Spoken discourse excerpts (Hindi). Sung hymns, repetitive chanting, and standalone devotional recitation have been omitted. Verses quoted within the teaching and spoken meditation instructions are retained. These excerpts are based on automatically generated captions and have not been checked against the audio; recognition errors may remain.
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[27:56] सारी संगत दी जय जय जड़े नहीं आए उन्हें दी भी जय जय है सब जय जय जय जय का मतलब क्या हुंदा जित होवे जीत हो जावे किथे थे अकाल पथ दे रास्ते ते परमात्मा दी प्राप्ति के रास्ते पर परम पद की प्राप्ति के रास्ते पर हमारी जय हो सबकी जय हो निराश नहीं हो बस इतना ही बात है उदास नहीं हो शोक नहीं करें कि रास्ता कठिन है मुश्किल
[28:44] है नहीं होगा इसलिए यह बार-बार कहते हैं कि सबसे सरल और सबसे सीधा रास्ता अपने स्वरूप की प्राप्ति। परमानंद की प्राप्ति। इससे सरल सीधा रास्ता और दुनिया में कोई है ही नहीं। कोई भी दुनिया का कार्य करना हो ना। कर सकते हैं स्वतंत्र रूप से। कभी किसी के पीछे भागो। किसी उसकी गुलामी करो। उसकी सिफारिश लगाओ। उसकी मदद लो। बहुत बहुत जगह पराधीनता पराधीनता और जो एक रास्ता नहीं खुला तो कभी फिर बंद
[29:31] जैसा ही हो जाता है। एक परमात्मा की प्राप्ति का रास्ता ही ऐसा है। बस इतनी बात है। जिज्ञासा हो परमात्मा की प्राप्ति की। तड़प हो परमात्मा की प्राप्ति की और गुरु शरण में चल के अपने थोड़ा बहुत अहम का समर्पण कर दें तो रास्ता बहुत आसान है। इसी वास्ते विवेक चूड़ी में शंकराचार्य ने लिखा है एक जिज्ञासु एक विरक्त जिज्ञासु यह संसार क्या है? ये क्या हो रहा है संसार में? कहां से आया? क्यों मैं इस बंधन में फंसा हुआ हूं?
[30:17] अब मैं मुक्त होना चाहता हूं। परमानंद की प्राप्ति करना चाहता हूं। तो वह वैराग्य पूर्वक श्रद्धा पूर्वक गुरु की शरण में गए। और गुरु ने क्या कहा? यह श्लोक है। बहुत ही खास समझ लेना चाहिए। जब जिज्ञासु श्रद्धा भक्ति पूर्वक गुरु के शरण में गया कि मैं परमानंद की परम सुख की प्राप्ति चाहता हूं। सारे बंधनों से मुक्त होना चाहता हूं। तो गुरु कहते हैं धन्यो सी कृत कृतसी पावितम ते कुलम तया
[31:02] य विद्या बंध मुक्त ब्रह्म भित मरसी तू धन्य है ना धन धन कहते हैं ना सारा धन उसके अंदर आ गया शक्ति तू कृत कृत जो कुछ करना था कर चुका तेरा कुल तुझसे पवित्र हो गया पावितम ते कुलमया यदा विद्या बंध मुक्त ब्रह्म भवितमसी जो अविद्या रूपी बंधन से मुक्त होकर तू अपने वास्तविक स्वरूप ब्रह्म पद को प्राप्त करना चाहता है। इस श्लोक में खास
[31:50] बात कही है कृत कृत हो गया। जो कुछ करना था तूने तो कर दिया। अब किसका काम है? ईश्वर कृपा से सब कुछ होगा। यदि हम का पूरा समर्पण है तुझे कुछ करने की जरूरत नहीं है। लेकिन सजग रहने की जरूरत है। कहीं डामाडोल ना हो जाए जब तक अविद्या है। कोई गलत उल्टे रास्ते पर मैं चल सकूं। तो ऐसे जो विरले हैं सचमुच ही कोई विरल ही होते हैं और वह धन्य धन्य है। इस वास्ते हम कहते हैं सबसे सरल सीधा सरल का मतलब आसान नहीं है। जिसमें कोई पेच दाम पेच नहीं है। ऐसा सीधा रास्ता है। वह है
[32:36] अपने स्वरूप की प्राप्ति यही तो है। इसी प्रसंग में रामायण का एक प्रसंग है। उस प्रसंग की भी चर्चा करेंगे। फिर उसको अपने आप पर भी घटाएंगे। हमने क्या करना है। शिव पार्वती नाम तो सुना ही है। पिछले किसी काल में वह सती देवी थी। फिर उसका हेम भगवान के घर में जन्म ना कहे अवतरण ऐसे ही कह दो तो ज्यादा अच्छा जन्म भी चलेगा मैना माता है और
[33:23] हिमवान उसके पिता है और पुत्री गौरी है पार्वती है जब उसका जन्म हुआ तो सहज ही वातावरण में खुशियां छा गई। तो जब बच्चा होता है तो ज्योतिषी को दिखाते हैं ना आजकल के ज्योतिषियों की बात नहीं कर रहे। नारद जी आ गए। नारद जी आ गए। माता ने कहा इसका जरा भविष्य बताओ। इसके विषय में क्या होगा? नारद जी ने अंतर्दृष्टि से देखा और कहा
[34:09] इसमें सारे गुण है। किसी गुण की कमी नहीं है। सर्वगुण संपन्न है। जहांजहां यह जाएगी खुशियों की वर्षा होगी। पर एक थोड़ी सी मुझे कमी लग रही है। वह क्या है? इसका जो पति होगा वह श्मशान घाटों में रहने वाला होगा। उसको दुनिया की कोई इच्छा ही नहीं होगी। ना विवाह की इच्छा ना परिवार की इच्छा। दुनिया के धन पदार्थों की तो इच्छा ही नहीं कुछ होगी। अकाम ही होगा। विवाह करेगा करेगा नहीं करेगा। कोई निर्णय नहीं है
[34:58] और जटाएं बढ़ी हुई पोशाक भी उसकी अजब अजब जैसी पता नहीं गले में सांप लिपटे हुए हैं। बैल की सवारी करता होगा विमान आदि में नहीं जाता होगा। तो यह मुझे खटका जैसा है। तो उसकी माता घबरा गई। माता कहने लगी अपने पति से तो इससे अच्छा है कोई और अच्छा सा लड़का देकर इसकी शादी कर दे सुखी हो जाएगी सुखी रहेगी जैसे आम ही होता है ना पूरे राज महलों में रहता हो ऐसे हो वैसे हो विमानों में चलता हो आजकल तो मोटर कार हवाई जहाज है
[35:44] लेकिन फिर नारद जी ने एक और बात कही वो वो विशेष महत्व की है। नारद जी कहने लगे यदि इस उमा देवी पार्वती आपकी बेटी को भगवान शंकर वरण कर ले। भगवान के साथ इसका विवाह हो जाए। फिर वह सारे अवगुण है महागुणों में परिवर्तित हो जाएंगे। पर उसके लिए कठिन काम है। वह तो अकाम है। कोई इच्छा ही नहीं है उनकी। तो इसके साथ
[36:31] उसका विवाह कैसे होगा? तो बच्ची छोटी है जैसे भी है वह सुन रही है। अवतारी पुरुष है। वो सुन रही है। नारद जी की बातों को बड़े ध्यान से सुन रही है। माता तो शंकाएं भी कर रही है। बड़ी श्रद्धा से सुन रही है। तो नारद जी कहते हैं शिव को वरण का एक तरीका है। एक साधना है। वह है तप। यदि यह तप कर ले, तपस्या करें तो तपस्या ऐसी करें
[37:17] जिसका वर्णन आगे आएगा पार्वती की साधना में। तो यह बिल्कुल संभव है कि शिव और पार्वती इनका दोनों का मेल हो जाए। इनका तो कल्याण का जगत का भी कल्याण करने के लिए बिल्कुल सीधे दरवाजे खोल देंगे। अब नारद जी चले गए। यहां पर देखिए नारद जी का रोल क्या है? गुरु के रूप में। नारद जी को पार्वती ने गुरु रूप में स्वीकार कर लिया। तो यहां भी जो धन्य कृत कृत श्लोक बोला था
[38:02] यदि जिज्ञासु गुरु को वरण कर ले सब कुछ उनके चरणों में छोड़ दे उसके कहने के अनुसार फिर अपने आप होता जाएगा उसकी कृपा शक्ति से होगा कैसे निमित्त तो हम ही बनेंगे यह नहीं कि हम कुछ भी नहीं करें उल्टे सीधे काम करते रहे हैं। यह तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी। फिर तो वह मुमुक्षु ही नहीं। फिर तो वह जिज्ञासु ही नहीं। उल्टा सीधे काम भी करें और गुरु सब कुछ करेंगे। ये तो बहुत है ना बिल्कुल उल्टी सोच है। तो उमादे भी थोड़ी बड़ी हुई। गुरु वाक्य
[38:49] नारद की वाणी उसके हृदय में है। जैसे दीक्षा हो गई उसकी। जो नारद जी ने कहा है वह सारे रूप में उसके हृदय में बिल्कुल दृढ़ है। दृढ़ कैसे हुआ? दृढ़ता उसमें थी पहले ही। जैसे प्रसंग भी आता है। हिमवान की पुत्री। हिमवान मतलब हिमालय। पहाड़ बर्फों से ढका हुआ पहाड़। यह उस समय के पहाड़ आजकल के जड़ पदार्थ है। जड़ पहाड़ है वह चैतन्य थे। उस समय शुरू की बातें हैं। सृष्टि के प्रारंभ की बातें हैं। और नीचे पृथ्वी लोक में मानव भी रहते थे उस समय
[39:36] सतयुग आदि की बातें हैं। तो वहां जो हिमवान पुत्री का जन्म हुआ है। हिमवान पहाड़ पहाड़ जैसा जड़ पदार्थ नहीं जड़ पहाड़ नहीं है। पहाड़ कैसे होते हैं? है ना बिल्कुल दृढ़ मजबूत है ना कोई हवा चले आंधी चले ऐसे चले वो डामाडोल हिलते नहीं है टूटते नहीं है बिखरते नहीं है तो पार्वती में भी वैसी हिमवान जैसा पिता वैसी उसके हृदय में दृढ़ता थी शरीर में दृढ़ता थी मन प्राणी में दृढ़ता थी जो गुरु ने कह दिया वो बिल्कुल ऐसे जम
[40:26] गया वो हिल नहीं सकता। डामाडोल नहीं हो रहा मन। अच्छा यह करेंगे तो क्या होगा? नहीं करेंगे तो मुश्किल हो जाएगी। पता नहीं होगा। पता नहीं होगा। लेकिन पार्वती का हृदय ऐसा नहीं है। सच्चे शिष्य का यही भाव होता है। बिल्कुल दृढ़ है। किस रास्ते पर चलना है। परमार्थ के रास्ते पर चलना है तो हर हालत में चलना है। चलाने वाली कौन है? मैं नहीं मैं चलूंगा नहीं परमेश्वर की शक्ति गुरु कृपा से जो मुझे हासिल हुई है गुरु दीक्षा मंत्र आदि इसका जो भी अर्थ कर ले तो और माताओं ने बड़ी ने जब थोड़ी सी पार्वती बड़ी हो गई उसको समझाया बेटी तब तो बहुत
[41:13] कठिन काम है तू जंगलों में जाएगी अकेली रहेगी माता तो कहती कुछ भी सखियां को साथ भेज देंगे। कोई सेवा करने वाले को भेज देंगे कि भोजन आदि की व्यवस्था होती रहे। तो पार्वती कहते नहीं मुझे किसी की जरूरत नहीं है। जब तप करना है तो फिर किसी चीज का गुलाम क्यों बनना है? सब प्रलोभनों को, सब शंकाओं को इधरउधर की आवाजों से ऊपर उठकर पार्वती अकेली ही निकल पड़ी। जंगलों में गई
[41:58] और वहां पर उसके तप का रूप क्या था? जो उनके इष्ट हैं भगवान शिव। उनके चरणों को अपने हृदय में धारण किया। यही उसका मंत्र हो गया। नारद जी ने तो दिया था। ऐसे ऐसे है। आपके पति वो हो सकते हैं। तो उनको पति रूप से स्वामी रूप से परमेश्वर रूप से अपने हृदय में धारण किया। यही मंत्र है और फिर उनके चरणों को हृदय में रखते हुए ही उसने साधना शुरू कर दी। तप करना शुरू कर दिया।
[42:47] नित नव उपज परम अनुरागा नित धन रोज रोज नयान नया इष्ट के चरणों में परमेश्वर के चरणों में गुरु शक्ति रूपी नाम का अवलंबन लेकर हृदय में जो है दृढ़ता पूर्वक वो नित नव नया नया रोज रोज क्षण क्षण क्षण एक प्रेम बढ़ता ही गया। बढ़ता ही गया। बढ़ता ही गया। और उसका फल क्या हुआ? विषरी देह तप ही मन लागा।
[43:34] शरीर की विस्मृति नहीं रही। शरीर तो रहा भाई। मेरा शरीर ये होगा, वो होगा, वो होगा। इसकी विस्मृति नहीं रही। और वो तप में मन लग गया। अब हम अपने दृष्टांत की चर्चा करेंगे थोड़ा सा सरल ढंग से और तरीके से भी चर्चा करेंगे। लेकिन ये आदर्श है लक्ष्य है। नित नव मन सहज अनुरागा उपजा सहज अनुरागा। बसरी देह तप ही मन लागा। ये तप क्या है? तपस्या क्या है? हम तप को तो कहते हैं खाना पीना बंद करो सर्दी सहो गर्मी सहो
[44:22] धूप में बैठो बर्फों में बैठो तो शायद यही तप होगा यह तप नहीं है यहां तप का स्वरूप बता रहे हैं नित नव बढ़त सहज अनुरागा। भगवान के चरणों में रोज रोज प्यार बढ़ता चला जा रहा है। प्रेम समर्पण समर्पण तो है ही। प्रेम बढ़ता चला जा रहा है। भगवान के अतिरिक्त और कहीं उसका आकर्षण ही नहीं।
[45:07] यह तप है प्यार प्रेम दृढ़ता पूर्वक यही मेरा लक्ष्य है जिन प्रेम की तिने ही प्रभु पायो भगवान से प्रेम नहीं करते गुरु से प्रेम नहीं होता यदि कुछ ऐसा हो जाए तो विषरी देह शरीर में देह खत्म हो दे बुद्धि खत्म हो गई और तप ही मन लगा। तप क्या है? फिर समझ लीजिएगा। प्रेम बढ़ता गया, बढ़ता गया, बढ़ता गया। ताप का अर्थ अग्नि भी हम करते हैं। ताप।
[45:56] यदि सामान्य शरीर की बात करें तो पांच तत्वों का शरीर बना हुआ है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश। अभी बीच में प्रश्न कर लेते हैं। अग्निपथ सूक्ष्मना पथ और जो इंद्रिय छिद्रों की ओर प्राणों की मन की गति होती है वह पृथ्वी चल जल तत्व अधोगामी बहिरगामी निम्न गागा गामी है ना वो निम्न गामिता सारी खत्म हो गई पृथ्वी जल पृथ्वी जड़ है नीचे ही रहती है और जल नीचे बाहर को ही बहता है यहां वो पृथ्वी तत्व है देवी उमा में है लेकिन वह सारे शरीर में
[46:45] व्याप्त है। दृढ़ता इतनी ज्यादा है। यहां तो विषयों के लिए दृढ़ता होती थोड़ी सी नीचे की ओर बाहर की ओर और जल के अधीन हुई तो इस प्रकार तप करतेकरते समय को पता नहीं लगा। बीतता चला गया। पहले तो फलाद का आहार और शरीर उनके तो दिव्य थे। उनकी मर्जी थी। जैसे भी करें लेकिन एक पथ प्रदर्शक है महापुरुषों की साधना। यह कह दे महापुरुषों की शरण में जाते हैं हमारा यह काम कर दो, हमारा यह काम कर दो। लेकिन जो गुरु बताते हैं वो नहीं करते। उस रास्ते पर नहीं चलना चाहते क्योंकि
[47:31] बाहर का आकर्षण है। बाहर ही मंडा मंडोल है। लेकिन उसकी भी कोई परवाह नहीं है। उसकी चर्चा बाद में करेंगे। उससे भी रास्ता मिल सकता है। तो पहले पहले फल मूल कंदमल लेते ले रहे और फिर धीरे-धीरे यह जला आदि फले हुए जला आदि लेना शुरू किया और फिर पेड़ से सूखे पत्ते गिरते थे। उनका सेवन करना शुरू किया कि शरीर के बाहर से जो कुछ अंदर अजम होता चला जाए जो कुछ भी ग्रहण करें सब अंदर लीन होता चला जाए तभी तो तप की वृद्धि होगी और
[48:19] करतेकरते फिर वायु भी छोड़ दी वायु भक्षण भी क्योंकि इतना प्राण से भरा हुआ है शक्ति से भरा हुआ है उनका शरीर तो वहां पर उनको फिर आकाशवाणी हुई कि आपका काम पूरा हो गया है। जब पिताजी बुलाएं तो आप घर चले जाना। आपको और कुछ करने की जरूरत नहीं। तपाधि की जरूरत ही नहीं है। आकाशवाणी हुई। शरीर कृष हो गया था। और उसके साथ ही आकाशवाणी ने यह भी कहा यह
[49:05] जो मैंने कहा है इसका जो सही अर्थ है जब सप्तदर्शी आपके पास आएंगे तो खुलेगा। उधर शिव ने प्रेरणा दी। ब्रह्मा की प्रेरणा हुई कि जाओ सप्तऋषियों जाओ उमा के पास जाओ। उनको देखो कितनी गहराई है उनकी। उसको और पक्का करो इस रास्ते पर। तो सप्त ऋषि आ गए। उन्होंने देखा उमा तप कर रही है। तो वो उमा को प्रणाम किया। उमा ने उनको प्रणाम किया और प्रणाम करतेकरते वह कहने लगे बेटी तू इतना कठोर तप क्यों कर रही
[49:52] है? तू घर में रह आराम से खा पी मौज मस्ती कर तुझे तप की क्या जरूरत पड़ गई है इतनी तपस्या क्यों कर रही है तो महादेवी कहने लगी ये मेरा स्वभाव ही है आपकी समझ में नहीं आने वाला मैं हिमालय की पुत्री हूं एक बार नारद जी ने मेरे हृदय में जो कह दिया है वो बिल्कुल लकीर पत्थर की तरह हो गया मेरा शरीर मेरी मेरी प्रकृति ही ऐसी है। आपकी बातें मैं नहीं सुन सकती। समझ नहीं सकती। जो नारद जी ने कह दिया है वही मुझे समझ में आया है। दृढ़ है। लेकिन सप्त ऋषि तो अपना काम करना था। कहते नारद जी तो ऐसे
[50:39] घूमते फिरते रहते हैं। घूमते फिरते तो है। उन्होंने गुरु की निंदा जैसे करनी शुरू कर दी। जो कुछ नारद जी ने कहा है वो ठीक नहीं होगा। तेरा पतन हो जाएगा। जहां भी नारद जी गए जहां भी जिसको उपदेश दिया वो भटक ही गया है। कई दृष्टांत उन्होंने दिए तो उमा देवी सुनती रही सुनती रही। कोई जवाब नहीं दिया। हां ना कुछ नहीं कहा और आखिर में कहा आप थक गए होंगे बोलते बोलते अब आप अपने घर जाओ। मेरा तो जो प्रण है वही मैंने करना है। पत्थर की लकीर नारद जी ने कह दिया है।
[51:26] उसके अलावा मैं कुछ सोच ही नहीं सकती हूं। और उसमें श्लोक आता है तुलसीदास का कोटि जन्म लगगर हमारी वरहु शंभू ना तो रहूं कवारी। कोटि जन्मों तक भी यदि मेरा इष्ट मेरा लक्ष्य मुझे प्राप्त नहीं होता है तो भी मैं कुंवारी ही रहूंगी। किसी और के संग मैंने जाना नहीं है। ऐसी दृढ़ता से तो सप्त ऋषि भी बहुत प्रसन्न हुए। भाव में भर गए। और वो कहने लगे जय गौरा देवी। जय गौरा देवी। जय जयकार करते रहे।
[52:14] और उन्होंने कहा हम तो ब्रह्मा जी के कहने से आए थे। हमारा काम पूरा हो गया। अब जब आपके पिता आए तो उनके घर साथ घर चले जाना। अब आपको कुछ करने की जरूरत नहीं है। यह तो तप का फल है। यहां पर एक और भाव कर दें। करो आगे बाद में करेंगे। प्रेम भाव क्या होता है? और उधर दूसरी चर्चा चल रही है। शिव जी समाधि में लीन है। जब से सती गई थी वह समाधिस्थ ही है। एक प्रकार से और उधर
[53:00] असुरों में असुरों की शक्ति बढ़ रही है। तारकासुर का जन्म हो चुका है। वो ऐसा जिसको कोई मार नहीं सकता। उसके सामने कोई ठहर नहीं सकता है। तो निर्णय हो गया था देवताओं को कि पार्वती के जो पुत्र पैदा होगा उसी वही इसका वध कर सके कार्तिकेय जिसका नाम जो बाद में हुआ फिर कहते हैं शंकर तो बैठे हैं समाधि में। पार्वती ने तप पूरा कर लिया है तो जब आपस का मिलन नहीं होगा तो बच्चे की उत्पत्ति कैसे हुई? यहां पर हम कह दें जैसे लौकिक माता-पिता के पुत्र होते हैं वैसा वो पुत्र बिल्कुल नहीं था। वो तो दिव्य पुत्र
[53:46] था। उनमें वासना स्थूल शरीर की बैरमुक्तता वीर्य की वो तो हो ही कैसे सकती है? वो तो संकल्प से पुत्र मानस संकल्प उससे पुत्र कार्तिकेय पैदा हुआ। इसकी चर्चा फिर देखेंगे। तो कहते हैं शंकर तो समाधि में स्थित हैं। उनकी समाधि टूटे तब तो काम आगे चले। तो उन्होंने कामदेव को बुलाया। काम शक्ति है। जैसे दैवी शक्तियां हैं। इसी प्रकार काम की शक्तियां भी है। काम शक्ति तो काम शक्ति को देवताओं ने बुलाया कि आप जाकर शिव जी का
[54:32] समाधि भंग करो, तप भंग करो जिससे कि हमारा काम हो जाए। शिव पार्वती जी का मिलन हो जाए। तो कामदेव कहता है ठीक है जी सब देवता मेरे साथ है तो मैं भी चलता हूं। तो काम एक शक्ति है जिसके द्वारा शक्ति का देवता इंद्र शक्ति वो शक्ति ऐसे है। तो काम शक्ति आगे चली। शंकर जी के पास जहां वो समाधि में स्थित थे। और इतना उसने अपना फैलाव किया काम शक्ति का प्रसार किया काम शक्ति का क्योंकि पशुओं में भी काम शक्ति काम वासना बढ़नी शुरू हो गई और उधर जो तपस्वी साधना कर रहे थे तप करते थे वो डामाडोल होने लगे इतने साल से
[55:19] ब्रह्मचर्य की साधना और उनका मन चलाएमान विचलित होने लग पड़ा कहते ये क्या समस्या खड़ी है बहुत व्याकुल हो गए और जंगलों में रह रहे हरे हरे फूल सुगंधित वायु चंदन आदि के बिखेर बसंद इस प्रकार वहां का वातावरण बन गया जगत में ये हालत है और जगतपति शंकर समाधि में बैठे कामदेव एक आम के पेड़ की ओठ में छिप गया अब कहता है अभी ऐसे तो बात नहीं बनेंगे। उसने काम बाण मारा। पूरा शक्ति से उनके
[56:05] हृदय में जैसे यहां पर मस्तक पर टकराया और उनकी समाधि खुली। उन्होंने कहा यह क्या बात हो रही है? देखा तो वह कामदेव ओठ में छिपा हुआ है। देख लिया उनको और जैसे ही शंकर की दृष्टि उस कामदेव पर पड़ी कामदेव भस्म हो गया। अस्तित्व रहा उसका शरीर जिसके द्वारा वह दूसरों पर हमला करता था वो शरीर भस्म हो गया। तीसरा नेत्र खुला उनका। शंकर का शंकर ने तीसरा नेत्र खोला और वह इतनी शक्ति से
[56:53] पूछा कि काम भस्म हो गया। सारे जगत में भी बिल्कुल काम व्यवस्था खत्म हो गई। जैसे पहले चल रहा था वैसे ही चल पड़ा। तीसरा नेत्र शंकर ने खोला। यह तीसरा नेत्र क्या होता है भाई? कभी इसके बारे में सोचा होगा। है ना? क्या यह कहते दो नेत्र होते हैं। एक यहां पर तीसरा नेत्र होता है। नहीं, यह बात नहीं है। है ना? बिल्कुल यह बात नहीं है। यहां पर जो तीसरा ने त्रिनेत्र, मृत्युंजय नेत्र उसमें तीन अंग है। एक है सूर्य, अग्नि और चंद्र।
[57:40] तीनों का मिलन होता है। है ना? सूर्य का केंद्र नाभि है। चंद्र का केंद्र तो मस्तक में है और अग्नि ये जो योग अग्नि है सूक्ष्म पथ से ऊपर उठती है। सारे शरीर से ऊपर को उठती है। तीन धाराओं का मिलन है। जब मिलन होता है तो तीसरा नेत्र खुलता है। बहुत जगह जानकारी के अभाव के कारण वो तीसरा नेत्र कैसे खोलते हैं? ऐसे बंद करो। बस यहां ध्यान करो। प्रकाश हो गया तीसरा नेत्र खुल गया। अभी तो कुछ भी नहीं हुआ है।
[58:25] अभी तो साधना शुरू भी नहीं हुई है। यहां पर फिर स्पष्ट कर ले। हमने कहा है सूर्य चंद्र और बीच में जुड़ने वाली क्या चीज है? अग्नि योगा अग्नि साधारण पंच भौतिक अग्नि नहीं है। तो सूर्य जो नाभिक कुंड में होता ही मानते हैं। सूर्य जो नाभिक कुंड में है यहां से प्राण शक्ति सारे इंद्रिय छिद्रों से बाहर की ओर जाती है। मन बाहर जाता है, प्राण बाहर जाता है, अपना विवेक भी बाहर जाता है। बुद्धि भी बाहर भटकती है। और बाहर कहां? शब्द,
[59:12] स्पर्श, रूप, रस, गंध, विषय उनमें जाकर अटक जाती है। और वो फिर हमारा मन मैला अंदर कूड़ा कर कर इकट्ठा होता है। ये जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, वासना, तृष्णा, ईर्ष्या, क्षय आदि यह सारा हमारे हृदय में, हृदय सारे शरीर में इकट्ठा होना शुरू हो जाता है। यह सूर्य की बहिर्मुखता है। प्राण शक्ति की बहिर्मुखता के कारण होता है। तो तीसरा नेत्र खोलने के लिए क्या करना होगा? नौ इंद्रिय छिद्रों से। ये जो नौ इंद्रिय छिद्र है और बाहर विश्व
[1:00:00] में आ सकते हैं। उनकी धारा को उल्टाना होगा अंदर की ओर। नाभि कुंड में और वहां से फिर वह जो बाहर मुक्तता है प्राण की शक्ति बहिर्मुखता सारा कुछ मन की चंचलता वह सारी शांत होगी और फिर नाभि कुंड से एक अग्नि की ज्वाला ऊपर को उठेगी यहां पर आंखें भी अंदर को खुल गई भाई नौ इंद्रिय छिद्र है जिसको ये कहते गोल के ये भी अंदर को कान भी अंदर को नासा छिद्र भी अंदर को और श्वास बार आई पूरा ऊपर से नीचे तक श्वास धारा और यहां पर भी नाभि में मूलाधार में पैरों तक
[1:00:47] वो प्राण की धारा प्राण की धारा जब फिर वो व्याप्त होती है तो फिर अग्नि रूप धारण करके सुषमाना पथ से ऊपर उठती है। मस्तक में सीधी जाती है। ये आंखों का नहीं लेना। दो दो नेत्र ये तो प्राण की बाहर मुक्तता है। सारे इंद्रिय छिद्र को अंदर उलटाना होगा। उसके द्वारा फिर जो सोम सूर्य और अग्नि का मिलन हुआ और तो वो धारा सारे शरीर से ऊपर उठती हुई ब्रह्म रंद्र में ऊपर चंद्र मंडल। चंद्र मंडल भी लीन हो गई। तो चंद्र,
[1:01:35] अग्नि, सूर्य तीनों एक हो गए और ऊपर ही नहीं ऊपर से नीचे सारे शरीर में भी ऊपर भी नीचे भी गुरु वाणी तो सस घर सुर बसे मिटे अंधियारा। सूर्य लेकिन सूर्य उदय कैसे होगा? जब वह बाहरता सारी खत्म होगी और और कैसे होगा? अग्नि धारा से ऊपर चलेगा। अग्नि सूर्य और चंद्र मंडल के साथ उसका मिलन होगा। फिर अंधकार खत्म हो जाता है। दिव्य ज्योति हो जाती है और वहां से वह नीचे भी आता है। तो इस प्रकार शंकर जी की तो सहज स्थिति थी। इस प्रकार करते करते फिर
[1:02:22] कामदेव तो भस्म हो गया। उसकी पत्नी को बड़ी घबराहट हुई। थोड़ी परेशान हुई। मेरा पति तो भस्म हो गया। मैं क्या करूं? फिर शिव जी ने कहा चिंता ना करो द्वापर युग में प्रद्युम्न का अवतार होगा भगवान कृष्ण के बेटे और उनके रूप में कामदेव पति तुझे मिलेगा तो खैर धारा आगे चलती गई यहां पर हमारा कहने का मतलब यह है कि देवी भगवती उमा ने तप किया प्रेम साधना की दोनों को मिला लेना। प्रेम की साधना की है उन्होंने और वहां प्रेम की साधना हुई और वहां तो
[1:03:09] शिव तो अभी उसी रूप में पहले से स्थित थे क्योंकि शोमा का दोबारा जन्म हुआ था। संस्कारानुसार उन्होंने फिर वो लीला की। तो इस प्रकार फिर दोनों का विवाह तय हुआ। और उस विवाह में शंकर गण सारे आए मस्त मलंग ब्रह्मा जी भी अपने सारे अनुचरों को लेकर आए विष्णु भी सारे अनुचरों को लेकर आए और विवाह हुआ और फिर वो कैलाश पर्वत पर चले गए। वहां फिर कार्तिकेय का जन्म हुआ। यहां पर यह समझ लेना है। बिल्कुल बार-बार कह रहे हैं। जैसे मनुष्य शरीर पति पत्नी मिलते हैं। वह रजवीर के मिलन से
[1:03:58] संतान की उत्पत्ति होती है। वहां रजवीर्य का तो बैरगम का तो मतलब ही कोई नहीं है। शिव शक्ति का मिलन हुआ। है ना? शिव रूप पार्वती शंकर और शक्ति रूप पार्वती दोनों का मिलन हुआ। और दोनों को ही मिलन से एक नया शरीर नया शक्तिशाली कार्तिकेय दिव्य शरीर प्रकट हुआ। यह प्रसंग तो समझ में आता है ना। अब यह नहीं कहना कि ये तो देवताओं की बातें हैं। महापुरुषों की बातें हैं। कलयुगी जीव कैसे कर सकता है। कलयुगी जीव के लिए तो साधना बहुत कठिन होगी।
[1:04:44] कलयुग में भगवान कोई और हो गए हैं। कलयुग में वही भगवान है जो सतयुग में थे। उनमें कोई परिवर्तन नहीं है। जैसे के तैसे ही है। वैसे ही करुणा मूर्ति वैसे ही आनंद मूर्ति वैसे ही सर्वव्यापकता भगवान में यदि बदलाव आना शुरू हो जाए फिर तो बहुत पागल की बात है। ऐसा सोचे यदि यह गुरु वाणी में शब्द आते हैं। आदि गुरुवे नमः जुगाद गुरुवे नमः सद्गुरु नमः श्री गुरु देवाय नमः है ना आदि गुरु
[1:05:30] परमपिता शिवा आदि महा विष्णु आदि जो शुरू से सृष्टि ना रहे वह रहते हैं। आदि गुरु और जुगादि गुरु जब सृष्टि प्रारंभ होती है तो वही परमेश्वर गुरु के रूप में जैसे शिव पार्वती आए सद्गुरु नमः जो वर्तमान में भी ब्रह्मज्ञ पुरुष है अब भी हैं और श्री गुरुदेव नमः जो भविष्य काल में होंगे वह एक ही तत्व है नाना रूपों में समय अनुसार प्रकट होता रहता है तो वह गुरु तो अब भी है। खोज होनी चाहिए, जिज्ञासा होनी चाहिए,
[1:06:17] वैराग्य होनी चाहिए, श्रद्धा होनी चाहिए। यदि कमी है तो वह जिज्ञासा नहीं है, श्रद्धा नहीं है, पुकार तड़प नहीं है। यह भी करें तो चलो भगवान का भजन भी कर ले। है ना? तो इस प्रकार गुरु की शरण और फिर कहां से साधना शुरू होती है? जैसे शुरू में कहा था श्रद्धा वैराग्य पूर्वक गुरु की शरण में गुरु की शरण में जाने का मतलब क्या है? अहम का समर्पण पूरा नहीं कर सके। पूरा हो तो तत्काल रास्ता खुल जाएगा। पूरा हो जाएगा। नहीं तो
[1:07:04] थोड़ा सा 10% तो रख लो। अहम का समर्पण मैं है ना वो मैं को गुरु के चरणों में समर्पित कर दो तभी वह शिष्य बनेगा। कुछ थोड़ा तो देना ही पड़ेगा। जैसे कथाएं तो आती हैं। द्रोपदी की कथा हमने कई बार सुनाई है। जब वह जंगलों में वनवास कर रहे थे पांडव तो करते-करते दुर्योधन वहां पर रेड़ा पीड़ी करता चलाकी कर रही था। दुर्वासा ऋषि दुर्योधन के पास गए महलों में तो बहुत सेवा की दुर्योधन ने छल कपट के लिए कि ये मेरी बात मान लेंगे। तो कहते वरदान मांगो दुर्वासा कहते हैं कहते महाराज आपने मुझे
[1:07:50] तो सेवा का मौका दिया है। मेरे भाई जंगलों में रहते हैं। आप उनको भी सेवा का मौका दो। दुर्वा से कहते ठीक है उनके कितने शिष्य थे साथ में वहां तो कहते हजारों हजारों का पूर्ण संख्या बहुत ज्यादा थे और वहां पर पहुंच गए और द्रोपदी के साथ अपने भाई थे। पांच पांडव थे। कुछ साधु ब्राह्मण तपस्वी भी थे। साथ ही रहते थे। उनका भोजन बनता था। भगवान कृष्ण ने एक अक्षय पात्र दे दिया था उनको कि जितने भी आ जाएंगे खाने वाले भोजन करने वाले ये अक्षय पात्र खाली नहीं होगा।
[1:08:35] इसमें से भोजन निकलता जाएगा। निकलता जाएगा। जब तू भोजन कर लेगी फिर खत्म हो जाएगा। सबसे आखिर में द्रौपदी भोजन करती थी और जब दुर्वासा पहुंचे ही तब कहा था भी जब वो आराम कर रहे होंगे तब जाना दुर्वासा पहुंच गए और द्रोपदी तो परेशान कहते कोई चिंता ना कर नहा धो के आते हैं भोजन तैयार रखना अब पार्वती बहुत चिंतित हुई अब क्या करें भगवान कृष्ण की शरण था उनके साथ मेल था उनका उनको बुलाया और भगवान कृष्ण प्रकट हो गए। द्रोपदी कहते हैं ऐसे कहते मेरी बात तेरी बात बाद में सुनेंगे। मैं इतनी दूर से आया हूं। मुझे भूख लगी है
[1:09:22] कुछ खाने को दो। द्रोपदी भी कहते जो आता है खाने वाले मेरे पास तो है ही नहीं खाने को। तो कृष्ण कहने लगे अक्षय पात्र आपको दिया तो है। कहते वो तो मैं भोजन कर चुकी। तू ला तो मेरे पास। तो अक्षय पात्र में किनारे पर थोड़ा सा साग का टुकड़ा सा का छिलका पड़ा हुआ था। तो भगवान कृष्ण कहने लगे यह है तो सही साग भगवान कृष्ण ने वो सा खाया अरे विश्वात्मा तृप्तता तो भगवान विश्व रूपी हैं। उन्होंने खाया सारा विश्व तृप्त हो गए। और दुर्वासा और दुर्वासा के शिष्यों को डकार आने शुरू हो गए।
[1:10:09] ऊपर तक पेट भरा हुआ यह हुआ कहते अब तो बहुत मुश्किल हो गई द्रोपदी ने खाना तैयार रखा होगा यदि खाना नहीं खाएंगे शप ना लग जा वहीं से भाग गए तो दृष्टांत क्या कह रहा है भगवान को एक श्रद्धा भक्ति से प्यार के समर्पण से थोड़ा किनका ही दे दो अहम का किनका गुरु को थोड़ा दे तो दो भाई श्रद्धा से दोगे प्यार से दोगे भक्ति से देखो वह किनका भी बहुत बड़ा बन जाएगा दीक्षा के समय कुछ तो देना पड़ेगा ही पड़ेगा लेकिन श्रद्धा पूर्वक दें प्यार पूर्वक दें समर्पण पूर्वक दें तो समर्पण का
[1:10:55] रास्ता खुल जाएगा नहीं तो मेरी दीक्षा होगी मैं भजन करूंगा ऐसा तो अहंकार ही होता है मैं भजन करूंगा बस रास्ता मिल गया है भजन तो मैंने खुद ही करना है तो यह बातें नहीं होनी तो गुरु की शरण में यदि हम जाएं करवाने वाले गुरु करने वाला मैं खुद हूं। यह ना हो कि करवाने वाले गुरु और वही करवाएंगे। मैं करने वाला हूं। अब गुरु दीक्षा हो गई है। गुरु के पास जाने की क्या जरूरत है? यह भी गलत। दोनों बातें गलत है। गुरु ही करेंगे। मुझे करने की क्या जरूरत? गुरु जब हो गए जब इतने बड़े गुरु हो गए हैं तो मुझे साधना की क्या जरूरत है छोटामोटा
[1:11:42] गुरु होता तो मैं भी कर लेती गुरु तो मेरे बहुत महान है ना गुरु बहुत महान है लेकिन साधना तो खुद ही करनी होगी यह भी नहीं कि मैं ही साधना करूंगा अब गुरु के पास जाने की जरूरत ही क्या है गुरु से संबंध ही तोड़ दो मैंने ही साधना करनी है दोनों बिल्कुल अनर्थ जैसे से तो वहां पर क्या है? गुरु वाक्य और गुरु ये दो चीजें हैं। इसकी चर्चा और आगे करेंगे।
[1:14:53] अब आम का समर्पण पूरा हो जाए तो कहने क्या है? लेकिन जितना समर्पण हुआ है यदि साधना करते चले जाएंगे भगवान की प्राप्ति के लिए गुरु की शरणागत होकर गुरु की आज्ञा सेवा पालन करते हुए तो अहम का समर्पण भी धीरे-धीरे और बढ़ता जाएगा और बढ़ता जाएगा और रास्ता खुलता जाएगा तो मूल तो अहम ही रुकावट है। शुरू तो हो जाए और धीरे-धीरे समर्पण अहम का और पूरा पूरा होते अहम का पूर्ण समर्पण हो गया तो संप्रज्ञा समाधि लग गई और जब संप्रज्ञ समाधि लग गई फिर कुछ करने की जरूरत ही नहीं। साधना खत्म है अपने आप ईश्वर कृपा से अज्ञान की निवृत्ति
[1:15:41] हो जाएगी। तो यहां पर साधना कैसे करनी है? शुरू तो यही से है कि बाहर के विषयों से अंतर्मुखता होनी चाहिए। है ना? जब तक थोड़े भी अंतर मुक्तता नहीं है तो शिष्य क्या बने? शिष्य नहीं बने हैं। यह कह रहे हैं वो धीरे-धीरे और बढ़ाना है। किस प्रकार वो साधना के द्वारा ना शवास जाप का विधि तो है। जानते ही हैं। और यहां से वह तरीका आता है ऐसे श्वास भरते हुए ऐसे छोड़ते हुए यहां कंठ से जाप करो। यह प्रारंभ है। शुरुआत है। ऐसे जाप करतेकरते वो प्राणधारा यहां से
[1:16:29] नीचे तक जाती चली जाएगी। यहां से ऊपर तक चलती चली जाएगी। चक्रों का भेदन हुआ या नहीं? यहां पर नाभि मंडल में पहुंच जाएगी। है ना? तो आगे गुरु वाणी और संकेत करती है नाभ कमल में बेदी रचले ब्रह्म ज्ञान उचारा राम राय सो दूल पावो अस ब भाग हमारा नाभ कमल ये नाभि नहीं कह रहे हैं नाभ कमल कह रहे हैं में वेदी रच ले जैसे शिव पार्वती जी का विवाह हुआ ना तो शब्द सूरत
[1:17:14] अंदर भी शिव शक्ति के है उनका भी विवाह हो जाएगा मिलन हो जाएगा शब्द सूरत का मेल तो उसके लिए फिर शुरू से करें जो हमारा मन इंद्रिय छिद्रों से जैसे पार्वती के जीवन में तो उनका तो शंकर के जीवन में तो सीधा ही था ही था लेकिन आम व्यक्ति ये जो सूर्य मंडल है प्राणों का केंद्र है। यहां से हमारे मन का बिखराव इंद्रियों का बिखराव इंद्रिय छिद्रों से पार के विषयों की ओर विषयों की ओर और दौड़ रहा है। उसको तो उल्टाना ही पड़ेगा। कैसे उल्टाना होगा? अभ्यास के द्वारा। साथ में
[1:18:00] सेवा के द्वारा क्योंकि सेवा के द्वारा जो हमारी मन की वृत्तियां है वह अंतर्मुखी होती चली जाएंगी। साथ ही साथ अभ्यास जाप सेवा और सिमरन दोनों साथ-साथ चले। यह नहीं कि खाली सेवा में ही लगे। सिमरन या सिमरन में ही लगे रहे। सेवा कुछ की नहीं। परिवार में सेवा कर सकते हैं। भगवान की बगीची समझे अपने आप को माली बनाएं और वो सेवा करें। परिवार की और अतिथि सेवा सबसे बढ़कर और जहां भी सेवा का मौका मिले। यदि आश्रम में भी आते हैं। है ना? थोड़ा पहले आ जाए। थोड़ा बाद में जाएं और देखें भंडार में कोई सेवा है, इधर-उधर कोई सेवा है, झाड़ू
[1:18:46] लगाने की सेवा है। है ना? तो सेवा का मूल्य बहुत ज्यादा है। और प्यार से करें सेवा और साथ ही साथ सिमरन भी करते चले जाए। यह कह रहे हैं ना यहां पर प्रसंग से कहते थे कमरे मिल जाते हैं। कम से कम कमरा जाते समय तो बिल्कुल साफ सुथरा छोड़ के जाएं। बाथरूम आदि को बिल्कुल साफ सुथरा करके जाए और भंडार की सेवा यदि आप यहीं रह रहे हैं जो जाते-जाते समय भंडार में भी सेवा करें। इधर भी सेवा सेवा को पूछने क्या सेवा? नहीं खुद खोज लो भाई। खुद खोज लीजिए। मैंने यह सेवा करनी है। नहीं मैं ही करूंगा सेवा। तो ज्यादा दृष्टांत नहीं देते। तो सेवा और
[1:19:33] सिमरन के द्वारा यह जो है बाहर जो हमरा मन का भी खराब है वो अंदर होता चला जाएगा। और यह सारा कूड़ा कर, काम, क्रोध, लोभ, मोह, वगार यह तो मन के अंदर ही है। है ना? वह दब जाएंगे। जैसे कमल कीचड़ में होता है। चलो अभी थोड़े संस्कार हैं तो कीचड़ जैसा और ऊपर प्रेम का जल हो। गुरु प्रेम का जल हो। भगवान से प्रेम का जल हो तो वहां से फिर वो कमल खिलेगा और सूर्य भगवान विष्णु ब्रह्मा परम शिव
[1:20:20] वाहेगुरु वह हमारे इष्ट ऊपर हो यहां पर इन तीनों का मेल तो वह नाभि कमल हुआ। नाभ कमल में वेदी रचले ब्रह्म ज्ञान उचारा ब्रह्म प्राप्ति तो यहीं से तो शुरू होगा। कहां से शुरू होगा? फिर देखो सेवा के द्वारा इंद्रियों को अंदर करें और ये इंद्रिय छिद्रों को यहां से जाप करते हुए श्वास श्वास और नीचे गहरे ये टूट छूटना नहीं चाहिएगा केंद्र बल्कि यहां से और ऊपर जाए और यहां से और नीचे गहरे गहरे गहरे और नाभि के मूल में जाकर और वहां से फिर नाभि केंद्र बन जाए। नाभ कमल
[1:21:05] नाभ कमल में वेदी रच ले। वेदी का मतलब क्या होता है? जो ऐसे चलाते हैं ना विवाद के द्वारा उसमें लकड़ियां डालते चले जाते हैं। जितने काम क्रोध लोभ मोह वृत्तियां सब उसको दगद करते चले जाओ उसमें डालते चले जाओ उसमें कैसे डालोगे श्वास शब्द के हाथों के द्वारा है ना श्रद्धा और शब्द के हाथों के द्वारा मंत्र का उच्चारण करते हुए काम क्रोध लोम वृत्तियों को यहां नाभि कुंड में नाभि में जो वेदी रची हुई है सब हवन करते चले जाएं अनात्म वृत्तियों को हवन करते चले जाए अग्नि धारा और प्रचंड होगी।
[1:21:53] सूखी गीली लकड़ियां सब चलेंगी। अग्नि प्रचंड होगी। सब अग्नि सबको भस्म कर लेती है। इस प्रकार भस्म करते करते फिर यहां से वो चेतना मूलाधार से। इसके बीच में बहुत कुछ होना शुरू हो जाता है। इधर प्राण की शक्ति जब अंदर गई अनहदना। यहां प्राण शक्ति पहुंची यहां अनहद नाद यहां नाभि में पहुंची यहां अनहद नाद सारे शरीर में अनहद नादों की झंकार और दिव्य ज्योति मन प्रकाश वहां पर प्रकाश और नाद दोनों साथ-साथ दोनों मिलकर सारे शरीर को व्याप्त करते चले जाएंगे। वही साधना जो पार्वती ने की है वो भी आज भी हो सकती है। कोई भी कर सकता है। आजकल तो
[1:22:40] बल्कि आसान काम है। कलयुग में साधनाएं बहुत आसान है। पुराने युगों में सीधी सड़क है। है ना? भागते चले जाए। लेकिन यदि दलदल हो। यदि दलदल का रास्ता हो तो थोड़ा सा ही भागने में इतनी शक्ति अर्जित हो जाएगी। थोड़े समय में ही वह स्थिति प्राप्त हो सकती है जो सतयुग में कई वर्षों हजारों वर्षों के तप के द्वारा होती है। समय भी कम लगेगा। है ना?
[1:23:28] जल्दी-जल्दी भी हो जाएगा। लेकिन परमात्मा तो वही है। श्रद्धा वैराग्य वही होना चाहिए जो पहले युगों में था। तो इस प्रकार साधना करते-करते नाभ कमल में वेदी रच ले तो वह सूर्य है ना सूर्य प्रचंड हुआ और फिर अग्नि धारा ऊपर को उठी। यहां से तो प्राण नक्षी शक्ति नीचे आई और सूर्य प्रचंड हुआ। बाहर की वासनाएं क्षण हुई। तो यहां से फिर अग्नि धारा ऊपर उठी और अग्निधारा ऊपर उठकर सूर्य और अग्निधारा दोनों मिलकर चंद्र मंडल में जाकर तीनों एक हो गए। तीसरा नेत्र खुल गया।
[1:24:17] जैसा किसी के भी खुल सकता है। तो ऐसा होने से यह शरीर भी प्रारब्ध आदि कोई चक्कर नहीं। सब खत्म हो जाएंगे। कर्मों का पिछला सारा भग खत्म हो जाएगा। तो इस प्रकार से हम साधना करते चले जाए। यहां पर एक बात हमने और कहनी है। ज्यादा समय नहीं लेते हैं। प्रेम की बात करते हैं। जिन प्रेम कियो तने ही प्रभु पायो। कितने तीर्थ यात्राएं करते चले जाए यह पुण्य करते रहे दान पुण्य करते रहे उससे बात नहीं बनने वाली है। प्रेम क्यों तुझसे हो प्रेम कैसे होगा? तो यहां पर एक आसान सा तरीका है जो साधक के लिए है। जिसकी मन
[1:25:03] प्राण की वृत्तियां अंदर की ओर खुलने शुरू हो गई हैं। क्रोध में क्या होता है? इधर से तूफान उठता है बाहर की ओर। है ना? मन बाहर लक्ष्य कोई बाहर है। लोभ है तो बाहर की ओर लक्ष्य कोई बाहर है। काम वासना लक्ष्य बाहर की ओर है। इधर से नीचे से तूफान उठता है बाहर की ओर। है ना? तो भाव क्या है? प्यार क्या है? मान लीजिए क्रोध आ गया। कोई चिंता नहीं। काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य गोचरे
[1:25:49] बुद्धिमताम कृ तत्वम अधिगमते शास्त्र वाक्य है काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य कितना भी हो जिसके प्रति क्रोध आया है उसको छोड़ दो वो छोड़ेगा जो सन्यासी अंदर जाना चाहता है त्यागी जो श्रद्धावान भक्त पर मुमुक्षु है वो कर सकेगा जिसके कारण वो वो ऐसा है, वो ऐसा है। वो छोड़ना बंद करो तो क्या होगा? यह जो बाहर वेग क्रोध का जा रहा था वो सारे शरीर में फैल जाएगा। तो मोड़ना किसको? मन को ही तो मोड़ना है। यही भाव है। क्रोध को भाव में बदलो।
[1:26:36] लोभ को भाव में बदलो। ईर्ष्या को अहंकार को भाव में बदलो। अहंकार को यदि भाव में बदल दिया सब अंदर और किसके साथ जोड़ दिया हमने प्राणों के साथ जोड़ दो मन अंतर्मुख करो खाली मन अंतर्मुख करने से बात नहीं बननी कि मैंने तो मन ने सोचना शुरू कर दिया गलत नहीं सोच रहा हूं मन के द्वारा अंदर जाओ और मन यदि अंदर व्याप्त होना शुरू हो जाएगा तो प्राणों में हलचल पैदा हो जाएगी जब प्राण प्राणों में शक्ति पैदा हो जाएगी तो सारे शरीर में मन और प्राण का मिलन होने से एक भाव पैदा होता है।
[1:27:23] मन चिंतन करता तो है। मन से चिंतन होता है। मैंने भजन करना है। मैंने साधना करनी है। मैंने यह करना है। चिंतन है ये लेकिन चिंतन शक्ति से भी कई गुना अधिक है। भाव प्यार आ जाए भावना। साधना करतेकरते आंखें गीली हो जाए आंसू नहीं बाहर निकलने देने भाव आ जाए है ना तो आंसू तो खाली पूरा आंखें पूरी बाहर नहीं आंसू नहीं निकलने देने है क्रोध आ जाए तो क्रोध को बाहर नहीं जाने देना अंदर हजम करो लोभ आ जाए उसको अंदर हजम करो ईर्ष्या आ जाए तो करो
[1:28:10] करो ईर्ष्या अपने से कि वो महापुरुष ऐसे हुए हैं। मेरे गुरु ऐसे हुए हैं। अब मैंने भी साधना करनी है। अंदर ले जाओ सारे दुर्गुणों को तो वो भाव बनता है। उसी से परमात्मा के चरणों में प्रेम पैदा होता है। अंदर सब कुछ होना शुरू हो जाएगा। तो इस प्रकार से करते चले जाए। हमारा ख्याल काफी बातें हो गई हैं। तो इसके द्वारा इतनी दुर्लभ स्थिति प्राप्त हो सकती है। यह ब्रह्मचर्य आदि की जो साधनाएं बहुत कठिन मानी जाती है। यहां से अग्निकुंड से धारा ऊपर उठेगी। ब्रह्मचारी बनेगा और वहां से नीचे तक उर्धवता ब्रह्मचारी स्त्रियां भी ब्रह्मचारिणी बन
[1:28:58] सकती है पुरुष भी बन सकती है और साधना में 100 पवन है यह कसौटी है यदि यहां से अग्निकुंड ऊपर उठेगा और ऊपर तक पहुंच जाएगा यहां तक पहुंच जाएगा और अभी साधना और है लेकिन वह ब्रह्मचर्य हो गया है फिर उसको रुकावट पड़ने की संभावना नाम के बराबर असावधानी तो रखनी जब उर्धव रेता हो गया। उसकी तो बात ही अलग है। तो खैर हमारा ख्याल इतना ही काफी है। कोई जिज्ञासा तो नहीं होगी नहीं तो पूछना तो पूछ सकते हो। जो बोला हुआ उसके विषय में
[1:47:20] राम जी ने धनुष तो तोड़ किया था और विवाह होने वाला है और विश्वामित्र जी के साथ राम लक्ष्मण तो हैं ही और भरत शत्रुग पिता दशरथ सारी रानियां भी आ गई हैं। राम जी ने दर्शन किए माता-पिता भी आ गए हैं। लेकिन सकुचन कह न सकत गुरु पाही। पितु दर्शन लालच मन माही संकोच है गुरु जी को नहीं कह रहे विश्वामित्र जी को नहीं कह रहे हम माता-पिता के पास चले जाए देखो क्या अद्भुत बात है
[1:48:08] और पिता के साथ कितना प्यार है माता के साथ कितना प्यार है लेकिन गुरु जब पास में है गुरु के सानिध्य में है अपनी मन मर्जी से कोई एक कद कदम भी नहीं उठाना है। गुरु को शारीरिक दृष्टि से भी छोड़कर तक नहीं जाना है। क्योंकि संकोच हो रहा है। बोल नहीं रहे और विश्वामित्र गुरु है। विश्वामित्र विनय बड़ी देखी उपजा और संतोष अभिषेक। जब विश्वामित्र ने देखा कितनी विनयता है, विनय है, नम्रता है गुरु के प्रति। कितना भाव है तो विश्वामित्र जी के मन में बहुत
[1:48:53] संतोष हुआ बहुत हर्ष हुआ हर्ष बंधु दो हृदय लगाए पुलक अंग अंबक जल छाए चले जहां दशरथ जन वासे मनु सरोवर तक प्यासे तो दोनों भाइयों को लेकर खुद ही वहां पहुंच गए जहां दशरथ थे पिता थे माता थे सब कुछ तो कितनी गुरु के भक्ति माता-पिता की भी कितनी भक्ति है यह राम कथा से राम जी के जीवन से क्या कुछ हुआ पूरा समझ में आता है तो थोड़ा सा और कर लेते हैं
[1:51:26] यहां पर माता पिता से मिले गुरु के प्रणाम किया और पूर्ववासी जितने परिजन जितने जाति जितने और जाचक जितने जो भिक्षावृत्ति पर रहते हैं मंत्री जितने और सब मित्र जितने सबसे मिले यथा विधि मिले मिले और परम कृपालु विनीत बड़े विनीत से प्यारे प्यार से बड़े नम्रता से तो यहीं राम की धुल लाकर समाप्त करते हैं।
[1:55:25] अब थोड़ा आंखें बंद कर लेंगे। मैंने ही कहना नहीं है। मैं तो हूं ही नहीं। और केवल शब्द को सुनते चले जाए श्वास गहरे भरते हुए। मैं तो हूं ही नहीं। बुद्धि में पूरा निर्णय कर ले। कहने की जरूरत नहीं। और सारे शरीर को मन ही मन देखते हुए पूरा श्वास ऊपर से नीचे तक महावाक्य को सुनते जाए। मन ही मन मन शब्दमय सारा शरीर प्राणमय शब्दमय
[1:56:11] भाव से भाव का अर्थ तो समझ ही गए हैं मन प्राण को दोनों को एक कर दो शब्द को प्राण को दोनों को एक कर दो और शब्द ही शब्द रह जाए महावाक्य ही रह जाए कर सकते हैं थोड़ा सा श्वास भी रोकना चाहे तो रोक लें पूरा श्वास भर के इतनी देर तक रोक सकते हैं रोक लें फिर धीरे-धीरे छोड़ते चले जाएंगे
[1:56:56] शब्द ही शब्द हृदय में आनंद स्वरूप परमानंद स्वरूप महावाक्य से लक्षित ब्रह्म आगे भी वही पीछे भी वही ऊपर भी वही नीचे भी वही दाएं बाएं इधरउधर सब में वो एक ही महावाक्य परमानंद दूसरा कोई है ही नहीं दूसरा नाही कोई ब्रह्म ज्ञान यह शब्द का अर्थ ही ज्ञान है। ब्रह्म ज्ञान है। और मन में मैं हूं ही नहीं।
[1:57:46] मन अपने सबसे नीचा। मन है ही नहीं। जैसे सबके चरण रज मन मेरा। और सब ओर सब अंदर बाहर एक परमात्मा शब्द रूप में उसके अर्थ के रूप में
[1:58:43] शक्ति भक्ति और गुरु नाम और गुरु दोनों एक