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Spoken discourse excerpts (Hindi). Sung hymns, repetitive chanting, and standalone devotional recitation have been omitted. Verses quoted within the teaching and spoken meditation instructions are retained. These excerpts are based on automatically generated captions and have not been checked against the audio; recognition errors may remain.

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[19:58] यहां पर हनुमान चालीसा में एक पंक्ति आई है। इसकी चर्चा कई बार कर चुके हैं। जोग सहस्त्र जोजन पर भानु लील्यो ताह मधुर फल जानो सहस्र युग पर सूर्य मंडल सूर्य देव उसको हनुमान जी ने मीठा फलका लेकर निगल लिया क्योंकि हनुमान जी उड़कर गए थे। सहस्त्र योजन का रास्ता तय करके गए थे। नहीं ऐसी बात नहीं है क्योंकि यह शास्त्रों का सिद्धांत है।

[20:43] रामायण में भी थोड़ा सा इसका संकेत मिलता है। गुरुणी में बिल्कुल स्पष्ट ही है। जो ब्रह्मांड सोई पिंड है ना यह शास्त्र का सिद्धांत है। और शास्त्रों में यदस्त तद बह कि जो अंदर है हमारे पिंड के अंदर वही बाहर भी है। और पिंड के अंदर क्या है? भगवान बैठे हैं हृदय में। जब भगवान परम परमेश्वर हृदय में बैठे हैं तो उस परमेश्वर मिलने का उत्सुक जब हृदय

[21:29] में ही गति करता है बाहर की गति तो किस प्रकार से होती है ना शरीर के द्वारा स्थूल शरीर के द्वारा सूक्ष्म के द्वारा भी मान लो हो गई और फिर बहुत लंबा रास्ता तय करते करते लेकिन अंदर का रास्ता सूक्ष्म है। बस इतना ही है। जैसे जब कुंडलिनी शक्ति जाग जाए तो परमेश्वर की शक्ति के रूप रथ पर आरुढ़ होकर हम सीधे ही शरीर में यात्रा कर सकते हैं। तो हनुमान जी ने यही यात्रा की है।

[22:15] जो ब्रह्मांड सोई पिंड इसकी चर्चा फिर भी करेंगे। आज ही शायद होगा। देखिए जैसे स्थूल शरीर से जो गति होती है इंद्रियों के द्वारा इंद्रिय स्थूल शरीर के द्वारा गति होती है। लेकिन शरीर के अंदर जो गति है। स्थूल शरीर सूक्ष्म में लीन हो जाता है। जैसे देखो स्वप्न में क्या होता है। है ना? स्वप्न में मन में इतनी शक्ति आ जाती है। सामान्य व्यक्ति के भी इसमें अज्ञान भी है। स्वप्न में क्योंकि बाहर से संबंध टूट जाता है। इंद्रियां मन में लीन हो जाती

[23:01] हैं और उसमें मन में इतनी ज्यादा शक्ति आ जाती है कि जो संकल्प होता है वह दृश्य रूप में होता है। दृश्य पदार्थ अलग नहीं है स्वप्न के। हमारा मन ही दृश्य रूप में चिंतन करता है। लेकिन यह तो मन की ही गति है। लेकिन जो महासाधक हैं परमेश्वर की शक्ति से जुड़े हुए हैं। हनुमान जी तो ऐसे ही थे। पवन पुत्र थे। साधारण मानव तो थे ही नहीं। शिवावतार ही थे। तो जब वह उसके साथ जुड़े हुए बचपन की ही चर्चाएं हैं तो अंदर ही जो सूर्य मंडल सूर्य इसको साथ

[23:48] लेकर वो अपने अंदर ही लीन हो गए और कहां पहुंच गए? दशम द्वार में पहुंच गए। ये हनुमान जी के सूर्य को निगलने की कथा है। सूर्य के पास नहीं गए। सूर्य को निगल ही लिया। इसका मतलब क्या है? वह सूर्य से जुदा नहीं रहे। और जब सूर्य से जुदा नहीं रहे तो तीनों लोकों में अंधारा छा गया। तीनों लोक कौन? स्थूल सूक्ष्म कारण सारा प्रपंच शून्य हो गया। और बचा क्या? अगम पुरख परम पुरख और हनुमान जी दोनों एक

[24:33] हो गए। यह थोड़ा थोड़ा साधना का रहस्य है। इसकी चर्चा शायद आज होगी और इसी वास्ते राम जी कहते हैं भरत जी तो राम जी के अवतार ही थे। चतुर्भुज रूप चार राम भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न के रूप में राम जी ने अवतार लिया। तो वह कहते हैं यहां पर चौपाई आई थी। तुम मम प्रिय भरत सम भाई जैसे राम जी

[25:20] भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न ये चार अलग-अलग नहीं है चतु चतुर्भुज मान लीजिए इस रूप में राम जी ने अवतार दिया तो यह राम जी कह रहे हैं जैसे मेरे भाई भरत आदि है वैसे ही आप भी मेरे साथ ही युक्त हो तो हनुमान जी की महिमा किस प्रकार क्यों कि वह भी भगवान के साथ बिल्कुल अनन्य रूप से जुड़े थे जैसे और अवतारी भाई थे इसकी चर्चा फिर देखेंगे थोड़ा थोड़ा तो अब हम रामायण के प्रसंग में साधना की चर्चा करेंगे रामायण की कथा को

[26:07] आधार बनाकर एक व्यक्ति का लक्ष्य क्या है? साधना क्या है? राम भक्त या गुरु भक्त का रास्ता कैसे चलता है? उसकी चर्चा करेंगे।

[27:04] अनादि गुरु तो है परमेश्वर ईश्वर ही है। उसके बाद सनक सन सनातन आदि वशिष्ठ आदि नारद आदि व्यास जी सुखदेव जी पपा पादाचार्य गोविंद पादाचार्य शंकराचार्य यहां से पूरी नाम शुरू हुआ ये अनादि परंपरा ही है और वहां से फिर मेवाप पुरी जी प्रत्यक्ष रूप में जिनको हम जानते समाधि भी बनी हुई है। कमली वाले और हमारे महाराज दयालुपुरी जी और उसके बाद आप हम सब बैठे हुए हैं। वो इसी परंपरा में

[27:52] है। जो भी चाहे उस रास्ते पर चल सकता है। इसमें कोई शक नहीं। वो लक्ष्य धारण करे। मेरा यही रास्ता है। इसी रास्ते पर चलना है। गुरु वाणी में फिर स्पष्ट आता है। गुरु सिख सिख गुरु है। एक को गुरु उपदेश चलाए राम नाम मंत्र हृदय देवे नानक मिले सुझाए सहज सुभाए। ना गुरु सिख सिख गुरु है। यह साधना का रास्ता ऐसा ही है। यदि सिख पूरा हो जाए, शिष्य पूरा हो जाए, मंत्र को धारण कर ले और मंत्र गुरु में फर्क तो होता नहीं है।

[30:59] रामायण के प्रसंग बीचबीच में से ले रहे हैं। और पिछले प्रसंगों में मनुष रूप का तप और उन्होंने वर मांगा वात्सल्य भक्ति का। वात्सल्य भक्ति की धारणा के लिए उसको और बढ़ाने के लिए भगवान राम बालक बनकर उनको माता का सुख दिया। वात्सल्य भाव की प्राप्ति हुई और साधना आगे बढ़ती गई। प्रेम की साधना, समर्पण की साधना। तो यहां हम ले रहे हैं प्रसंग। चारों अवतार भाइयों का आविर्भाव हो चुका। राम, भरत,

[31:47] लक्ष्मण, शत्रुघ्न। दशरथ की तीन रानियां थी। कौशल्या कैकई और माता सुमित्रा तीन माताएं पिता तो एक ही है दशरथ है चार भाई लेकिन यहां पर यह देख लेना है भाइयों में कितना ज्यादा प्यार था ये आदर्श है एक चार भाइयों में इतना ज्यादा प्यार बचपन से इतना ज्यादा चार लेकिन सिर्फ फिर भी राम के ही अनुगामी होते थे। राम की शक्ति से राम के ही आगे पीछे वो सारा नृत्य करते थे। बाकी भाई भी

[32:36] और तोतली भाषा में राम जी बात करते हैं। वह भी करते हैं और माता को वात्सल्य सुख देने के लिए कभी राम जी कौशल्या की गोद में बैठ जाते हैं। कभी सिर पर कभी फिर आगे भागते हैं। कौशल्या पीछे भागती है। इस प्रकार से खेल होते रहे। और अभी यह बाल्यावस्था की ही बात है। कौशल्या ने भोग लगाया खाना बनाकर और वह भोग लगाने चली गई और राम जी को एक पलंग पर लिटा दिया।

[33:22] और जब भोग लगा रही है देखती हैं राम जी तो यहां भोजन कर रहे हैं। अभी तो मैं उनको पलंग में लेटाकर आई थी और राम जी यहां भी भोजन कर रहे हैं। बड़ी हैरानी आश्चर्य ये क्या हो गया? क्या राम जी वहां से इधर आ गए। अभी तो सोए हुए थे। वहां जागते वहां भी राम जी सोए हुए हैं। और वहां जाते राम जी भोग लगा रहे हैं जो भगवान को लगाया था। इस प्रकार के कई दृश्य होते रहे। जब ऐसा दृश्य कौशल्या ने देखा वह तो एकदम जैसे हलचल सारी यह क्या हो रहा है? आनंद के तरंगे भी उठ रही है।

[34:08] और यह भी समझ रही है कि यह हो क्या रहा है। मेरी समझ में नहीं आ रहा। तो राम जी ने एक और खेल किया वहां। सीता जी की आंखों में देखते हुए उन्होंने अपना मुंह खोल दिया। मुंह मतलब यह मुंह नहीं है। यह मुख सारा ही मुख है। यह इंद्रिय, छिद्र, नाक, मुख, कान आदि ये सारा मुख ही होता है। तो सब खोल दिया। सारी इंद्रियां खोल दी और कौशल्या की चेतना को अपने अंदर खींच लिया। और कौशल्या का देख रही है राम जी के शरीर के अंदर सूर्य चंद्र हैं, नक्षत्र हैं, देवताएं

[34:54] हैं, ऋषि मुनि हैं, समुद्र हैं, पर्वत हैं। वो क्या देख रही है? देख क्या रही है? जब देखने वाला राम जी के हृदय में स्थित है तो वह भी तो वैसे ही बन जाता है। लेकिन होते हुए भी वह देख भी रही है इसको। और थोड़ी देर के बाद हंसते हुए राम जी ने उनको अपने शरीर से थोड़ा अलग कर दिया माता बना दिया वात्सल्य करने के लिए तो ऐसी लीलाएं होती रही। यहां पर एक प्रसंग हम जो अभी शुरू किया था उसकी चर्चा भी करते हैं।

[35:39] यह सिद्धांत यदि समझ में आ जाए तो साधना सूत्र पूरा का पूरा समझ में आ जाएगा। वह पहले ही कह चुके हैं नानक वाणी में यह और भी शब्द आता है अव्वल अल्लाह नूर उपाया कुदरत के सब बंदे जहां पर दूसरा है ही नहीं ऐसा जो परमेश्वर है उसकी जो नूर मतलब प्रकाश ज्ञान ज्योति ब्रह्म ज्योति उसका विस्तार किया अवल अल्लाह नूर पाया कुदरत के सब बंद ये जितनी सृष्टि है वो

[36:29] परमेश्वर का ही रूप है दूसरा कोई है ही नहीं विश्वूप भी है वही और विश्वातीत भी है इसके आगे पंक्ति में आती है साधक के लिए है एक नूर ते सब जग उपजया ये जानते हैं बहुत लोग पंजाब में यह प्रसिद्ध है तो कहावत एक नूर ते सब जग उपजया कौन पले कौन मंदे जब एक नूर से ही सारा प्रकाश जगत पुतन हुआ है तो कौन अच्छे कौन बुरे कौन पापी कौन पुण्य आत्मा कौन अज्ञानी कौन मुक्त

[37:16] सब एक ही तत्व है। यह साधना सूत्र है। आचार्य शंकर ने भी लिखा है सर्वात्मना बंध विमुक्ति हेतु सर्वात्म भावों से परो न कश्चित पूर्ण रूप से जो मुक्ति चाहता है सर्वात्म भाव से बढ़कर और कोई साधना हो ही नहीं सकती है। लेकिन वह सर्वात्म भाव की साधना का दृश्यग सति उपपदते सो दृश्य का ग्रहण ग्रहण अपने से अलग होकर नहीं ये वो है जो वह है वो है इसका ग्रहण कर दो ये तो अज्ञान जननी है अज्ञान भी शक्ति इसकी चर्चा नहीं है एक

[38:02] स्तर है लेकिन जो सारे स्तरों को लांगना चाहता है दृश्यग सती उपपदते सो जब यह मैं अपने आप को अलग समझकर दृश्य को ग्रहण करना छोड़ देता हूं। ब्रह्मी भू कृति भव है ना ब्रह्म स्वरूप होकर कृत कार्य हो जाता हूं। तो यहां यह साधना का बहुत ही बड़ा सूत्र है। प्राय साधना अहंकार पूर्वक मैं करूंगा जप मैं करूंगा

[38:47] तप। मैंने साधना करनी है। मैंने सेवा करनी है। मैंने जब करते यह करना है तो मैंने यह नहीं करना। अहकार में मैं और मैं नहीं यह दोनों चीजें आ जाती हैं। मैं यही करूंगा यह नहीं करना है। तो कोई सेवा होती है, कोई साधना होती है। इसकी ज्यादा चर्चा ना भी करते हुए केवल इतना ही कहेंगे। इस साधना की शुरुआत कब हो? वह होती है प्रथम चरण है गुरु की शरण में जाकर परम पद की प्राप्ति की श्रद्धा वैराग्य

[39:33] पूर्वक तड़प लगाकर और गुरु की आज्ञा में रहकर सेवा करनी मनमर्जी से नहीं मन मर्जी से ना कोई सेवा होगी मैंने यह करना है मैंने यह नहीं करना मनमर्जी से करेंगे कोई जप नहीं होगा। मैंने तप करना है। मैंने जप करना है ना मैं तपस्वी हूं। देखो माता पार्वती ने कैसा तप किया था। कल के ही प्रसंग में था। भगवान को भगवान के चरणों को अपने हृदय में स्थापित किया और प्रेम पूर्वक

[40:21] वो साधना करने लगे श्री देह तप ही मन लागा वो तप है। प्यार से जो किया जाता है प्यार से जो सेवा की दी जाती है वह सेवा है। प्यार से जो भजन किया जाता है, भाव से जो भजन किया जाता है, वह भजन है। जब तक अहंकार के आश्रित होकर हम्म करते हैं। मैं हूं तो तेरा भी रह गया। मेरा तेरा तो सेवा करते भी खटपटे होनी शुरू हो जाती है। मैंने करना है। मैं अपनी मर्जी से करूंगा। जब भी करते यह बस मैंने ही भजन करना है।

[41:08] है ना? कोई दरवाजे पर खटखट भी कर रहा है। अर्थार्थी है, जिज्ञासु है, भावुक है। अभी समय नहीं है हमारा। वो क्या भजन हो गया? किसका भजन कर रहे? तड़पता हुआ के दरवाजे पर आया है। तो वह भगवान जिसका भजन कर रहे हो क्या वह उससे जुदा है? तो इस प्रकार से वातापादी होते चले जाते हैं। तो पहले सेवा फिर भजन और साथ ही साथ सेवा और भजन दोनों साथ-साथ चलेंगे और सेवा और भजन दोनों साथ चलते चले जाएंगे

[41:54] और वह भजन ही भक्ति बन जाएगा। भाव से करेंगे, प्यार से करेंगे, पूरा समर्पण करते चले जाएंगे। तो ऐसा करते करते ही भाव यदि बन जाएगा तो संप्रज्ञा समाधि में प्रवेश हो जाएगा। भाव की चर्चा कल भी शायद हुई थी। एक बार फिर स्पष्ट कर दें। भाव का अर्थ प्रेम ही है। जैसे हम मन से चिंतन करते हैं। मैंने यह काम करना है। मैंने यह काम करना है। मैंने यह काम करना है। ऐसे करते रहते हैं। मैंने आत्मचिंतन करना है। ऐसे भी हो जाता है। लेकिन भाव से आत्मचिंतन नहीं होता।

[42:41] भाव से आत्म चिंतन तभी होगा जब सारे इंद्रिय छिद्र जहां से प्राण वायु बाहर जाती है मन बाहर जाता है वो इंद्रिय छिद्र अंदर की ओर खुलने शुरू हो जाए क्रोध लोभ मोह विकार आदि बिल्कुल दब जैसे जाए उनमें कोई शक्ति नहीं रहे बरगामनी की तो ऐसी अवस्था में जो फिर मन है है ना इसमें संस्कार भी अनात्म संस्कार हैं। वह तो ज्ञान खत्म होगा तो भी सारे दगद होंगे। लेकिन वह जो संस्कार दब गए हैं और मन में फिर क्या होता है? मैं वही हूं। ऐसा चिंतन करें।

[43:28] मन में ऐसा चिंतन हो कि परमेश्वर ही सब कुछ है। भक्ति भी हो जाए। तो इस प्रकार करते करते यदि मन में सारे में जो अंतर्मुखी हो गया है ऐसा भाव पैदा हो जाए तो प्राणों की गति अपने आप अंदर जानी शुरू हो जाएगी। मन प्राणों को नियंत्रित करेगा। मन अंतर्मुख है तो प्राण भी अंदर जाएंगे जाएंगे। इस प्रकार से मन और प्राण का जो मिलन है उसका नाम है भाव। आत्म चिंतन से भी बढ़कर है भाव लेकिन संभव है। बिल्कुल संभव है। यदि हम ऐसा करने की कोशिश करेंगे तो

[44:18] मूल फिर बार-बार कह रहे हैं साधना के पथ में जो सबसे बड़ी रुकावट है वह अहंकार ही है और कोई नहीं। अहंकार पैदा होता है अज्ञान से। और यदि हम अहंकार को अपने अहंकार को नहीं पहचाने उसको मुक्त होने की साधना के लिए भाव पैदा करें। गुरु की शरण में जाए। उनकी आज्ञा अनुसार सारी साधना करें तो भाव पैदा हो जाएगा। अहंकार भी धीरे-धीरे शांत हो जाएगा। तो इस प्रकार से यह राम जी के प्रसंग में जैसे शोधा को दर्शन वो तो वात्सल्य भाव का और भी सर्वात्म भाव का भी दर्शन हुआ। इसके

[45:05] बाद फिर राम जी की कथा आती है। राम जी थोड़ा थोड़ा बड़े होना शुरू हो गए। भाइयों के साथ खेलते भी हैं। थोड़ा सा लड़ते झगड़ते भी हैं। ऐसी लड़ाई नहीं है। बहुत प्यार की है। यदि कोई दूसरा हारने लगता है और मित्र भी आ जाते हैं तो राम जी हार जाते हैं। ऐसा खेल खेलते हैं। खेल में यदि उनका जो साथी पराजित हो रहा है तो राम जी हार देते हैं। दूसरे को जीिता देते हैं। ऐसा खेल आजकल ऐसे थोड़ा खेल हो गए। तो इस प्रकार साधना करते-करते जब कुमार अवस्था हो गई तो चारों भाइयों को गुरु जी

[45:52] के पास शास्त्र अध्ययन के लिए भेज दिया। तो वहां पर गुरु जी शास्त्र अध्ययन करते थे और थोड़े दिनों में ही करते करते थोड़े महीने में ही सारे शास्त्र में पारंगत हो गए। फिर घर आ गए और फिर बड़े होते गए। अब युवावस्था है। मान लीजिए 16 वर्ष के हो गए हैं तो उस समय एक और घटना घटी। तो विश्वामित्र जी राम जी के दरबार में आए। विश्वामित्र बहुत बड़े ब्रह्मग ज्ञानी थे। और वह राम जी के पास आए।

[46:38] दशरथ जी ने वशिष्ठ गुरु के साथ जाकर उनका सत्कार किया। दशरथ जी ने उनके चरणों में प्रणाम किया। वशिष्ठ जी विश्वामित्र आपस में गले मिले और आकर बैठ गए और दशरथ जी पूछते हैं आपने दर्शन दिए हैं। मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं? तो विश्वामित्र जी ने कहा हम यहां पर यज्ञ करते हैं या हमारे आश्रम है और वहां पर यज्ञ करते समय जो असुर हैं राटका आदि मरीश बाहु आदि वो यज्ञ को विध्वंस कर देते हैं।

[47:25] यज्ञ पूरा नहीं होने देते हैं। वो यज्ञ कैसे हैं? अग्नि के माध्यम से अंदर देवता को जला जगाकर और बाहर ब्रह्मांडी देव व्यापी देवताओं के साथ संबंध जोड़ते हैं और इसके परम देवता से परमेश्वर से मिलने का रास्ता खोजते हैं। इस प्रकार बहुत से तपस्वी यह यज्ञ किया करते थे। लेकिन रावण को भय था। उसने असुरों को आज्ञा दे रखी थी। इनके यज्ञ नहीं होने देने। यदि यह यज्ञ इनके पूर्ण हो गए तो बहुत शक्तिशाली हो जाएंगे। ये धर्म का प्रचार

[48:11] करना शुरू कर देंगे। फिर हम कहां रहेंगे? हम कहां जाएंगे? इनके यज्ञ को होने नहीं देना। और तपस्वीयों की जो एक नियम था ऐसे तो विश्वामित्र इतने बड़े महावीर थे कि संकल्प से ही राक्षसों को दग्ध कर सकते थे यज्ञ में विध्वंस करने वाले को लेकिन वह ऐसा नहीं करते थे नहीं तो फिर उनका जो साधना है और ऋषियों की जो साधना है जिनके वह मुखी थे वो विघ्न पड़ जाएगा पूरी नहीं होगी तो चलो उन्होंने सोचा राम राम जी को ले आते हैं। लक्ष्मण जी को ले जाते। चार भाई थे भरत, राम और लक्ष्मण, शत्रुघ्न।

[49:01] लक्ष्मण जी का साचर्य राम जी के साथ था और शत्रुघ्न भरत जी के बिल्कुल साथ वैसे सारे रहते थे। और लीला के कारण जैसा भी है। तो जब वहां पर विश्वामित्र ऐसा कह रहे हैं कि आप राम लक्ष्मण को मेरे साथ भेज दो जिससे कि तपस्वीयों की साधना में कोई विघ्न ना पड़े। यह विघ्नों को दूर करने का राजा का कर्तव्य ही है प्रजा की सुख शांति धर्म में रति करना धर्म की मदद कर पालन करना अधर्म का रुकावट संहार करना। लेकिन दशरथ जी व्याकुल हो गए। अभी तो मेरे

[49:49] बालक हैं छोटे-छोटे हैं। यह राक्षसों का संहार कैसे कर सकते हैं? फिर वशिष्ठ जी ने समझाया दशरथ जी को कि आप चिंता ना करो। यह मामूली बालक नहीं है। इनका तो कार्य जन्म ही ऐसा हुआ है कि साधु संतों के धर्म की रक्षा करने और अधर्म का संहार करना। यहां पर एक प्रसंग आता है विशिष्ट और विश्वामित्र का। वशिष्ठ ब्रह्मऋषि थे। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे। मानस पुत्र संकल्प से पैदा हुए थे। यह

[50:34] नहीं कि उनमें पांच तत्व नहीं थे। पांच तत्व ही थे। लेकिन जो सूक्ष्म तत्वों की प्रधानता थी। तो कहते मैं पुरोहित आदि का कार्य क्यों करूंगा? मैं तो साधना में ही और आगे बढूं और व्यापक हो जाऊं। फिर जब उनको पता लगा वशिष्ठ जी को कि यह यहां पर राम जी का अवतार होने वाला है। अभी हुआ नहीं बहुत समय था। कई सदियां थी तो वशिष्ठ जी मान गए। इसके साथ विश्वामित्र का प्रसंग आता है।

[51:21] वशिष्ठ जी तो ब्रह्मा के ही मानस पुत्र थे। लेकिन विश्वामित्र एक राजा थे। क्षत्रिय कुल में जन्म हुआ। आजकल के क्षत्रिय का नहीं मतलब है। रजोगुण प्रधान थे। सत्वगुण उसके अधीन था। साधना के लिए तो धीरे-धीरे महर्षि बनने के लिए तो सत्वगुण की प्रधानता चाहिए। लेकिन विश्वामित्र में रजोगुण प्रधानता क्षात्र धर्म फिर वो वैश्य धर्म है, शूद्र धर्म है। इनकी ज्यादा चर्चा नहीं करनी। तीन गुणों की प्रधानता गौणता के कारण ये चार वर्ण बनते हैं। है ना? किसी में भी हो।

[52:09] वर्तमान समय में चाहे वह शूद्र कुल में जन्मा हो, चाहे वह क्षत्रिय कुल में, चाहे वैश्य कुल में चाहे किसी भी कुल में जन्मा हो यदि उसमें रजोगुण प्रधान है सत्वगुण की ओर जाने की इच्छा है वह अवश्य ही परमात्मा की प्राप्ति कर सकता है इसमें क्यों क्योंकि आजकल वर्ण शंकर का जन्म वर्ण शंकर का दिन है समय है वर्ण शंकर एक गुण पति पत्नी दोनों में जब पति में कोई गुण प्रधानता है पत्नी में कोई गुण प्रधानता है दोनों में एक ही गुण तो बात अलग है वो बहुत कम होता है आजकल भी तो खैर विश्वामित्र राजा थे। एक बार अपनी सेना के साथ मद मेंचूर मैं

[52:54] राजा हूं। वो घूमते फिरते वशिष्ठ जी के आश्रम में पहुंच गए। और इतनी बड़ी से राजा सोचता था विश्वामित्र ने सोचा मेरे साथ तो इतने सैनिकों का मंडल सैनिकों हजारों सैनिक हैं तो वशिष्ठ जी हमारा पालन पोषण भोजन आदि की व्यवस्था कैसे करेंगे लेकिन वो देखकर बड़े आश्चर्यचकित हो गए विश्वामित्र जी कि जो मांगा सब मिलता गया कोई भूखा नहीं कहां से भंडारा आ रहा है इतना उन्होंने खोज की बात क्या है रहस्य क्या है तो वशिष्ठ जी के पास कल्पधेनु थी

[53:45] है ना जो स्वर्ग में देवताओं के सेवा करती है तो वह कल्पधेनु कल्प गाय वो जैसा चाहती थी वैसा हो जाता था वैसा ही अन्न जल आदि दूध आदि सब मिल जाता था तो विश्वामित्र जी बड़े आश्चर्य भी हुए और उसमें अहंकार तो था ही मैं राजा हूं। तो ऐसा जो अमूल्य गाय है मेरे दरबार में होनी चाहिए। मेरे पास होनी चाहिए। उन्होंने वशिष्ठ जी को कहा आप तो जंगलों में रहते हो। आपको जितना खाने पीने की जरूरत होगी मैं भिजवा दिया करूंगा। यह कल्प गधेनु मुझे दे दो। तो कह ऐसा तो

[54:31] नहीं हो सकता है। यह कोई मेरी वस्तु थोड़ है। देवताओं ने उपहार में दी है और साधु संतों की अतिथियों की सेवा के लिए दी है। मेरी मल्लकियत तुझे है ही नहीं। मेरा इस पर कोई हक नहीं है। मैं कैसे दे सकता हूं? लेकिन विश्वामित्र को थोड़ा गुस्सा आ गया। तो उन्होंने बाण थोड़ा ऐसे करते काफी कुछ यह करूंगा यह करूंगा संग्राम जैसे छेड़ दिया बाण युद्ध शुरू कर दिया किसने विश्वामित्र ने और वशिष्ठ जी शांत खड़े हैं प्रसन्न मुद्रा में और जो बाण आता है या इधर जा उधर जा हजम हो

[55:16] जाता है किसी बाण का उस पर असर नहीं ब्रह्मास्त्र का नाम आता है वाल्मीकि रामायण में। वह ब्रह्म रूपी अस्त्र ब्रह्मज्ञ थे। उनकी रक्षा के लिए वो वहां पर विश्वामित्र के छोड़े हुए बड़े-बड़े अस्त्र शस्त्र भी नाकाम हो गए। विश्वामित्र को और ज्यादा क्रोध आ गया। है ना? कहते हैं मैं तप करूंगा, तपस्या करूंगा, यह करूंगा। विश्वामित्र की कई कहानियां आती हैं। तो इस प्रकार करते करते और शक्ति उसने अर्जित की और शक्ति अर्जित की और बहुत से राजाओं को वश में किया। इसको

[56:03] स्वर्ग में भेजने की कोशिश की किसी को मरीष आदि को तो उसके बाद फिर गए वशिष्ठ के पास। तो वशिष्ठ ने कहा आइए राज्षि उसको फिर अहंकार हुआ मैं इतना तप किया है अभी भी मुझे राज्षि कह रहे ब्रह्मर्षि नहीं कह रहे तो और अहंकार हो गया चिढ़ गया और लेकिन उसका चारा चलता नहीं था उनके सामने उसकी दाल गलती नहीं थी विश्वामित्र के वशिष्ठ ऋषि के ब्रह्मज्ञ के सामने और धीरे-धीरे जब इतना क्रोध बढ़ गया यह

[56:49] सारे तो जो ऋषि मुनि है मेरी बहुत पूजा करते नमस्कार करते हैं ये मुझे कहता है राज ऋषि यह ब्रह्म्षि भी नहीं कह रहा है अपने बराबर नहीं मान रहा है तो यहां एक प्रसंग आता है उसके मन में इतना गुस्सा आया अब मैं वशिष्ठ को खत्म ही कर दूंगा कि जैसे मुझे राज्षि कहने वाला कोई रहे ही ना और सारे ब्रह्म्षि मुझे पुकारेंगे तो चोरी चोरी रात कैसे समय गया कहते सीधा तो मैं मान सामना कर नहीं सकता हूं तो चंद्रमा की चांदनी खिली हुई थी वशिष्ठ और उनकी अर्धांगिनी अरुंधति

[57:36] दोनों आपस में चर्चा कर रहे हैं तो अरुंधति पूछिए आजकल बड़े-बड़े तपस्वी हैं। कौन बड़ा तपस्वी है? तो जैसे वशिष्ठ जी ने कहा कि जैसे चंद्रमा की चांदनी चमक रही है। इसी प्रकार त्रिलोकी में विश्वामित्र का तप प्रकाशित हो रहा है। अब विश्वामित्र तो किसी क्रोध के कहते यह तो एकांत में अपनी पत्नी के साथ मेरी इतनी प्रशंसा कर रहा है।

[58:24] बड़ी लज्जा लगी उनको। मैं बड़े गलत काम के लिए आया हूं। अंदर गया विश्वामित्र गए और वशिष्ठ जी के चरणों में नतमस्तक हो गए। उसी समय वशिष्ठ जी ने उनको उठाया और कहा आइए ब्रह्मर्षि ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त हो गया। तो यह वशिष्ठ विश्वामित्र और विश्वामित्र फिर वो क्षात्र धर्म वो भी था और ब्रह्म पद वो भी था। एक ही जन्म में

[59:10] यह तमोगुण रजोगुण से ऊपर वह सतगुण में प्रवेश कर गए। ऐसे महापुरुष थे। तो ऐसे विश्वामित्र जी अब दशरथ के दरबार में आए हैं। इसलिए कि तपस्वीयों का तप सुरक्षित रहे। सुरक्षित तो रह सकता था। वशिष्ठ जी थे लेकिन असुरी सेना के कारण जब वशिष्ठ जी ने ऐसे समझाया तो विश्व मित्र जी ने वशिष्ठ जी ने दशरथ को समझाया तो वो दशरथ जी भी मान गए और उन्होंने बड़े भाव से चाहे तो राम लक्ष्मण को भेजा आप

[59:57] विश्वामित्र जी के साथ जाइए और यज्ञ की रक्षा करिए तपस्वीयों के तप खंडित ना होने पाए तो यह प्रसंग आ आगे आता है। रास्ते में ताड़का असुरी मिली। विश्वामित्र जी कहते हैं आसपास ताड़का रहती है। राक्षसी रहती है। राम जी ने धनुष पर ऐसे टंकार मारी। भयभीत होकर डर के ताड़का आई कि यह कौन है? मैं इसको मार दूंगी। डरता हुआ जो प्राणी है दूसरे को ज्यादा डराता है। तो एक ही बाण से तड़का का संहार कर दिया। कितने कोसों दूर जाकर पड़ी और जब यज्ञ शुरू हो गया तो यज्ञ शुरू हुआ और पहरा

[1:00:42] देने के लिए राम लक्ष्मण है रात दिन पहरा देते हैं मारी सुबाहु आदि आए सुबाहु को एक बाण मारा उसका तो वहीं पर खात्मा हो गया और मारीज को भगवान की लीला थी एक बाण मारा और चित्रकूट में जाकर गिरा इस प्रकार संहार करते करतेकरते देवताओं ओं का यज्ञ ऋषियों का यज्ञ पूरा हुआ और फिर विश्वामित्र जी का तो और भी प्रयोजन था। वह उनको आगे आगे जनकपुरी में ले गए। वहां पर सीता का स्वयवर होने वाला था। विवाह होने वाला था। इसका प्रसंग ज्यादा लंबा नहीं करेंगे। वहां पर उन्होंने शिवधनुष जो एक शर्त रखी गई थी उसको भी

[1:01:30] विजय किया जीत लिया। उसका भी संघार हो गया। शिव धनुष का और परशुराम जी आए। उनसे भी बातचीत हुई और इस प्रकार वहां पर धनुष तो राम जी ने ही तोड़ा था। लेकिन राम जी कहने लगे सारे भाई अकेले खेलते रहे। अकेले ही पड़े रहे हैं। सब कुछ काम करते रहे। मेरा विवाह अकेले क्यों हो? चारों भाइयों का विवाह होना चाहिए। तो जनक जी भी प्रसन्न हुए और दशरथ को भी खबर मिल गई तो चारों भाइयों का भी साथ ही विवाह हो गया। ये भाव की बात करते हैं।

[1:02:15] यहां तो थोड़ी सी जमीन हो मेरा हिस्सा है। तेरा हिस्सा नहीं है। है ना? इससे की तो वहां पर बात नहीं है। इसी प्रकार जब राजतिलक मिलने की बात आई थी राम जी को तो राम जी कहते मैं अकेला कैसे राजगद्दी पर बैठ सकता हूं। मेरे भाई भी तो बैठे हैं। तो वह तो संभव नहीं था। राजतिलक तो एक ही था। खैर यहां पर भी चारों भाइयों का चारों शक्तियों के साथ विवाह हुआ। भरत लक्ष्मण शत्रुघन आदि चारों का भी विवाह संस्कार हुआ। यह हम कह रहे हैं गृहस्थ में कितना भाइयों में आपस में प्यार होना है।

[1:03:03] ना इसकी चर्चा और भी आगे आएगी। और जब वह वापस आ गए कुछ समय बीत गया। फिर दशरथ जी ने सोचा कि मेरा शरीर अब काफी वृद्ध हो रहा है तो मैं किसी को राजतिलक कर दूं। तो राजतिलक में सारे ने समझाया वशिष्ठा दीज ने कि राम ही बड़े पुत्र हैं। राम ही अधिकारी हैं। इनको ही राजतिलक कर दीजिएगा। दशरथ जी पहले राम जी तो पहले ऐसे सोचे कि मैं अकेला कैसे राजगद्दी पर बैठ सकता हूं। लेकिन जब सब ऋषियों ने समझाया, दशरथ आदि ने समझाया, कैकई ने भी समझाया, सब कुछ

[1:03:50] समझाया कि राम ही गद्दी पर बैठेंगे क्योंकि राजगद्दी पर तो एक ही है। कहते फिर अच्छा राम जी कहते चलो कोई बात नहीं। मैं सबकी आज्ञा पालन करता हूं और जो राज कार्य है हम सब मिलकर ही करेंगे। यह सारे भाई मिलकर ही करेंगे। तो यहां तक का प्रसंग आ गया। थोड़ा सा प्रसंग और आगे चलता है। यह दैवी योजना है। ईश्वरी योजना है। जिसके अधीन सारा कुछ हो रहा है। देवताओं ने सोचा यदि राजा राम यह अयोध्या

[1:04:36] के ही राजा बन गए तो रावण का संहार कैसे होगा? उन्होंने चुना एक व्यक्ति को। मंथरा दासी जो भरत की माता की दासी थी तो वह दासी कैकई भरत की माता कैकई की सहचर्य थी तकरीबन तकरीबन उसके साथ ही रहती थी तो देवी शक्ति ने मंथरा को चुना इसके माध्यम से हम अपना काम करेंगे। सरस्वती ने सोचा सीधा कैकई के हृदय में तो

[1:05:23] मैं प्रवेश नहीं कर पाऊं। कैकई के मुख से सीधे मैं अपनी बात दशरथ तक नहीं पहुंचा सकूंगी। तो मंथना के माध्यम से उन्होंने सारा द्रव यह क्रिया किया। अब यहां पर एक बात और समझ में आ जानी। एक प्रसंग है मंथरा का और दूसरा प्रसंग है विभीषण का। मंथरा बिल्कुल सात्विक वातावरण में रह रही है। जहां राम जी हैं। असत्य का नाम निशान नहीं

[1:06:09] आसुरी राज्य है ही नहीं। और ऐसे सात्विक वातावरण में भी रहती हुई मंत्रा सरस्वती की चाल में क्यों आ गई है ना तो कितना शुद्ध वातावरण हो कितना सात्विक वातावरण हो यदि हम तमोगुणी हैं रजोगुणी है साधना के पथ पर अग्रसर नहीं हो ना कितनी भी अनुकूल परिस्थिति हो हम अकेले में साधना करेंगे जंगलों में करेंगे सत्संग करेंगे आश्रम में करेंगे लेकिन यदि

[1:06:56] हमारा ही मन मलिन हो तो साधना के पथ पर आगे नहीं चल सकते और उधर विभीषण देखो विभीषण का प्रसंग है हनुमान जी के साथ हनुमान जी सीता की खोज करते हुए लंका में पहुंचे। बहुत जगह खोज की। इधरउधर राज महलों में इनका सूक्ष्म शरीर भी धारण कर सकते हैं। हनुमान जी राज महलों में गए। मंत्रियों के महलों में गए। रानियों के महलों में गए रात को। लेकिन सीता का पता नहीं लगा। इसी खोज में वह विभीषण की वाटिका में गए। जहां विभीषण भी रहते थे। वहां पर सब जगह

[1:07:42] राम राम ऐसे लिखा हुआ है। श्लोक लिखे हुए हैं। वेदा आदि के लिखे चिन्हित हैं। तो वहां पर जाकर सेतु शायद यहां सीता का पता मिल जाए। तो विभीषण जी ने देखा राम राम कहते हुए हनुमान जी उनके पास आए। तो विभीषण ने कहा यह तो कोई सात्विक पुरुष है लंकापुरी में। वह कहां से आ गए? तो विभीषण जी ने उनको प्रणाम किया। हनुमान जी को गले लगाया। फिर वह हनुमान जी को शंका हुई कि ऐसी लंकापुरी में जहां असुरों का राज्य है, झूठ, कपट, हिंसा अधिकाई है। खाना पीना

[1:08:28] बिल्कुल भयंकर है। मां, शराब इसके अलावा और कोई चर्चा ही नहीं होती है। तो ऐसे स्थान में, ऐसे वातावरण में यह विभीषण कहां से? मंथरा की बात कह चुके हैं। अब ऐसे विपरीत वातावरण में तमोगुणी वातावरण में रजोगुण तमोगुण के ही अधीन है। ऐसे वातावरण में विभीषण कैसे रहे? आप कैसे रहते हो ऐसे वातावरण में? हनुमान जी ने पूछा तो विभीषण कहते हैं कहा कहो अब रहनी हमारी जो दंतन विच जीभ बेचारी हमारी रहनी क्या

[1:09:14] कहें जैसे 32 दांतों के अंदर जीभ रहती है इधर भी थोड़ी जीभ हिल जाए तो कट जाएगी लेकिन जीभ की हिल विभीषण की जीभ कभी हिली नहीं इधर उधर सामान्य व्यक्ति हो ना उल्टा सीधा करे यह करें वह करें बोले उल्टा सीधा कई बार जीभ कट सकती है दांतों के नीचे आ सकती है लेकिन 32 दांतों के बीच में रहते हुए भी विभीषण रूपी जीभ की आसुरी सेनाओं के मध्य में रहते हुए भी विभीषण का मन रूपी जीव कभी घायल नहीं हुआ तमोगुण से रजोगुण से तो यह साधना

[1:10:01] बात चल रही थी मंथरा की। मंथरा वहां पर आई और सरस्वती ने उसकी बुद्धि घायल कर दी। अपने हिसाब से चला रही हैं उसको और इस प्रकार करते करते ये क्या नाम उसका कैकई भी उसकी बातों में आ गई और वो शोकाकुल हो गई। शोक ग्रह में चली गई और वहां पर फिर थोड़ा सा ऐसे कर लेते हैं। यह सुमित्रा उसको उस मंत्र को पता लगा यह

[1:10:48] अब तक तो कैकई बाहर आ जाए करती आद वहां पर पूछी कैकई तो जैसे वस्त्राभूषण उतार कर ऐसे रोती धोती केश बिखरे हुए लेटी हुई है। कहती मैं बहुत व्याकुल हूं। ऐसे ऐसे ऐसे है तो दशरथ जी आ गए कि कल तो राजतिलक होना है। ये कैकई की क्या हालत हो गई है? तो कैकई तो वो नाटक कर रही थी। अब पुरानी कथा है जब देवासुर संग्राम हो रहा था। दशरथ जी असुर देवताओं का साथ लेने के लिए युद्ध में गए थे। वहां पर कैकई रानी भी उसके साथ थी और युद्ध करतेकरते दशरथ के रथ का जो पहिया था जो चूल थी वो निकल गई तो कैकई

[1:11:33] उसमें बहुत सगुणी थी दशरथ की बहुत प्यारी थी उसने अपनी उंगली बीच में डाल कि रथ का पहिया बाहर ना आ जाए लहूलुहान हो गया लेकिन रथ चलता रहा और देवताओं की विजय हुई और जब दशरथ त को पता लगा तो बहुत प्रसन्न हुए। कहते वर मांगो दो वर देता हूं तुमको। कहते मुझे वर की जरूरत नहीं कैकई ने कहा। उस समय कुछ नहीं मांगा। लेकिन दशरथ ने तो प्रतिज्ञा कर दी थी वर मांगने की। अब वह समय आ गया। मंत्रा को पता था कहानी। उसने कहा तुम कैकई रानी हो महारानी हो।

[1:12:20] तुम दो बार मांगो। देखो यह कौशल्या बहुत चालाक है। मित्र भी उसकी साथी नहीं है। अब ये राम राजा बैठ जाएंगे तो भरत को नौकरों की तरह ट्रीट करेंगे। कहता पता नहीं कुछ इधर भगा दे नौकरों की तरह काम करवाएं। तो मैं चाहती हूं तुम्हारा पुत्र दुखी हो, स्वस्थ हो। तो तुम एक बार यह मांगो कि भरत को राज तिलक हो जाए। फिर कहते अभी भी खतरा है। यदि राम जी रहेंगे तो प्रजा कहीं उसके पीछे ना लग जाए तो राम जी को 14 वर्ष का बनवा देना या दो बार मांग लो।

[1:13:08] तो कैकई तो बातों में आ गई। तो दशरथ जी आए वो बोली नहीं। यह नहीं बोली यह नहीं ऐसे बोली तो वो दशरथ जी कहने लगे कल राजतिलक होना है राम जी का है मैं बहुत खुश हूं तू भी खुशी में मेरा साथ दे जो मांगना चाहे मांग मैं तेरी हर इच्छा पूरी करूंगा तो जो वरदान दिए थे उसको फिर रिपीट करवा याद दिला दिया तो कैकई ने तो वही मांगा मेरे पुत्र भरत को राज तिलक दिया जाए। फिर उसके बाद यह कहा तो दशरथ जी एक बार तो बहुत चौंक गए फिर भी समझल का अच्छा कोई बात नहीं राम जी भरत

[1:13:55] में प्रेम ही है। यदि भरत जी भी बैठ जाए मुझे कुछ ज्यादा नहीं फर्क पड़ेगा। चलो कैकई तो प्रसन्न हो जाएगी। लेकिन कैकई तो छल कपट कर रही थी। उन्होंने कहा राम जी को 14 साल के लिए वनवास। यह सरस्वती बोल रही है उनके मुंह से क्योंकि 14 साल आखरी में रावण के वध का समय निश्चित हो चुका था देवताओं शक्ति ईश्वर शक्ति की ओर से तो इस प्रकार से कहानी चलती है ऐसे थोड़ा सा और समय ले सकते हैं अब यहां पर दशरथ की क्या हालत हो गई है दशरथ को जब व्याकुल हुआ

[1:14:42] वो तो बिल्कुल जैसे मृत जैसी अवस्था हो गई लेकिन एक और बात है रघुकुल रीत सदा चले आई प्राण जाए पर वचन ना प्राण चाहे चले जाए वचन जो दिया है वह कभी व्यर्थ नहीं जाना चाहिए वो राम जी को कहते मन मन कह रहे हैं चाहे मुझे बांध दो बेड़ियों में जकड़ दो मुझे कोई दुख नहीं होगा लेकिन तुम सिंहासन पर बैठो लेकिन यह नहीं कह रहे कि मैं वचन से उलट जाऊं

[1:15:28] यह नहीं दशरथ ने कहा प्रतिज्ञा की थी कोई बात नहीं आपके लिए मैं अपनी प्रतिज्ञा का त्याग कर देता हूं यह नहीं कह सके सत्य वचन इसका रहस्य समझ ले कोई यह व्यक्ति शंका कर सकते हैं। यदि दशरथ जी प्रतिज्ञा भंग कर दे तो उसमें क्या फर्क पड़ता है? राम तो राजा बन जाते और भरत जी अपनी साधना करते रहते हैं। ज्यादा तो हां दशरथ जी का है। दशरथ अपनी साधना करते जाते। राम जी भरत राजा बन जाते। धनश का मन प्रसन्न हो जाता। लेकिन ऐसा नहीं है। साधना करने के लिए हम अपना वचन भंग कर

[1:16:15] दें। साधना करने के लिए कर रहे हैं। ऐसी बात नहीं है। सबसे बड़ा सत्य प्रतिज्ञा। इतना बड़ा वचन की रक्षा वही कर सकता है जो सत्य में प्रतिष्ठित हो। जिसका मन जरा भी बहिर्मुखी हो ही नहीं सकता हो। मानव प्राण जरा भी बाहर जा ही नहीं सकते हो। ऐसे सत्य में निष्ठ जो दशरथ है इससे बढ़कर और भजन क्या हो? और यदि तथ्य से चित हो जाए, प्रतिज्ञा छोड़ दें, है ना? यह तो अधर्म हो जाएगा।

[1:17:00] भजन करने की आड़ में अपने दिए हुए वचनों से मुकर जाना है ना वचन दिए हैं कल्याण के लिए ही तो दिए हैं रक्षा के लिए दिए हैं तो यह थोड़ा सा समझ लेना है भजन का सारा और असली वचन क्या है गुरु मंत्र ही तो है गुरु ने हमें दिया है वह मंत्र और किसी लौकिक कार्यों के लिए अन्य कार्यों के लिए उन कार्यों के लिए कोई बात नहीं मंत्र फिर बाद में देखा जाएगा। मंत्र तो जब गुरु से मिलता है एक प्रकार से शक्ति का संचार होता है। अहम का

[1:17:46] विसर्जन होता है थोड़ा सा और मंत्र की अर्थ में दृढ़ रहना इससे बढ़कर और क्या भजन है ना? अपने स्वार्थ के कामों के लिए उन कामों के लिए पहले वह कर लेंगे भजन तो फिर करते रहेंगे वह क्या भजन हुआ मंत्र का अर्थ ही क्या है वो समझ में नहीं आता तो सर्वव्यापक परमेश्वर ओमकार वो मेरे हृदय में है वही मैं हूं मुझसे भिन्न नहीं वो मेरे सारे विघ्नों को दूर करने वाला है यही तो मंत्र का अर्थ है तीन अंक का है जब इसी को हम भूल गए दीक्षा ली बहुत प्यार से शब्द धारण किया। एक प्रकार से वो दीक्षा के समय अहम पूर्वक

[1:18:34] जो बात ली जाती है उससे बढ़कर और क्या प्रतिज्ञा हो? तो हम यह शब्द भी जोड़ सकते हैं। दीक्षा के समय हमने प्रतिज्ञा करनी है कि मंत्र को कभी नहीं छोडूंगा। मंत्र को कभी नहीं भूलूंगा। और जैसे भी होगा सेवा करते हुए उपासना जाप करते हुए ध्यान करते हुए हैं। चलते फिरते अपने लक्ष्य को नहीं भूलूं। मंत्र के अर्थ को नहीं भूल। तो दशरथ ऐसा नहीं कर सकते थे। तो वहां पर थोड़ा सा प्रसंग और आता है। मन ही मन तो दशरथ जी चाहते हैं। मैं तो नहीं कह सकता कि दशरथ को यह राम जी में

[1:19:24] है। यह मुझे कैदी कर ले, यह कर ले, वह कर ले। तो राजा राम जी आप भी बन जाओ। लेकिन वहां पर एक प्रसंग आता है। राम जी के बारे में व्यास जी ने पिता माता के संबंध में पिता और पुत्र के संबंध में व्यास जी ने एक बात कही है कि उत्तम पुत्र तो वह होता है जो पिता के इशारे को समझकर बात करें। मध्यम पुत्र वह होता है

[1:20:11] जो पिता ने एक बार शब्द कह दी और उसको वह फटका तत्काल मान ले और उसे भी निचले दर्जे के पुत्र होते हैं तो बार-बार कहते रहेंगे पिता फिर बेमन से करेंगे और और भी निचले दर्जे के हो सकते हैं बार-बार पिता कह रहे हैं और हम बिल्कुल उल्टा ही चल चल रहे हैं। कहने पर भी उनका अहंकार इतना हम तो अपनी मर्जी करेंगे। है ना? वो पिता का पुत्र क्या है? यहां पर इस प्रसंग में पिता पुत्र की भी चर्चा गृहस्थ आश्रम में हो सकती है। लेकिन यह सही है। आजकल के समय में ना तो

[1:20:59] दशरथ जैसे पिता ना तो राम भरत शत्रुघ्न लक्ष्मण आदि के पुत्र जैसे हैं। वो बहुत विरले कई होंगे। तो पिता दोनों का लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति हो तो ऐसी गलत आज्ञा तो पिता कभी देंगे ही नहीं। माता कभी अपने पुत्रों को गलत रास्ते पर चलाएगी नहीं। लेकिन आजकल अपवाद बहुत ज्यादा है। तो पुत्र भी ऐसा हो तो सधर्म का पालन करें और पिता को भी सही रास्ते पर माता को भी सही रास्ते पर चलाने की प्रेरणा करें। यदि माता सतोगुणी है तो पुत्र पुत्री को सही रास्ते पर चलाने का रास्ता दे। गलत रास्ते

[1:21:47] पर नहीं चलाएं। तो इस प्रकार प्रसंग होते अब और थोड़ी सी प्रसंग अभी राम जी को वनवास की चर्चा का शुरू कर दे। अब वहां पर राम जी ने तो ऐसे कह दिया कि पिताजी ऐसे ऐसे है आपकी धर्म की रक्षा के लिए यहां भी है पिताजी दशरथ जी आपके धर्म की रक्षा के लिए मैं राजा नहीं बन आपकी प्रतिज्ञा पालन हो इसके लिए मैं राजा नहीं बन सकता हूं। आजकल पिता ने ऐसे कह दिया गलत काम करो। चलो कोई बात नहीं पिता कह रहे हैं तो कर ही लेंगे।

[1:22:32] अब पुत्र ने कह दिया गलत काम करो तो माता-पिता भी करना शुरू कर देंगे। यह बातें बिल्कुल अलग। तो यहां जो रामायण की शिक्षा है सत्य मार्ग पर ही। उसके बाद राम जी सबको पता लग गया। सारे नगर में एकदम आंधी की तरह खबर फैल गई। सारा अयोध्या नगरी शो काकुल हो गई और वहां पर अब दशरथ राम जी माता के पास गए माता भी बहुत व्याकुल हुई ऐसे ऐसे कि माता तो राम जी कहने लगे माता जी आप चाहते हैं मैं आपको साथ ले जाऊं अब आपका वृद्ध शरीर है लोग मुझे ही तंग करेंगे

[1:23:18] है ना माता को दुखी करने के लिए जंगलों में ले जा रहे हो तो माता कौशल्या समझ गई। उसके बाद लक्ष्मण जी आए कि भैया मैं भी आपके साथ ही चलूंगा। तो लक्ष्मण जी को भी राम जी ने बहुत समझाया। बहुत समझाया। कहते मैं तो आपका सेवक हूं। अनुचर हूं। आपसे बिन रह ही नहीं सकता। आप मेरे प्राण हैं। फिर भी चलो अपनी माता से पूछ लो। सुमित्रा मां के पास गए और डर भी रहे हैं। कहीं राम जी ने कह दिया मां से पूछ लो कहीं वह माता यह ना कह दे कि यहीं रहना लेकिन माता तो उसकी भी माता ही थी। बिल्कुल ठकती थी।

[1:24:06] तो माता ने कहा सुमित्रा ने कहा लक्ष्मण तुम्हारे माता-पिता तो राम और सीता है तुम उनकी सेवा करो जरूर जाओ उनको भी खुशी हुई और उसके बाद फिर वो सुमित्रा की भी कथा आती है। सुमित्रा कहती जैसे राम के साथ सीता जा रही है तो लक्ष्मण को आपके साथ मैं क्यों नहीं जा सकती? यह देखो उसमें कैसा परिवार था। एक कैकई को छोड़ दो थोड़ी समय के लिए वो भी। तो सुमित्रा को लक्ष्मण ने जवाब दिया मैं तुम्हारे पति

[1:24:54] के रूप में राम जी के साथ नहीं जा रहा। कोई सुमित्रा को लक्ष्मण जी ने लक्ष्मण जी को कहा सुमित्रा ने कि मैं तुम्हारे इसको उर्मिला नाम उसका उर्मिला था उनका पति का मैं उर्मिला तुम्हारे पति के रूप में राम जी के साथ नहीं मैं तो सेवक बन के रहा हूं। मैं वहां पर सेवा करूंगा। तुम यहां रहकर माताओं की सेवा करनी, सबकी सेवा करनी। जिस धर्म का

[1:25:39] मैं पालन करूंगा, उसी धर्म का पत्नी भी पालन करें। यही धर्म कहता है। तो सुमित्रा भी वहां पर रह गई। अब बात आ जाती है सीता की। सीता जो कभी नंगे पांव मखमलों पर ही चलती थी। कभी कुछ ऐसे कहते पंखा तक जलने की उनको आज्ञा नहीं थी। सारे सेवक सारे माताएं भी करती थी। तो किसी सुख में सुखों में ऐश्वर्यों में पली हुई सीता माता जब वो कहती है मैं आपके पीछे कैसे रह सकती हूं। तो राम जी ने उनको मना तो नहीं किया कि आप नहीं जाओ। राम जी एक ही बात कहते रहे

[1:26:28] कि वहां पर कष्टों के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। शेर चीते ही मिलेंगे। सांप भी मिलेंगे। कांटे भी रास्ते पर चलेंगे। फर्शों पर धरती पर सोना पड़ेगा। खाना पीना कुछ मिलेगा नहीं। कंद मूल फल मिल गए। नहीं मिले तो भी इस प्रकार से बहुत कुछ समझाया। यह नहीं कहा कि नहीं जाओ। कष्टों का वर्णन किया। जंगल में बहुत कष्ट सहने पड़ेंगे। लेकिन सीता का तो एक ही उत्तर है। सारे प्रश्नों सारे उत्तरों का एक ही उत्तर है कि मैं तो आपके बगैर रह ही नहीं सकती। राम क्या उसके बगैर रह सकते थे?

[1:27:15] पति पत्नी का यह धर्म। यहां पर हम कहेंगे पति पत्नी का क्या धर्म है? दुनिया में बहुत से दर्जे हैं। रिश्ते हैं। पति पत्नी का रिश्ता सबसे बड़ा। पति पत्नी का रिश्ता इतना बड़ा है। इसी वास्ते कई जगह तो पति को ही गुरु माना गया है और कई जगह स्त्री को भी गुरु माना चीखी चुड़ाला में चुड़ाला ही गुरु बनी तो कौन गुरु मैं गुरु पति गुरु और पत्नी चेली ऐसा नहीं है जो भी अग्रणी हो जो भी

[1:28:00] परमार्थ पथ पर अग्रसर हो वो दूसरे पति को अपने पीछे भी रहकर सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा दे चलाए आगे से आगे तो यहां कहते हैं मैं तो आपकी अर्धांगिनी हूं। मैं आपके बगैर रह ही नहीं सकती। राम जी ने भी हां कर। इसके बाद आगे के प्रसंग आते ही हैं। धीरे धीरे धीरे धीरे रामायण कथा आगे चलती है। इसके साथ ही साथ साधुओं के मार्गदर्शन का पथ भी आगे चलता है। इसकी चर्चा फिर समय हुआ तो कल देखा जाएगा।

[1:51:40] अभी आंखें बंद रखें शरीर बिल्कुल ढीला छोड़े। ऐसी भी स्थिति बैठ जाए। आराम से बैठ जाए। बिल्कुल रिलैक्स होकर ढीले होकर आंखें बंद करें। और बंद आंखों के द्वारा मनस के साथ जुड़े। भाव से जुड़े और अपने शरीर को देखें। मन ही मन अपने शरीर का अनुभव करें। फूल आकार तो नहीं दिखाई देगा लेकिन शरीर का जो सूक्ष्म आकार है मन भी सूक्ष्म है। ऐसे सूक्ष्म अपने शरीर के

[1:52:28] आकार का उसको अनुभव करें। यह मेरा मस्तक है। यह मेरी दोनों आंखें, मुंह, नाक, गला, कंधे, हाथ, छाती, पेट, जंघा, घुटने, पैर। आप सबको एक बार ही सारे अपने शरीर को देख। मन ही मन देखें और अंदर चलते हुए श्वास की धारा का अनुभव करें। शस एक शक्ति है। धारणा तो कर ही सकते हैं। मस्तक से ऊपर और कंठ से नीचे तक ये प्राणों की धारा बह रही है। मन ही मन

[1:53:15] ये कल्पना ही कर लें। अनुभव करें और श्वास श्वास अपने शब्द का उच्चारण नहीं करना है। मन ही मन सुनते चले जाना है। जीवा नहीं हिले, होठ नहीं हिले, गला नहीं हिले, कोई शरीर ना हिले, बिल्कुल शव की तरह। जैसे शव होता है। सचमुच ये प्राण चल रहे हैं। बस इतना ही है। मन शब्द में बन रहा है। बस इतना ही है। और बाहर कोई गति नहीं। बाहर कुछ है ही

[1:54:02] नहीं। मन भागे बाहर की ओर। एकदम उसको अंदर ले आए। मन लोचे गुरुया मन लोचे बुराइया गुरु शब्द मन हो मन में कोई ना आदम फुना आ भी जाए एकदम गुरु शब्द बार-बार शब्द का एक एक अक्षर सुनते चले एक एक अक्षर पूरे मन से सुनते चले जाएं। सारे अक्षर मन ही मन सुने। मन ही मन उच्चारण करें और शरीर का कोई अंग हिले नहीं।

[1:54:48] मुर्दा कौन सा हिलता है? शव कहां हिलता है? यदि शरीर शव रूपी आसन बनाएं। शरीर को शव बनाकर अपने शरीर को ही आसन बना लें। आगे पीछे ऊपर नीचे आम आसन तो नीचे लिपटाए जाते हैं और यह आसन नीचे भी है ऊपर भी है दाएं बाएं भी है शरीर को ही आसन बना लें शव बन जाए और इस आसन के अंदर बैठकर इस शरीर रूपी शव आसन के अंदर प्रवेश करके

[1:55:34] नाम को सुनते चले जाए। नाम को सुनते चैतन्य आसन है। बाहर के जितने आसन है वह तो जड़ है। हिलते जुलते नहीं है और धरा पर ही सिमटे रहते हैं। यह शरीर रूपी आसन है। एक प्रकार से चैतन्य ही है। और नीचे ऊपर दाएं बाएं सब जगह फैला हुआ है। यह शरीर रूपी आसन के अंदर प्रवेश कर जाए। जैसे माता शक्ति नवरात्रों में है। शिव के ऊपर पांव रखकर खड़ी है। काली तारा

[1:56:20] यह देवी शक्तियां और फिर थोड़सी ब्रह्मानंद के अखंड सिंहासन पर विराम लेकिन पहले शरीर को तो शवासन बनाए।

[1:57:11] बस शब्द को सुनते सुनते जाना है केवल सुनिए मन ही मन उच्चारण मन ही मन सुनिए मेरे आसपास जितने शरीर बैठे हैं वह मेरे

[1:57:58] ही शरीर और ज्यादा समय नहीं 1 मिनट का समय पूरी शक्ति लगा के शस सहज भाव से रोक सकते हैं। सारे शरीर में भरकर शक रुक जाएगा। शस रुक जाए चाहे शब्द भी शून्य में लीन हो

[1:58:44] जाए शब्द भी परा शब्द में लीन हो जाए बिल्कुल शून्य ना श्वास है ना शब्द मैं व्यापक तत्व

[2:00:07] अब धीरे-धीरे आंखें खोल लें। आंखों को थोड़ा मल लें। आराम से आंखों के कोने हैं थोड़ा उनको मलें। दबाते हुए ये जो कोने हैं सिरे हैं थोड़ा सा दबाएं अंदर की। और पूरी आंखें अंदर की ओर बंद आकर बाहर की ओर खुली हुई और धीरे-धीरे सारी आंख खोल दे।

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