता ने कठोर वाक्य कहे तू राम जी का राम जी का भी भला नहीं चाहता। उनकी सेवा में तू यहां पर जंगलों में आया है। तो उस जा मैं कहती हूं जा उनकी रक्षा कर।
[48:09] पता नहीं कौन सी विपत्ति पड़ी हो। तो लक्ष्मण जी मनमाने सीता की आज्ञा का पालन करते हुए वहां से चले जिधर से आवाज आई थी और उन्होंने वन देवियों को एक आदेश जैसे उनसे संबंध जोड़कर कि मैं जा रहा हूं वन देवियों मेरी सीता की रक्षा करना। कई लोग कहते हैं लक्ष्मण ने कोई रेखा खींच दी। कैसे भी हो लेकिन लक्ष्मण ने जो तुलसीदास लिखा है वन देवियों शक्तियों वन में रहने वाली शक्तियों तुम सीता की रक्षा करना इस पर कोई अनिष्ट ना आ जाए
[48:56] और लक्ष्मण चले गए राम जी बहुत दूर थे इधर रावण ने मौका रखा और एक तपस्वी का वेश धार कर भिक्षा मांगता हुआ सीता के द्वारे पर पहुंच गया और वह कहता मुझे भिक्षा दो ऐसे दो तो डर भी रहा है रावण क्योंकि रावण में अभी भी इतनी शक्ति नहीं थी कि सीता को ऐसे जबरदस्ती हर कर ले जा सके तो वहां पर सीता जी ने कहा भिक्षा देने के लिए वह बाहर आई तो राम रावण ने किस प्रकार
[49:43] से उसका हरण किया यह रामायण आदि में वर्णन है सीता के चरणों के नीचे जो धरती है उसको अपने हाथों से कुरेदा उखाड़ा और वह धरती मैं जैसे हाथ से सीता को उठा के जाकर रथ में डाल दिया सीता स्पर्श अब भी नहीं कर सका था पहले यदि ऐसा होता वह तो खत्म ही हो जाता। यदि सीता अपने परम रूप में होती तो उसने रथ हाक दिया और आकाश मार्ग से वह जा रहा है इधर लक्ष्मण जी वहां पहुंच गए राम जी के पास और राम जी ने कहा तुम यहां पर कैसे आए?
[50:32] कहते जी आपकी आवाज सुनी थी। अरे अच्छा वो सुबह इसने गड़बड़ की थी। मारीच ने गड़बड़ की थी। देखा सीता का क्या हाल होगा। पीछे पता नहीं क्या होगा। मैंने तुझे यह सेवा सौंपी थी कि सीता की हर हालत में रक्षा करनी है। तू यहां पर कैसे आ गया? कहते प्रभु क्षमा करें। मैं चला कि धोखे में आ गया। मुझे सीता ने ऐसे भेज दिया। और वहां पर गए हैं तो कुटिया खाली है। सीता हरण हो चुका है। आकाश मार्ग से तब तक रावण पता नहीं कहां तक आगे निकल चुका था। और राम जी जगह जगह भ्रमण करते हुए जंगलों में लक्ष्मण के साथ
[51:18] एक प्रकार का सच्चा अभिनय कर रहे हैं। सीता के वियोग में रो रहे हैं। भाव के द्वारा सीता भी उधर तड़प रही है। रो रही है और दोनों में संबंध तो चाहे किसी भी स्तर पर हो संबंध तो है ही। सीता व्याकुल है, राम व्याकुल है, लक्ष्मण व्याकुल है। और सीता की खोज शुरू हो गई। इधर रावण वायुमार्ग से जा रहा है विमान में। रास्ते में उनको जटायु मिला। जटायु का प्रसंग कई बार जटायु एक भाई था संपाती। वो बाद में मिला जब वह लंका पार करने के कगार पर थे हनुमान जी आदि।
[52:04] तो वहां पर जटायु ने कहा अरे यह सीता रो रही है, तड़प रही है। सीता के दर्शन बीच-बीच में जटायु करता रहता था। वहां पर ये कहता तू पापी निश्चय ऐसेसे अभी तुझे मैं ऐसे सबक सिखाता हूं। और जटायु भी एक देवाकार था। बहुत बड़ा विशाल आकार था। उसने रावण के रथ पर हमला कर दिया। रथ नीचे गिर गया। तो रावण अब सोचा भी अब तो इसका संहार ही करना पड़ेगा। उसने जटायु को यह बाण मार मार के खत्म जैसा कर दिया। मृत प्राय कर दिया। अभी जटायु मरा नहीं है। और धनुष के विमान के
[52:51] द्वारा आकाश मार्ग से और आगे चलता गया। और चलते चलते ऊपर चलते चलते वह वहां पर देखा सीता ने नीचे देखा कि नीचे कुछ पांच वानर बैठे हैं सुग्रीव आदि उनके चरण चरण माना आदि वहां पर बैठे हुए हैं तो उन्होंने अपने गहने निकाले पैरों का हाथों का ऐसे ऐसे थोड़े गहने निकाले क्योंकि सीता आभूषण जंगल में भी पहनती थी वो तो वनवासी नहीं थी तो माता ने कह दिया तू अपना वैसे ही वस्त्र पहने हैं, साड़ी पहनी है, आभूषण पहने हैं। उनका त्याग नहीं करना है। तो सीता ने कुछ अपने आभूषण निकाले। साड़ी का पल्लू फाड़ा उसमें
[53:37] बांधकर नीचे फेंक दिए। जहां पर सुग्रीववादी बैठे हुए थे। रावण उनको आगे ले गया। समुद्र पार किया और अशोक वर्ण में अशोक वाटिका में लंका में वहां पर सीता को रख दिया। एक कुटिया दे दी बना दी और राक्षसियों को कहा इसकी सेवा करना और वहां पर इसकी हर बात का ख्याल रखना लेकिन थोड़ा थोड़ा इनको डराते रहना समझाते रहना कि राम का चिंतन छोड़े और मेरे साथ लग जाए तो इस प्रसंग हुआ इधर राम लक्ष्मण सीता की खोज करते करते करते
[54:23] जहां तहां जा रहे हैं। ऋषि मुनियों के पास जा रहे हैं। लेकिन कुछ पता नहीं लग रहा। जटायु के पास पहुंचे। जटायु ने कहा ऐसे ऐसे रावण आया था। वो दक्षिण दिशा में इनको लेकर गया है। तो उधर चल पड़े। उधर जाते जटायु का भी कल्याण किया। भक्ति प्रदान की और आगे यात्रा शुरू हो गई। आगे जाकर और तपस्ियों के ऐसे रास्ता पूछते हुए किधर गई होगी सीता? वह शबरी के आश्रम में पहुंच गए। शबरी मतंग ऋषि की शिष्या थी। जंगलों में रहती थी। अकेली रहती थी। कुटिया में रहती थी।
[55:12] इधरउधर बहुत से तापस भी रहते थे। और यहां पर एक बात की ओर हम संकेत देना चाहते हैं। त्रेता युग कैसा अद्भुत था? स्त्री पुरुष का कोई भेद नहीं था। आज तो कहते हैं स्त्रियों को घर से बाहर नहीं निकलना। घर में बैठकर साधना करो। परिवारों की पालना करो। बच्चे पैदा करो। बस इतना ही आपका तप। इतने आपकी साधना है। आपको जप तप की साधना करने का कोई मतलब नहीं। पूरे हम करेंगे। हम क्या करेंगे मैं हूं मैं पुरुष हूं मैं आदमी हूं मैं ही साधना कर सकता हूं तो क्या साधना हुई स्त्रियों को तो घर में रहकर बच्चों की पालना करो बस रोटी बनाओ
[55:58] खाना बनाओ आजकल थोड़ी सी और चर्चा चल पड़ी है स्त्रियां कहती है हम कौन सी कम है और दोनों में मुकाबला होना शुरू होता है मुकाबला करना भी गलत है इस जगह हम आगे जाएंगे पुरुषों को पीछे छोड़ेंगे और पुरुष पहले से हम पुरुष है हम आगे रहेंगे तो यह संघर्ष होना शुरू हो गया है। दोनों ही गलत है। लेकिन स्त्री पुरुष का मतलब क्या है? शिव शक्ति से पैदा हुए हैं। जैसे चना होता है। है ना? उसके ऊपर एक छिलका होता है। छिलका उतार दो तो चना दो हिस्सों में बट जाता है। है ना?
[56:43] जब तक छिलका है दोनों इससे आपस में जुड़े हुए हैं। अब यह माया का छिलका उठ गया और एक स्त्री हो गई, एक पुरुष हो गई। लेकिन दोनों अधूरे हैं। दोनों मिलकर चलेंगे हर कार्य में। लौकिक कार्यों में साधना के कार्यों में जब दोनों जब तक मिलकर नहीं चलते हैं तब तक साधना शुरू नहीं हो सकती है। स्त्री पत्नी इधर खींचे पति उधर खींचे तब तो क्या साधना होगी? दोनों का लक्ष्य जब तक एक नहीं होता है तब तक साधना नहीं हो सकती है। तो आजकल के समय में परिवर्तन तो हो रहा है। कुछ सही दिशा में भी होगा और कहीं
[57:29] बिल्कुल उल्टी दिशा में है। स्त्रियां कहती है हमें विवाह नहीं करना। हमें यह नहीं करना। हम तो पैसा कमाना है। धन कमाना है। यह पढ़ाई करनी। यह पढ़ाई करनी है। और पुरुष भी कहते हैं हमें कोई जरूरत नहीं। स्त्रियों की कोई जरूरत नहीं और विवाह से पहले ही गंदे संस्कार पड़ने शुरू हो जाते हैं। तो खैर वहां का समय कैसा था? त्रेता युग द्वापर आदि युग सतयुग आदि शी चौड़ा आदि की प्रसंग आते हैं। तो वहां पर शबरी जंगलों में अकेली रहती है। मतंग ऋषि ने कह
[58:16] दिया था कि अब मेरे जाने का समय आ गया है। तू यही रहकर तप कर, तपस्वियों की सेवा कर, भजन कर, राम जी आएंगे, त्रेता युग में आएंगे। उनकी इंतजार कर तब तेरा रास्ता पूरा खुल जाएगा। तो शबरी क्या करती है? कि तपसियों की कुटिया है। बाथरूम अटैच तो होते नहीं थे। तो दरिया में नदी में पास में जाने स्नान होता। करते सुबह-सुबह करते थे तो शबरी उनसे उठने के पहले ही सारे रास्ते झाड़ू से साफ कर देती थी। इस प्रकार उसकी कितनी से गुप्त रूप से
[59:02] सेवा किसी को पता भी नहीं लगा कि शबरी क्या यही तो सेवा होती गुप्त रूप से करनी है। इस प्रकार सेवा होती रहती थी। और करते करते वह समय भी आ गया। जब राम जी लक्ष्मण के सहित पहुंच गए तपस्वीयों के घरों में आश्रम में नहीं गए सीधे शबरी के पास ही पहुंचे शबरी ने देखा राम लक्ष्मण आए हैं। मेरे गुरु मतंग ऋषि की वाणी सच्ची हो गई है। और खूब प्रणाम किया। कंद मूल फल का आहार दिया। कुछ लोग कहते हैं झूठे बैर खिलाए। यह कहीं पर समय भी समझ में नहीं आता कि
[59:48] शबरी क्या मुंह में झूठे देखेगी? मीठे खट्टे हैं। फिर वो भगवान को भोग लगाएगी। तो तुलसीदास रामायण कंद मूल फल आदि इसका आहार दिया उनको। भोजन हुआ साथ चर्चा हुई तो राम जी ने उनको नवधा भक्ति का उपदेश दिया नौ प्रकार की भक्ति वो भक्ति के तरीके से है। प्रथम भक्ति संतन कर संगा। दूसरी रति मम कथा प्रसंगा। पहली भक्ति साधना की शुरुआत ही कहां से होती है? संतों का संग करें। जो इस रास्ते पर चल चुके हैं कहीं भी रहते
[1:00:36] हुए संतों का संग हो और जो संत चर्चा करें सत्संग में उसमें प्यार हो जाए। कैसी भी चर्चा करें वेदांत की हो, भक्ति की हो, योग की हो तो वह चर्चा उसके साथ हमारा प्यार हो जाए और वह जो शब्द है हमारे हृदय में भरने शुरू हो जाए। चिंतन करते जाए और तीसरी भक्ति क्या है? उसमें से फिर जो कहा जाता है उनके साथ हमारा चिंतन चले। जो कहा गया है उसका चिंतन करें और उसकी आपस में चर्चा
[1:01:23] करें। इस प्रकार चर्चते करते चले जाए। फिर अगली भक्ति है सेवा। और सेवा में क्या है? एक ही तथ्य लिखा गया है। नम्रता। नम्रता पूर्वक सेवा करें। प्यार से सेवा करें। सत्संग के श्रवण वाक्यों को सुनते हुए नम्रता पूर्वक मैं सेवा करूं। मैंने यह करना है। मैंने वह करना है। यह कोई सेवा नहीं होती है। जिसके साथ सेवा जिसकी सेवा कर रहे हैं उसको धन्यवाद है कि आपने सेवा का मौका दिया है। इस प्रकार से प्यार से सेवा करें
[1:02:08] तो वह भक्ति बन जाएगी। सेवा धर्म योग नाम कितने लोग हम जो ऐसे हैं जो इस प्रकार की सेवा करते हैं नहीं यह नहीं होगा ऐसा नहीं चलेगा यह कोई सेवा होती है प्यार से नम्रता से जिसकी सेवा कर रहे हैं उनको धन्यवाद है आपका आपने मुझे सेवा का मौका दिया है इस प्रकार सेवा नम्रता से करें और जब नम्रता से सेवा करेंगे तो भगवान के संतों के मुख से हमने जो शास्त्र चर्चाएं सुनी है वह हमारे हृदय में प्रवेश होनी शुरू हो जाएंगी। उसके बाद मंत्र है ना फिर जितना कुछ होना जेवा का जो फल
[1:02:57] है वह मंत्र रूप में गुरु की कृपा से हमें मिल जाता है। तो मंत्र जाप करें। मंत्र जाप करते करते फिर वह मंत्र का जो अर्थ है जो सारे शास्त्रों वेदों का सार है वह प्रकट होना शुरू हो जाएगा एकदम थोड़ी होगा भाई है ना हम तो कहते हैं मैं मैं सेवा कर रहा हूं तो क्या सेवा हुई मैंने यह शास्त्र पढ़ लिए मैंने यह काम कर लिया तो मैं ऐसा हूं वो क्या वहां पर वो सेवा करेगा क्या गुरु के साथ जुड़ेगा और क्या मंत्र मिल भी गया दीक्षा हो भी गई है मंत्र का अर्थ प्रकाशित नहीं हो सकता है।
[1:03:45] इस प्रकार जब मंत्र का अर्थ प्रकाशित होगा तो हृदय में से दैवी गुणों की उत्पत्ति होगी। दया श्रद्धा सब कुछ भाव है। वैराग्य आदि भक्ति आदि सब कुछ प्रकट होने शुरू हो जाएंगे। तो इस प्रकार से करते करते फिर उसको लगेगा सारा जो संसार है मेरे गुरु का ही रूप है। मेरे भगवान का ही अभी मन में आया अनुभव नहीं हुआ है। अभी अभी मैं है लेकिन वो मैं खत्म जैसी है। यह वेदांत भक्ति की साधना मैं बिल्कुल हूं ही नहीं जैसे और सारे गुरु का रूप है। मेरे परमेश्वर का रूप है। इसी दृष्टि से वह
[1:04:32] श्रद्धा आदि प्यार के द्वारा सत्कार के द्वारा दूसरों के साथ वह व्यवहार भी ऐसा ही करेगा। अभी मैं ब्रह्म हूं ऐसी स्थिति नहीं बनी है। वो तो बहुत बाद में बनेगी। फिर इस प्रकार वो करते करते जैसे-जैसे वो मंत्र का हृदय विकार सारे शांत हो गए। उसको लगेगा सारा संसार मेरे गुरु का ही रूप है। भगवान का रूप है। मैं उनका सेवक हूं। भक्ति के मार्ग में यही है। इस प्रकार करते करते फिर वह दूसरी और चलते-चलते उसको लगेगा दूसरा कोई है ही नहीं। दूसरा कोई है ही नहीं। अभी भी भक्ति खत्म नहीं है। व्यवहार फिर कसौटी है। उसका व्यवहार कैसा
[1:05:19] होगा? है ना? वह जीवन मुक्ति की स्थिति कह सकते हैं। व्यवहार में भी वह जिसको भी मिलेगा पापी हो पुण्यत्मा ऐसा हो वैसा हो उसको वह अपना ही समझेगा। और अपने बारे में क्या है? यथा लाभ संतोष। किसी ने निंदा कर दी, किसी ने प्रशंसा कर दी, धन हानि हुई। यह लुट गए। यह उसको बहुत को मिल गया। उसको ये चीजों का कोई प्रभाव नहीं होगा। व्यवहार सिद्धि सह पहले तो धारणा के द्वारा करेंगे बाद में अपने आप हो जाएगा। तो इस भक्ति में हम क्या जोड़ेंगे? सीधा सीधा है सेवा से शुरू कर
[1:06:04] लो। सत्संग आदि के द्वारा सेवा से शुरू कर लो। सेवा का फल क्या है? नम्रता या नम्रता पूर्वक हमने सेवा करनी है। जिनके साथ हम मिलकर सेवा कर रहे हैं वो करवा रहे हैं। उनमें हम नम्रता का भाव रखें। अपने क्या है? सीधा ही चलो जी हम तो वेदांत चिंतन करेंगे। आत्म चिंतन करेंगे। सेवा की हमें कोई जरूरत नहीं है। सीधी छलांग लगाएंगे। सीधी छलांग कहां लगती है? जन्मांतर पुण्य संस्कार बहुत ज्यादा प्रबल है। तो जन्म सही होगा। बाल्य काल से ही होगा। वह संस्कार उसके गर्भ में ही थे। यानी कि सीधा हम तो आश्रमों में चले
[1:06:52] जाएंगे। जंगलों में करे जाएंगे और आत्म चिंतन करना शुरू करेंगे तो जरूर ही अहंकार के आश होंगे। कहीं ना कहीं भटक ही जाएंगे। तो इस प्रकार राम जी ने शबरी को भक्ति का उपदेश दिया और शबरी बड़े प्यार से उन चीजों को अपने हृदय में धारण कर धारण ही थे और दृढ़ होते चले गए राम की भक्ति और उनके हृदय में बढ़ती चली गई और फिर जब आखिरी समय आ गया तो शबरी कहती है प्रभु मतंग ऋषि ने कह किया था। जब राम जी आएंगे, लक्ष्मण आएंगे तो उनके शरण में जाना तुझे अंतर का पथ
[1:07:39] बिल्कुल खुल जाएगा। तो अंदर का पथ खुल गया। तो शबरी कहती प्रभु आपकी आज्ञा हो तो मैं आपके धाम में जाती हूं। यहां सदा ही आपका संग मिला रहेगा। ब्रह्मलोक साकेत लोक तो शरी ने कैसे शरीर छोड़ा? योगा अग्नि प्रजलित की। योगा अग्नि में अपने शरीर को दग्ध किया। योगा अग्नि में अपना शरीर बनाया और सीधे साके धाम में पहुंच गई। यह शबरी का प्रसंग है। थोड़ा सा राम राम की धुन लगाते हैं। फिर आगे चलते हैं।
[1:12:38] शबरी ने कह दिया था। उसको पता लग गया था कि आप पंपासा सरोवर में जाओ। वहां से आपको आगे से आगे का रास्ता मिलेगा कि सीता को रावण कहां लेकर गया है। पंपासर सरोवर जहां पर सुग्रीव आदि रहते थे। हनुमान जी आदि का वास था। तो वहां पर राम लक्ष्मण को व्याकुल भाव से प्रेम के भाव से चलते हुए जहां जहां भी ऋषि मुनि साथ में मिलते हैं उनको साथ लेकर और आगे चलते गए और आगे चलते गए तो वहां पर एक बहुत बड़ा पर्वत था
[1:13:25] जिसके नीचे जलधारा बह रही थी और वहां पहुंचे स्नानादी आदि किया जलपान आदि किया कंद मूल फल खाए और वह ऊपर देखते हैं कुछ वानर जैसे हैं पांच लोग बैठे हुए हैं तो कहते चलते हैं ऊपर चलते हैं उनके साथ मिलते हैं बातचीत करते हैं उधर वो सुग्रीव आदि बैठा था हनुमान जी भी बैठे थे तो सुग्रीव डर गया डरा हुआ था कहीं सुग्रीव मुझे बाली ने मुझे मारने के लिए कोई यह लोग तो नहीं भेजे हैं क्योंकि बाली को एक श्राप जैसा था कि जहां सुग्रीव जिस पर्वत पर रहता था अपने अनुचरों के साथ वहां पर
[1:14:11] बाली पहुंच नहीं सकता था कि ऋषि ने श्राप दिया था उसको कि यहां नहीं आप जा सकते क्योंकि वहां पर बाली ने एक राक्षस का वध करके चारों ओर खून वैसे बहरा दिया जहां पर तब वहां पर ऋषि भी रहते थे जहां सुग्रीव बैठा है तो वहां पर जाते तो सुग्रीव डर गया कि बाली यहां तो नहीं आ सकता है। उसको खतरा था बाली का कि कहीं उसने कुछ और लोगों को तो नहीं भेजा मेरा वध करने के लिए। जाओ तो हनुमान जी को कहा तुम वेश बदल कर जाओ। ब्राह्मण का वेश धार के जाओ और पता करो यह कौन लोग हैं। फिर मुझे बताना। तो हनुमान जी ब्राह्मण का वेश धारण कर कर
[1:14:59] वहां पर राम लक्ष्मण के पास पहुंच गए। देखते ही उसका तो मन बदल गया। वो तो भक्ति थे। गुप्त भक्ति थे। अभी भक्ति पूरी प्रकट चाहे नहीं भी हुई थी। तो वहां पर वो ब्राह्मण वेश धारण किया और वह कहता है ऐसे ऐसे बातचीत करने लगा। मैं ऐसे हूं ऐसे ऐसे हूं। ऊपर सुग्रीव रहते हैं। उन्होंने भेजा है कि आप कौन है? कैसे आए हैं? और वह सारी भाषा कौन सी बोल रहा था? संस्कृत बोल रहे थे। और राम जी कहते हैं ये तो संस्कृत का बहुत बड़ा पंडित है। इतने भाषा इतनी देर तक बोलता रहा। संस्कृत की एक भी गलती नहीं
[1:15:44] है। इसने की तो कथा आती है राम जी सूर्य के मुख से उन्होंने शास्त्र वेद व्याकरण आदि सीखी थी। या प्रसंग कभी-कभी चर्चा करते हैं। तो जब राम जी ने ऐसे कहा हम सीता की खोज के लिए आए हैं तो आप सुग्रीव के पास आए हैं तो यदि वह हमारी मदद कर सके तो हम उसकी मदद कर देंगे। तो हनुमान जी को हो गया ठीक है। सुग्रीव जी को भी इशारा किया क्योंकि वह सुग्रीव उस पर्वत को छोड़कर कहीं नहीं जा सकते थे। बाली की कथा है थोड़ी बहुत सब जानते ही होंगे उसको भय था कि मेरे बाली मेरा बदना कर दे अनजाने ही गलती के कारण गलतफहमी के
[1:16:30] कारण नहीं तो बाली सुग्रीव भाई थे बाली के साथ उसकी अनबन हो गई अनजाने को सुग्रीव ने गलती कर दी थी उसके कारण दोनों में दूरी हो गई थी अब वहां पर सुग्रीव के साथ हनुमान जी के साथ राम लक्ष्मण उस पर्वत पर पड़े। शायद ऋष मुख पर्वत नाम है। तो वहां पर वह सुग्रीव बैठे हैं। उन्होंने स्वागत किया, सत्कार किया कि कैसे कैसे आप आए हैं मुझे बताइएगा। तो लक्ष्मण जी ने राम जी ने सारी कथा वर्णन कर दी कि ऐसे ऐसे हमारी पत्नी को रावण हर कर ले गया है। आप उसकी खोज में हमारी मदद
[1:17:18] कर सकते हो। तो सुग्रीव फटाफट कुटिया के अंदर गया। एक पोटली लाई। देखो इसमें कुछ एक हमने देखा था रावण किसी स्त्री को हरकर इस रास्ते से जा रहा था। स्त्री ने फिर अपने जो थोड़े आभूषण थे पोटली में बांधकर यहां नीचे गिरा दिए थे। देखो कहा यह वही आभूषण है। आपके आभूषण है। तो राम जी ने देखा यह तो वही है। तो इसी रास्ते से सीता गई है। और आगे रास्ता मिल गया। किसी रास्ते में है तो सुग्रीव कहता मैं आपकी मदद करूंगा। ऐसे करूंगा। मैं आपके साथ रावण का संहार करूंगा। अभी सुग्रीव को थोड़ा अहंकार था।
[1:18:07] तो राम जी ने फिर कहा कि मैं आपकी हर संभव मदद करूंगा। आप मेरी मदद करना। तो यहां पर कहते सुग्रीव कहता बाली है। एक प्रसंग ज्यादा लंबा नहीं करेंगे। यहां पर बाली है। मेरा भाई था। वहां पर एक भयानक राक्षस यहां पर है संहार करने के लिए। हम दोनों बाली संग्रीव उसको मारने के लिए गए और बहुत दूर तक गए और वह एक राक्षस दुंद भी राक्षस या कोई नाम और वो गुफा में प्रवेश कर गया और दरवाजा सुग्रीवारी ने बंद कर दिया जब तक मैं बाहर उसको राक्षस को मारकर ना लौटूं तू दरवाजा नहीं खोलना तो डर था
[1:18:55] दरवाजे से राक्षस भाग ना जाए तो वहां पर खूब संग्राम हुआ महीना भर तक कहते लड़ाई होती रही। उसके बाद खून का तरया जैसे बहना शुरू बाहर हो गया तो डरा हुआ सुग्रीव वो कहता है कहीं बाली का वध ना हो जाए। बाली का बद ना हो गया हो तो पत्थर और टकाकर वो भाग गया। सुग्रीव भाग गया। अगर नगरी में भाग गया तो वहां पर क्या भी मुझे लगता है बाली का तो खात्मा हो गया है। कहीं राक्षस यहां भी ना आ जाए। सबको सेनाओं को सावधान किया। आप भी डरा हुआ बैठा है। और सब मंत्रियों ने कहा कि बाली तो रहे नहीं है। कोई राजा के बिना तो
[1:19:41] राज्य कैसे चलेगा? नगरी हो गई। बाली को राजा भी बना दिया। और राजा हो गया तो तारा पत्नी उसकी भी बन गई। बाली की पत्नी उसके साथ हो गई। पहले वह सुग्रीव की ही पत्नी थी। इस प्रकार करते करते बहुत समय के बाद जब बाली आया कहते सुग्रीव ने मेरे साथ छल कपट किया। उसको बहुत गुस्सा आया। उसको बाहर निकाला कि तेरे देखता। तो वो उस जगह आके रहने लगा जहां ऋषि के श्राप से वो बाली नहीं जा सकता था। तो कथा इस प्रकार चलती है और आगे हम थोड़े थोड़े ऐसे करते हैं। अब सुग्रीव राजा बन गया है।
[1:20:27] बाली का पुत्र अंगद युवराज बन गया है। राम जी ने कहा अंगद को युवराज बनाना। आपको कोई पुत्र हो उसको नहीं गद्दी देनी है। कहा भी उस समय सात्विकता ही होती थी। यह आजकल की तुलना करके देखें। कोई बड़ा भाई आ जाता है। छोटा भाई आगे करता है। अब वह कहता है बड़े भाई बड़े भाई के बच्चे सब परे है ना इनकी जायदाद पर उसके मकानों पर मेरा कब्जा होना चाहिए। आजकल तो यह घोर कलयुग ऐसा आ गया है। लेकिन वहां ऐसी बात नहीं थी। कई बार ये कह चुके रामायण के प्रसंग में भाइयों भाइयों के प्यार साथ प्यार हो। रिश्तेदारों के साथ प्यार हो। उनके बच्चों
[1:21:14] के साथ प्यार हो और पति पत्नी का रिश्ता जो बार-बार कहते हैं यह तो सबसे अद्भुत रखता है। सबसे बड़ा रिश्ता रिश्ता जो है दुनिया का पति पत्नी ही है। वो भी तभी हो सकता है सही रिश्ता यदि पति पत्नी दोनों का लक्ष्य एक वो एक लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति ही हो सकता है और कोई लक्ष्य नहीं। नहीं तो कभी पति आगे होगा कभी पत्नी आगे होगी। कभी पति पत्नी के पीछे होगा, कभी पत्नी पति के पीछे होगी। यह तो एक रास्ता नहीं बना। तो वहां पर ऐसी अभी स्थिति थी। तो वहां पर अंगद को युवराज बना दिया। तारा पत्नी बन गई
[1:22:00] और सुग्रीव राज्य कर रहा है और राम लक्ष्मण आदि हनुमान राम लक्ष्मण और वहां पर बैठे हुए हैं बाहर बैठे पर्वत पर थोड़ा समय बीत गया वर्षा ऋतु आई फल फूल ऐसे हो गए तो राम जी कहते हैं अभी सुग्रीव की कोई खबर नहीं आई है सीता की खोज में उसने की है कि नहीं की है लक्ष्मण जाकर पता करो क्योंकि राम जी तो नगरों में जा नहीं थे। उनकी प्रतिज्ञा थी। राम जी ने किसी भी नगर में 14 वर्ष में कभी प्रवेश नहीं किया। ना केवट के ग्रामों में ना सुग्रीव के ग्रामों में ना लंकापुरी में कहीं भी प्रवेश नहीं किया।
[1:22:47] तो इस प्रकार जब वो लक्ष्मण जी सुग्रीव के पास गए। सीता का कुछ पता लगा। कहते जी अभी मौसम ठीक हो रहा है। ऐसे ऐसे मैं अभी सब वानरों को भेजता हूं। तो वानरों को भेजा और 10 खास जो वानर थे सुग्रीव के यह अंगद आदि नल नील आदि जामवन आदि हनुमान आदि उनको तैयार किया कि आपकी मुख ड्यूटी है सीता की खोज करो और एक महीने के अंदर ही आप खोज करके मेरे पास खबर दो नहीं तो मैं सबका वध कर दूंगा।
[1:23:33] तो इधर फिर वह सुग्रीव यह हां बाल के व की बात है। वो भूल गए बीच में। तो वहां पर सुग्रीव और राम जी ने कहा कि मैं तेरी मदद करूंगा। यह प्रसंग बाद में आता है सीता खोज का। तो वहां पर राम जी ने कहा तेरी बाली से बनती नहीं है। उसका अपराध भी है। गलती उसने भी की है। आपकी गलतफहमी से वह बिल्कुल ऐसी गलती कर दी है। तो ऐसा करो बाली को युद्ध के लिए ललकारो। सुग्रीव को कहा। आप सुग्रीव को सुग्रीव को कहा बाली को
[1:24:21] ललकारो कि मेरे साथ आकर युद्ध करें। तो सुग्रीव डरने लगा। कहते राम जी कहते कोई चिंता ना करो मैं तुम्हारे साथ हूं। अधर्म का नाश करना ही मेरा धर्म है। तो वहां पर जब सुग्री बाली के पास यह संदेशा गया तो तारा घबरा गई। उसकी पत्नी जो थी पहले कि यह राम जी कोई आए हैं। लगता है भगवान के अवतार हैं। गड़बड़ ना हो जाए। तो बाली कहता है कोई चिंता ना करो। यदि अवतार हैं तो अवतार के साथ मैं लड़ भी जाऊंगा या उनकी शरण में चला जाऊंगा। उनके पक्ष में हो जाऊंगा। तो बाली आ गया। राम जी एक बाण बन लिए। एक
[1:25:09] वृक्ष की ओठ में खड़े हैं और बाली और सुग्रीव का युद्ध होने लगा। थोड़ी देर में सुग्रीव तो गिर गया, घबरा गया, डर गया। हाय हाय करने लगा और युद्ध छोड़कर वापस आ गया राम जी के पास। कहता मैं नहीं युद्ध लड़ सकता। तो राम जी ने तो अधर्म का संघार करने के लिए ही बाली को मारने के निमित्त से बाली के पास युद्ध करने के लिए उसको भेजा था। अब वहां पर उसने फिर राम जी ने उसके चरण पैरों के हाथों के साथ स्पर्श किया सारे शरीर का ऊपर से लेकर नीचे तक तो सुग्रीव की थकावट सारी दूर हो गई और उसने कहा गले में एक माल फूलों की माला डाल दी मुझे पहचान बनी रहे नहीं तो बाली और सुग्रीव
[1:25:56] दोनों ही तुम दोनों भाई एक जैसे दिखते हो तो वहां पर सुग्रीव फिर गया युद्ध हो रहा था जब देखा पूरा युद्ध करते करते करते सुग्रीव हार जैसे रहा लेकिन इस बार वह दौड़ा नहीं राम के वचन मानकर गया था तो राम जी ने एक बाण मारा हृदय में बाली का खात्मा कर दिया मर जैसा गया मरा नहीं अभी तो बाली के सम्मुख राम जी प्रकट हो गए तो बाली कहता है प्रभु आपने मेरा संहार क्यों किया सुग्रीव आपका इतना प्यारा क्यों हो गया मैं आपका प्यारा क्यों नहीं हूं तो राम जी उत्तर देते हैं
[1:26:42] यह बहन कन्या और पुत्रवधू और जो भी स्त्री शरीर है बहन है कन्या है और दूसरी भी है और उसके बाद पुत्रवधू है और चौथा नंबर लिया अनुज की पत्नी छोटे भाई की पत्नी उसके साथ जो व्यभचार करता है वह राजा का धर्म है कि उसका वध कर दे। तुमने यह कर्म किया है। यह चारों स्त्रियां कन्या के समान ही होती हैं।
[1:27:29] अनुज की पत्नी वहां पर वह बाली को लेकर कह रहे हैं। इस वास्ते आप अधर्मी हो गए थे। मैंने आपका संार किया है। लेकिन आप हमारे पास जुड़े भी हो। आप थोड़ा राम रूप में इस रूप में पहचानते भी हो। आपकी सद्गति ही होगी। तो यहां से फिर और आगे कथा चलती है जो भी प्रसंग कर चुके थे थोड़ा सीता की खोज की योजना सीता की खोज कैसे करनी है तो सब लोगों ने कहा सुग्रीव आदि आगे होके सब वानरों को कहा सारे दसों दिशाओं में भेज दिया पता नहीं किधर गया होगा लेकिन ये खाल के दक्षिण दिशा में तो गए हैं वहां पर हनुमान जी अंगद जी नल नील आदि
[1:28:15] जावन आदि और बहुत से 10 लोगों का ग्रुप बना दिया। उसको कहो जाओ आप सीता की खोज करो और जब तक सीता की खोज ना करे वापस नहीं आना और एक महीने के अंदर अंदर ही सारी खोज करनी है। तो सारे चले गए वानर हनुमान जी आदि चले गए। जगह जगह भटकते खोजते हुए ऐसे ऐसे ऋषि मुनियों से पता पूछते हुए किसी ने पता पूरा पता ही नहीं था किसी को वहां पर समुद्र के किनारे जब थक गए समुद्र के किनारे एक गुफा थी सारे वानर थके हुए हैं। चला फिरा जाता नहीं। पानी भी इधर-उधर
[1:29:03] कहीं नहीं मिल रहा है। तो कहते ऐसे तो हमारा खात ही हो जाएगा। तो वहां पर एक गुफा थी और गुफा के अंदर गए शायद इसके अंदर पानी मिले तो वहां पर एक झरना बिल्कुल शांत बिल्कुल सुंदर मीठा पानी झरना बह रहा था वहां पर वो पानी पिया शरीर में कुछ ताजगी आई वहां पर एक पर्ण कुटी थी एक कुटिया बनी हुई थी तो वहां पर यहां कौन रहता है इस गुफा में तो वहां पर देखा एक देवी तापसी तपसियों का वेश धारण किए हुए वहां पर अकेली रह रही है। यहां पर यह प्रसंग हम बार-बार कह रहे हैं। उस समय स्त्रियां भी
[1:29:50] जंगलों में ताप करती थी, अकेली भी करती थी और भगवान की आराधना भी करती थी। वहां ऐसा वातावरण था और चाहे रावण आदि निश्चया वहां तब भी जंगलों में रहती थी। तो स्वयं प्रभा वहां पर बाहर आई। कहते जी आप कौन हो? कहां से आए हो? तो जामवाना ने आगे आकर जब सबसे बड़े शरीर वही थे। सबको उसको बताया कि ऐसे ऐसे हम अयोध्या से आए थे। सीता इनकी हमारे भाई की पत्नी है। उसको रावण हर कर ले गया है। पता नहीं किस दिशा में ले
[1:30:37] गया है। हम खोज करने के लिए कर रहे हैं कि कहां सीता मिलेगी। तो उसका नाम था स्वयं प्रभा। वो बड़ी प्रसन्न हुई। कहते हैं यहां पर मेरे जो गुरु रहते थे बहुत हजारों वर्ष पहले उन्होंने कहा था कि त्रेता युग में राम जी का अवतार होगा और वह सीता की खोज करते करते उनके दोनों भाई राम लक्ष्मण और यहां पर आएंगे तू उनसे राम का पता तुझे मिल जाएगा राम कहां रह रहे हैं तो उन्होंने कहा मैं तो राम की प्रतीक्षा में यहां बैठी हुई हूं तो मुझे राम बताओ कहां पर है? कहते वहां
[1:31:24] पर वह किष्किंदा नगर में है। तो उस स्वयं प्रभा ने यह भी कहा मैं राम जी के दर्शन करने के लिए जाऊंगी। आप गुफा से बाहर जाइएगा। समुद्र की ओर जाइएगा। आपको रास्ता निश्चित ही मिलेगा। इसमें कोई शक नहीं है। स्वयं प्रभा किंधा में पहुंच गई। राम जी को प्रणाम किया। दंडवत नमस्कार किए और कहते मैं आपकी शरण लंबी चौड़ी स्तुति प्रशंसा सब कुछ किया तो मुझे अब आगे का रास्ता बताइएगा तो राम जी ने कहा जाओ बद्रीवन में जाओ वहां पर जाकर अपने तप को और आगे बढ़ाओ तो स्वयंपरा वहां पर बद्रीिका आश्रम में
[1:32:10] चली गई वहां पर वह तप करती रही और इधर जो दसों वानर हैं सीता की खोज कर रहे हैं। लेकिन कोई अता पता नहीं। लगता है एक महीना पता नहीं पूरा होने वाला है। थोड़े दिन रह गए हो तो इससे अच्छा है हम मर ही जाए। प्रायोपवेशन व्रत अन्न जल छोड़ दिया। सब कुछ छोड़ दिया। कुछ भी नहीं कह रहे हैं। इसे तो मरना अच्छा है। जब तक सीता की खोज ना कर सके। तो इस प्रकार वहां पर वह चल रहे हैं। कैसे घूम रहे हैं? वहां इधर उधर समुद्र किनारे घूमते हुए उनको एक विशाल काय
[1:32:56] पंछी का गिद्ध का दर्शन हुआ। गिद्ध के पास पहुंचे तो बातें कर रहे हैं हमसे तो धन्य जटायु जो राम की रक्षा में राम की रक्षा करते सीता की खोज में मदद देते हुए उसने प्राण त्यागे। हम तो सीता की खोज कर ही नहीं सके। ऐसे जटायु की चर्चा कर रहे हैं तो संपाती उसने सुन लिया। कहते मेरे भाई का नाम कौन ले रहे हैं? वह संपाती जटायु का बड़ा भाई था। खैर पुरानी लंबी कथा है और वहां पर उसके समुद्र सूर्य की यात्रा करते करते पंख खत्म हो गए थे और वहां पर वह बैठा हुआ है। क्या करें? कैसे करें? जब राम की चर्चा सुनी राम के भक्तों के
[1:33:44] साथ संपाद का मेल हुआ बहुत अंदर खुशी की तरंगे उठने शुरू हो गई तो संपाती कहता है मेरी दृष्टि बहुत दूर तक जाती है पर्वतों देखकर बहुत दूर देखता हूं रावण इस रास्ते से लंका में ले गया है सीता को वहां पर कहीं कैदी किया हुआ है हां आप जा सकते हो लेकिन एक ही समस्या है कि समुद्र को लांग कर जाना पड़ेगा। कोई पुल तो है नहीं। तो जब ऐसा उनको संकेत मिल गया तो वानर भी प्रसन्न हुए। थोड़ी धुन लगा लेते हैं हल्की सी।
[1:37:16] अब ये समस्या आ गई 100 योजन जैसे बहुत लंबा रास्ता है इसको पार कैसे करेंगे तो सब अपनीपनी सामर्थ बताते हैं। कोई कहता है मैं 10 योजन उड़ान भर सकता हूं। कोई 20 योजन कि 30 योजन 40 योजन अंगद कहते हैं बाली के उत्तर मैं 100 योजन भी लांग सकता हूं। लेकिन शायद वापस आने की ताकत ना रहे। त्यावन कहते मैं तो वृद्ध हो गया हूं। अब सबके सामने समस्या आ गई। कौन यह समुद्र का पार करके लंका में पहुंचेगा और कहां लंका में सीता का निवास है। कैसे
[1:38:04] उनके साथ बातचीत करेगा? तो जामवन कहते हैं मैं आपको बताता हूं। कौन करेगा? हमारी मंडली में ही वह बैठा हुआ है। तो हनुमान जी को कहा हनुमान जी अपने आप को तब तक अपने जो वास्तविक शक्ति है उसको भूल चुके थे। किसी कारण से बचपन में कुछ ऐसा हुआ वैसे विद्वान थे सब कुछ थे लेकिन जो अंदर ऊर्जा शक्ति परमेश्वरी उसको वो भूल चुके थे तो जामवान जी ने यह कहा यह हनुमान है इनका तो जन्म ही राम काज के लिए हुआ है। पहले ये अपने काम करते रहे सुग्रीव के काम करते रहे। इधर-उधर तपस्वी शिव के साथ रहते
[1:38:51] रहे तो राम का कार्य उत्पन्न हुआ है। सामने प्रस्तुत हुआ है। राम काज के लिए ही करने के लिए ही हनुमान जी का अवतार हुआ है शरीर में। तो यह राम काज करेंगे। तो हनुमान जी को तो कुछ याद ही नहीं था यह चीजें। तो वहां पर आता है को नहीं जानत है जग में कभी संकट मोचन नाम तहारो। तुलसीदास जी ने ऐसी स्थिति की है। तो इस प्रकार से जामवंत जी ने खूब तरीके से उसको बताया कि हनुमान जी आपका तो जन्म और किसी कार्य के लिए हुआ ही नहीं है। इसके अतिरिक्त यदि आप सेवा नहीं करेंगे तो आपका जन्म व्यर्थ हो जाएगा। भाई वह
[1:39:38] व्यर्थ तो होना नहीं। सारी दवी शक्तियां आपके साथ है। तो राम जी को भी पूरा जोश आ गया। अच्छा यह बात है था तो अंदर ही जैसे शब्द सुनते ही अंदर चेतना जाग जाती है तो उनकी शक्ति का जागरण हो गया हनुमान जी का और भयो भूराकारा एक विशाल आकार धारण कर लिया कहते मैं जाऊंगा जिस गिरी के ऊपर जो पास ही कोई पब था समुद्र के किनारे उसके ऊपर चढ़ गए और वहां वहां से उन्होंने जैसे जोरों से छलांग लगाई और जिस पर्वत पर खड़े होकर छलांग लगाई थी वह पर्वत तो पाताल में ही धंस गया
[1:40:26] और राम जी आकाश मार्ग से है ना जैसे ज चले ही राम का बाणा तैसे ही हनुमान जी ने उड़ान आकाश में भर दी है। समुद्र के ऊपर तैरते हुए बाण की तरह सीधे अमोग बाण इस प्रकार वह समुद्र के ऊपर तैरते हुए थे। पवन पुत्र ही थे भाई वो मनुष्य भी नहीं थे ही पवन के पुत्र। पवन की शक्ति जागृत हो गया। मैं कैसे कहां आया हूं? किस कार्य के आया हूं और राम काज के लिए मैं आया हूं। तो हनुमान जी सीधे आगे चले। आगे जाते
[1:41:11] ने सोचा कि राम जी शक्ति हनुमान जी शक्तिशाली तो हैं क्या ये राम का कार्य कर सकेंगे देवताओं का कार्य सिद्ध कर सकेंगे थोड़े इनके बल बुद्धि की परीक्षा ले ले तो सुरसा राक्षसी वहां पर जंगल समुद्र में रहती थी तो समुद्र सुरसा रासी रास्ता रोक कर खड़ी हो गई वह विशाल आकाश का है तो वह रास्ता रोक कर खड़ी हो कि मुझसे मिले बगैर आप आगे नहीं मैं आपको आगे नहीं जाने दूंगी तो क्या करना है मेरे मुख में प्रवेश करो है ना यदि मुख में प्रवेश नहीं करोगे तो मैं तुम्हें छोडूंगी नहीं तो हनुमान जी कह अच्छा
[1:41:57] तो सुरसा ने जितना मुख फैलाया हनुमान जी ने उससे दुगना कर दिया सुरसा ने और मुंह फैलाया हनुमान जी ने और व्यापक मुंह कर दिया। पवन पुत्र थे। ऐसी चीजें संभव है। कोई नाटक की कहानियां नहीं है। अपने तो पंचभूत धारी ऐसे मनुष्य हैं। जड़ तत्वों की पृथ्वी जल तत्वों की प्रधानता है। उनके शरीर ही अलौकिक थे। तो जैसे जैसे जैसे सुरसा बदन बढ़ावा वैसे ही राम काज करिए विस्तारा। इस प्रकार करते करते जब सुरसा ने बहुत बड़ा मुकर लिया तो राम जी मच्छर की तरह छोटे से हुए अंदर गए घूम फिर के बाहर आ गए
[1:42:43] तो सुरसा प्रसन्न हो गई मैं तो तुम्हारी बल बुद्धि की बल तो देख लिया बुद्धि भी देख ली है उसकी परीक्षा ले रही थी जाओ आपका कल्याण हो राम का कार्य सीता की खोज पूर्ण हो इस प्रकार आगे चले जा रहे हैं। एक और राक्षसी समुद्र में इस प्रकार के बहुत जीव थे। एक और राक्षसी रहती थी। उसमें अद्भुत राक्षसी थी सचमुच। उसमें एक बड़ी विलक्षण शक्ति थी। ऊपर जो पंछी आदि जानवर जो कुछ भी उड़कर जाते थे। उनकी छाया नीचे पड़ती थी। वो छाया को ही खींचकर उसको जो भी उड़ने वाला होता था। जानवर हो, मृत राक्षस हो
[1:43:29] कुछ भी हो उसको अपने पास खींच लेती थी और उसको खा जाती थी। अब देखिए मनुष्य की छाया क्या होती है? शरीर से अलग होती है। उस राक्षसी में ऐसी शक्ति थी कि उसकी छाया उससे अलग नहीं थी। और इसी शक्ति का वह दुरुपयोग करती थी। किसी की भी छाया जब उसकी चेतना का विस्तार हुआ उसकी छाया उससे अलग नहीं होती थी। तो किसी की भी छाया को वो उसके साथ जोड़ सकती थी। उसकी छाया तो उससे जुड़ी ही थी तो अपनी चेतना का विस्तार करके किसी की छाया
[1:44:15] को भी उसके साथ जोड़ सकती थी जिसकी छाया होती थी। तो उसने जब हनुमान जी की छाया पानी पर पड़ी तो उसने छाया के बल पर हनुमान जी को खींचना शुरू कर दिया नीचे की ओर हनुमान जी कहते यह क्या कर रहा है कौन कर रहा है नीचे देखा राक्षसी पूरा ऐसे भयंकर रूप धारण कर रही है अच्छा यह रिकवर्ड कर रही है तो हनुमान जी ने नीचे से खूब थप्पड़ फूंके मार मार के उसको खत्म ही कर दिया और आगे रास्ते पर चले आ गए समुद्र ने कहा मैनाक पर्वत को। समुद्र के अंदर भी पर्वत होते हैं कि हनुमान जी काफी देर से उड़ान भर रहे हैं। कहीं थक ना गए हो तू मैना पर्वत तू ऊपर उठ
[1:45:01] और राम जी को थोड़ा विश्राम करके फिर आगे जाए। तो मैनाक पर्वत समुद्र में प्रकट हो गया और हनुमान जी से प्रार्थना करने लगा। आप थोड़ा सा यहां पर विश्राम कीजिएगा और फिर तरोताजा होकर आप लंका की खोज कीजिएगा। सीता की खोज करिएगा लंका में जाकर। तो हनुमान जी कहते हैं राम काज कीने बिना मोह कहां विश्राम। जब तक राम का कार्य पूरा नहीं होता है, मेरे विश्राम का नाम ही नहीं है। यहां पर राम का आज का हम सेवा के साथ जोड़ सकते हैं। यह सेवा सेवा ही तो कर रहे हैं। हनुमान जी
[1:45:49] सीता की खोज राम जी की सेवा ही तो कर रहे हैं। तो जब तक यह कार्य पूरा नहीं होता है, मुझे कोई विश्राम नहीं। मतलब मुझे कोई थकावट नहीं है। इसी प्रकार सेवा करते हुए भी कलयुगी शरीर है। थोड़ी थकावट हो सकती है। थोड़ा विश्राम करें, तप करें। फिर सेवा में लग जाए। तो यहां पर यहां पर कथा पुरानी आती है। यहां पर एक संत थे। संत का नाम हमें याद नहीं है। कमली वालों के समय की बात है। कमली वाले ऊपर कमरे में यहां पीछे कमरा बना हुआ था। वहां से सारा नीचे तक का दिखाई देता था। वह लकड़ी चीर रहे थे। हाथों से चीर रहे थे। और कमली वाले ऊपर से
[1:46:38] देख रहे हैं और चीर रहे हैं और क्या हुआ? हाथ थकने शुरू हो गए। फिर उन्होंने क्या किया? सारे शरीर से। पहले तो हाथ से सेवा हो रही थी। फिर उन्होंने सारे शरीर से सेवा चलाना शुरू कर दिया। सारे शरीर में ऊर्जा जागी और वो भी थक गया। थक गया का मतलब क्या है? सेवा में थकावट नहीं है। चेतना अंदर जानी शुरू हो गई। शारीरिक थकावट माने हुई। लेकिन मन में थकावट नहीं आई। मन और भी क्रियाशील मन और भी जागृत हुआ और सारी शकीर की थकावट मतलब शरीर से अहम
[1:47:25] बुद्धि खत्म हो रही और सारी थकावट मन और भी चैतन्य होता गया तो ऐसे समय कमले वाले ने कहा बस अब नहीं और काम से और सेवा नहीं करो और जैसे ही हुक्म हुआ कि और शांत बस एकदम अंदर चले गए यह हनुमान जी कर रहे हैं। हमारे शरीर में मह बुद्धि होने के कारण मन बाहर होने के कारण सेवा कार्यों में थकावट होती हमसे नहीं होता। नहीं होता तो कोई बात नहीं। उसी समय ध्यान करो, जाप करो, साधना करो। उसी समय मन को अंदर जागृत करने की कोशिश करो तो वो सेवा नम्रता से सेवा
[1:48:10] करो। सेवा करते-करते शरीर थक भी गया। मान लीजिए थक गया। सच में थक गया है लेकिन मन नहीं थके कैसे मतलब मन नहीं थके का मतलब क्या है और गहराई से जाप शुरू हो जाए और ध्यान गहरा हो जा चला जाए है ना तो ये हनुमान जी ने सेवा की राम काज किने बिना मोह कहां विश्राम उनको तो शरीर की भी थकावट की शरीर से भी कार्य करना था इस प्रकार कार्य करते करते आगे समुद्र चलते चलते समुद्र पार पहुंच गए द्वार पार पर द्वार पर एक पहरा देने वाली राक्षसी बैठी थी उसने रास्ता रोक लिया तो हनुमान जी ने एक
[1:48:58] थप्पड़ मारा बेहोश हो गई तो जब होश आई कहते मुझे यह पहले ही ब्रह्मा जी ने कह दिया था जब तुम एक वानर के थप्पड़ मारने से बेहोश हो जाएगी इसका मतलब है रावण के संग संहार का समय आ रहा है। तो मैं तो राम की भक्त हूं। भगवान की भक्त हूं। ये मजबूरी से यहां पर द्वारपाल का काम कर रही थी। मुझे बड़ी खुशी है कि आप आए हो। आप आगे जाओ। तो वहां पर हनुमान जी एक मशक रूप छोटा सा रूप धारण कर है ना। क्या कहते हैं उसको? मच्छर का रूप धारण करके। अब कहते बड़े रूप में तो जाऊंगा नहीं और
[1:49:43] जगहजगह वह लंकापुरी में देख रहे हैं राम कहां है? राम सीता कहां है? सीता कहां है? सीता कहां है? कहीं भी नहीं मिला। रात के अंधेरा है। रावण के महलों में गया। रावण सो रहा है। सीता वहां भी नहीं मिली। फिर वो विभीषण के साथ उसका मेल हुआ। वह देखता है ऐसा सुंदर जहां पर वो मंत्रों का उच्चारण है। यह राम के आयु बने हुए हैं तो बहुत प्रसन्न हुआ। तो वहां पर उसने अपना आकार प्रकट किया हनुमान जी ने। विभीषण से बातचीत हुई तो विभीषण राम को पहले प्रश्न कि यहां पर लंकापुर में आप कैसे रह रहे हो? यहां तो सब
[1:50:28] राक्षसों की ऐसी ऐसी नगरी है तो वह कहते हैं दंतन विच जीभचारी ऐसे मैं वहां पर रहता हूं ऐसी हमारी यहां पर रहनी है तो फिर उसने सीता का पता पूछा ये चर्चा कर चुके हैं पहले फिर वो सीता का पता पूछा उसने कहा अशोक वाटिका है रावण के महलों से थोड़ी दूर वो जंगल जैसा है पूरा पूरा फलाहार बगीचा बगीचा लगा हुआ वहां पर सीता को कैद रखा हुआ है। वहां आप पर जाओ वहां पर सीता रहती है। चलो इतने काफी है। फिर सीता की राम से भेंट लक्ष्मण से हनुमान जी से भेंट हुई। आप उसमें बातचीत हुई। अग्नि दहन लंका दहन
[1:51:17] हुआ। ये आगे चर्चा थोड़ा समय ज्यादा लग जाएगा। अभी यहां समाप्त कर लेते हैं। यह रामायण का पाठ चलो नहीं करें। ऐसे कर लेते हैं।
[1:58:03] बस मैं है जो भगवान के चरणों में शब्द के स्मरणों में मनन में रत है बस ऐसी में संत में सात में शुद्ध में मन अपने सबसे नीचा जो अपने मन में सबसे नीचा है ऐसी जो मैं ऐसा मैं हूं मैं हूं ही नहीं एक प्रकार से होता हुआ भी बिल्कुल हूं ही नहीं धारणा करते चले जाए और थोड़ा सा वाणी को भी अंदर कहते हैं
[1:59:03] मैं सबसे नीचा, सबसे नीचा, सबकी चरण रज जैसे मैं हूं ही नहीं। यदि कोई ऐसा है तो बाहर पिंड ब्रह्मांड में उसकी चेतना व्यापक होती चली जाएगी। ब्रह्म की तरह होती चली जाएगी। यह तो मैं ब्रह्म ज्ञानी मैं विश्वात्मक नहीं है तो भूल भुलैया है। मैं तो हूं ही नहीं। मैं ब्रह्म रूप अहंकार मैं ब्रह्म रूप कैसे हो सकता हूं। मैं तो हूं ही नहीं। जब तक अहंकार अज्ञान आदि खत्म नहीं होता यह ब्रह्म रूप होगा कैसे
[1:59:51] तो मैं हूं ही नहीं यह धारण करें मैं नहीं मैं नहीं और क्या है गुरु शब्द ही है गुरु शब्द ही है जो मन गुरु शब्द का श्रवण करता है उसको सुनता है वही मैं है वही मन है अहम है ही नहीं। इस प्रकार अपने मन को शांत रखें। बिल्कुल स्थिर रखें। ढीला छोड़े। शव की तरह यह शरीर आसन शव रूपी ये शरीर रूपी आसन शरीर को आसन ही बना ले।
[2:00:37] जैसे और आसन होते हैं। नीचे दरी बिछाए, कुशासन बिछाया, गद्दा बिछाया उस पर हम बैठते हैं। उसके ऊपर बैठते हैं। उस आसन से हम अलग होते हैं। तो यहां पर शरीर को ही आसन बना लीजिएगा। स्थूल शरीर को तो पहले आसन बना ही लीजिएगा। आसन तब जैसे आसन हिलता जुलता नहीं है। इसी प्रकार शरीर को शव जैसा बना दें। जरा भी बाहर की ओर इंद्रिय छिद्रों की से इसके मन प्राणों की गति ना हो तो शरीर को बिल्कुल ढीला बिल्कुल रिलैक्स। लेकिन मन प्रचंड हो। प्राण की धारा झंजावात की
[2:01:25] तरह शरीर के अंदर इंद्रिय चद्दों के अंदर होती हुई सारे सूक्ष्म में गमन करें। कह रहे कि शरीर तो ढीला छोड़ दिया मन भी सुस्त हो जाए। शरीर तो ढोला छोड़ दिया और श्वास भी ऐसे चल रहा है जैसे आ ही नहीं रहा। शस पूरी शक्ति है वह प्राण शक्ति है क्रिया शक्ति है और मन को शब्द के साथ जोड़े ज्योति स्वरूप बनाए शब्द के अर्थ में लीन हो जाए वही ब्रह्म पद है तो धारणा भी करते रहेंगे शरीर को ढीला छोड़कर शब्द की तरह बनाकर एक एक अंग वहां वहां पर अपने आप को देखें शब्द
[2:02:13] मानो वहां भी सब जगह ही है। मस्तक को देखें मन ही मन बालों को देखें और ऊपर तक छत तक जैसे मेरा मन विस्तृत हो गया। अंदर का कैदी नहीं रहा। दाएं आंख का अनुभव करें। बाई आंख का अनुभव करें। दाएं कान का अनुभव करें। बाएं कान का अनुभव करें। दाई नासिका छिद्र बाई नासिका छिद्र ऊपर का होठ नीचे का होठ जि्हा इसके बीच में जो 32 जितने दांत हैं और कंठ गला कंठ उसमें प्रवेश करते जाए नीचे जाते चले जाए और वहां से कंधे दाएं कंधे बाया कंधा कोहनी
[2:03:00] दूसरी कोहनी हथेली दाई हथेली बाई और उंगलियां सब जगह अपने प्राण को मन को फैलाते चले जाएं। हृदय में आए। कंठ से अब देखिए कंठ से सीधे हृदय के अंदर नाभि के अंदर और पीठ में कंठ से नीचे सूक्ष्म पथ नीचे मूलाधार जंघा घुटने पैरखने उंगलियां सब जगह अपने मन को देखते जाएं देखते चले जाएं और फिर बिल्कुल ऊपर चेतना मूलाधार से
[2:03:50] नीचे चेतना उसके बीच हृदय में स्थित हो जाएं। ऊपर मस्तक का विस्तार ऊपर तक बालों से बाहर तक नीचे मूलाधार से धरती से धरती से नीचे तक और हृदय में स्थित करें अपने मन को या कंठ में करें एक केंद्र बना लें दोनों के बीच मस्तक और मूलाधार के बीच एक कंठ केंद्र बना लें। हृदय करें या जिवह मूल करें और वहां से शब्द का उच्चारण हो। शब्द का उच्चारण का मतलब यही है मन से करें नहीं हिले आंखें नहीं हिले पुतलियां नहीं हिले अंदर की ओर हो अंदर की ओर आंख पूरी खिलती चली जाए पलकें जरा नहीं हिले शरीर
[2:04:38] जरा नहीं हो स्थूल शरीर और अंदर ही अंदर अपनी चेतना को ले जाते जाए फैलाते जाएं वहां पर स्थित हो जाए रोम रोम में मेरा शब्द मैं भी शब्द मन भी शब्द और रोम रोम में भी मेरा शब्द स्थूल सूर्य सूक्ष्म शरीर कारण शरीर सब में शब्द ऐसी धारणा करें आप ये कहते ये तो नहीं हो रहा ये तो कठिन है ऐसी मिथ्या धारणा करनी गलत धारणा करनी ही नहीं है जब परमेश्वर मेरे हृदय बैठे हैं जब गुरु गुरु शब्द मेरे हृदय में स्थापित किया गया है तो उसका चिंतन करें। मन में
[2:05:26] उल्टे सीधे फुरने बेशक कितने भी आ जाए आ जाए कोई परवाह नहीं कोई चिंता नहीं कोई निराशा नहीं कोई शौक नहीं तत्काल शब्द तत्काल ऐसे पुरना पता लगा बाहर आ गया है उसी के साथ ही शब्द का ध्यान करें मन ही मन श्रवण करें मन ही मन उसको उच्चारण करें
[2:06:15] गले के ऊपर का हिस्सा पूरा पूरा खुल रहा है। गले के नीचे का हिस्सा छाती सूक्ष्म में पूरी व्यापक हो रही है। नाभि अंदर पीछे सारा धारणा तो कर ही सकते हैं। छाती अंदर बाहर सब विकसित हो रही है। पेट अंदर बाहर सारा फैल रहा है। नीचे तक शब्द की तरंगों से प्राण शक्ति की टंको से यदि कोई मन में अनात्मना अनायास आ गया
[2:07:02] तो कोई चिंता ना करें। एकदम जब पता लगा मन बाहर गया उसी क्षण फिर शब्द में लीन हो जाएंगे। स्थूल शरीर का बोध ही खत्म है। सबका क्या बोध? सारे हॉल में कोई दूसरा बैठा ही नहीं है। यह भी धारणा करें। दूसरा कोई यहां पर है ही नहीं। दूसरा शरीर कोई है ही नहीं। दूसरा जीव कोई है ही नहीं। मैं ही सब जगह
[2:07:48] व्याप्त हूं। और यही सच्चाई है। यही सत्य है। जब इंद्रियों छिद्रों से हम बाहर की ओर देखते हैं तो बाहर जो दिखाई दे रहा है वही एक महा साधक की वह तो रात्रि है।
[2:08:34] उस रात में भी हम अंदर ही चेतना में अपने आप में जागे रहे। इधर भटकना उधर भटकना इस रात्रि में भटकना नहीं है मन प्राण बुद्धि के द्वारा जो रात है बाहर का नानात्व है उसमें केवल मैं ही हूं दूसरा कोई है ही नहीं और शरीर में रहते हुए शरीर के अंदर यही धारणा करें और जो पिंड के अंदर जागृत होगा वही बाहर भी है पहले अपने अंदर चेतना जगाए फिर बाहर ही वही है जो अंदर है।
[2:09:21] आंखें अंदर की ओर जा रही है। ऊपर की ओर जा रही है। जीभ पीछे की ओर जा रही है। ऊपर की ओर जा रही है। नीचे की ओर जा रही है। सारा शरीर ऊपर नीचे सब जगह व्यापक होता चला जा रहा है। अब समाप्ति करते हैं। समाप्ति का मतलब पूर्णता। पूरा नहीं पूर्णता। अब इस पूर्णता को व्यवहार में भी चलते फिरते भी बोलते हुए भी कार्य करते हुए भी बनाए रखना है और वहां भी व्यवहार में भी जब कभी मन बाहर हो जाए तक्षण यह याद करें मैं परमात्मा से जुदा नहीं
[2:10:08] हूं। जिसकी मैं सेवा कर रहा हूं उससे मैं जुदा नहीं हूं। और थोड़ा सा शस रोक के आंखें अंदर पूरी खोल के गला ऊपर से नीचे तक पूरा खोल दे अंदर यज्ञ छिद्र को अंदर की ओर नीचे तक पूरा खोल के स्थिर हो जाए अब धीरे-धीरे आंखें खोलें।
[2:11:47] आखरी बात यही है। मुझे मुक्ति मिले। यह तो अहंकारी कहते हैं। मेरी समाधि लगे। यह तो अहंकारी चर्चा करते हैं। मेरा मुक्ति हो जाए, कल्याण हो जाए, मेरा ज्ञान खत्म हो जाए। जब तक ऐसी चिंतन है, धारणाएं हैं, ना ज्ञान खत्म होगा, ना ध्यान लगेगा, ना अंदर का रास्ता खुलेगा। तो ये धारणा यही करें।