Spoken discourse excerpts (Hindi). Sung hymns, repetitive chanting, and standalone devotional recitation have been omitted. Verses quoted within the teaching and spoken meditation instructions are retained. These excerpts are based on automatically generated captions and have not been checked against the audio; recognition errors may remain.
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[22:38] यह रोज एक दो चौपाई के बारे में बोलते हैं। यहां पर है भूत पिशाच निकट नहीं आवे। महावीर जब नाम सुना। संकट कटे मिटे सब पीरा। जो सिमिलर हत बलरा। यहां पर हनुमान जी का शब्द लिया गया है तो वह तो भगवान से जुड़े हुए हैं। तो इसके स्थान पर कोई भी नाम ले सकते हैं। वाहेगुरु का नाम ले ले अकाल पुरुष का नाम ले ले राम का नाम ले ले भवानी का नाम ले ले राधे कृष्ण का नाम ले ले ये हम पर
[23:27] निर्भर करता है। जा की रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तने तैसी ये शब्दों का चक्र नहीं है हा न मा ऐसे नहीं है रा धा ऐसा नहीं है तो इसका जो अर्थ क्या है उसकी महत्ता है उसकी विशेषता है अब देखिए आजकल क्या होता है हमारे पास भी बल्कि आश्रम में या यहां भी बहुत लोग आते हैं हमारे शरीर में यह कष्ट है हमारे परिवार में यह कष्ट यह काम नहीं हो रहा, वह काम नहीं हो रहा। पता नहीं किसी ने जादू टूना कर दिया है। जब काम नहीं होता तो यही भ्रम होता है। जादू टूना कर दिया ना हो किसी ने।
[24:13] ठीक है ना? तो यहां हमारा एक ही उत्तर होता था नाम जपो। सर्व रोग की औकद नाम। गुरु वाणी में कहा ही गया है सारे रोगों की औषधि नाम है। कोई भी कार्य करना चाहते हो उसमें सफलता चाहते हो तो भगवान के नाम का आश्रय लो। भगवान का नाम और यह जो आश्रय लेना है भगवान का तो इसका फल क्या होगा? हमारी समस्या बड़ी उल्टी जैसी है। जबरदस्त जैसी है। बस हम तो आपके शरण में आ गए। अब
[24:58] आप ही हमारा काम कर दो। है ना? ऐसे तो संभव नहीं होता है। और गलत काम के लिए भी आप ही हमारा काम करो। उसने मुझके यह अपमान किया, गाली दी, मेरा ऐसा कर दिया तो आप ठीक करो। तो ऐसे कैसे संभव हो सकता है? भगवान के लिए तो सभी एक जैसे हैं। तो नाम जप से होता क्या है? नाम का जप करेंगे। भगवान की शरण में जाएंगे तो अंदर शक्ति का जागरण होगा। चतुर विधा भजंते माम जना परपासिता।
[25:44] ऐसा कुछ श्लोक आता है आरतो जिज्ञासु सारथी ज्ञानी भरतश चार प्रकार के भक्त पहले भगवान के भक्त बन जाओ नाम का सहारा लेकर कैसे भी हो भगवान के भक्त बन जाओ और भक्त बनकर प्रभु के चरणों में उनकी शक्ति से कार्य करो और फिर करो प्रार्थना कर सकते हो कि हमारा काम भी हो जाए कोई हानि नहीं लेकिन वो प्रार्थना करने का तरीका यह नहीं कि मेरा काम आप कर दो। मेरा काम होना ही चाहिए। ऐसा नहीं है। तो ऐसी प्रार्थना करें। हमारी तो अर्जी है। आगे मर्जी आपकी है।
[26:31] अर्जी रख दीजिएगा। सकाम काम काम है। उसके लिए भी अर्जी रख दीजिएगा। लेकिन भगवान को हुकुम थोड़ी देने की बात होती है। हमारी अर्जी है। आगे जैसे आपको ठीक लगे तो वह ऐसा कर दीजिएगा। अर्जी रखने का एक और तरीका भी है। वो थोड़ा खास है। विशेष है। अर्जी जब रखते हैं कि हमारा यह काम हो जाए तो साथ में मेरे पड़ोसी का भी काम हो जाए। मेरा जो मित्र है उसका भी काम हो जाए या जिससे मेरी बनती नहीं है यदि उसके लिए भी प्रार्थना
[27:17] कर ले तो तो बहुत चेतना अंदर चली जाएगी है ना इस प्रकार से भगवान के चरणों में अपनी प्रार्थना जरूर रखें तो भगवान हमारे लिए वही करेगा जो हमारे लिए सही होगा हमारे कल्याण का होगा धन देकर यदि कोई भगवान की ओर से मिला है तो हम आगे बढ़ सकेंगे रास्ते में और जिसके अंदर बहुत गहरे साधना के संस्कार हैं तो धन छीनकर भी उसका और ज्यादा कल्याण होगा और ज्यादा वैराग्य पैदा होगा तो प्रार्थना करनी नहीं आती हमें हम तो भगवान को भी हुकुम देते हैं मेरा ये हो
[28:06] रहा है मेरा आप करो। पहले भक्त तो बन जाओ। कभी भक्त भी भगवान को गुरु को कहता है कि मेरा कहना मानो। ये तो बिल्कुल गलत बात होती है। तो खैर यहां पर यह है पहले भक्त बनो। हनुमान जी के बनो, राम जी के बनो, भगवान के बनो, कमली वालों के, महाराज जी के बनो, भक्त बनो और फिर प्रार्थना करो कि हमारी अर्जी है। आगे आपकी मर्जी है। मेरा काम होने में भला है तो वह कर दो। साधना में कतर की रुकावट है। नहीं तो कुछ और कर दो। समझ में आती है नहीं बात?
[28:51] तो अहम को छोड़े बगैर भगवान से कैसे जुड़ेंगे? मेरा काम करो। अह मम इससे तो मुक्त ही होना पड़ेगा भाई। तभी भगवान की शक्ति होगी। और कुछ लोग हैं भगवान का नाम भी नहीं जपते। कुछ नहीं करते। काम तो उनके भी होते ही हैं। यदि वह सरलता से, सच्चाई से, दृढ़ता से आगे बढ़ते चले जाए तो आगे और बढ़ने का रास्ता भी खुलता चला जाएगा। खैर इस पर ज्यादा चर्चा नहीं करेंगे और आगे की जो रामायण की कथा के आधार पर रामायण का आश्रय ले रहे हैं हम रामचरितमानस का वाल्मीकि रामायण का व्यास
[29:38] जी की रामायण का सभी को कई जगह मिला भी लेते हैं और उसके आधार पर हम यह देखते हैं कोशिश करते हैं अब भी राम है। मेरे हृदय में है। अब भी राम का परिवार है। मेरा परिवार है। यहां सत्संग मंडल वो भगवान का ही तो परिवार है। यदि यह धारणा हो जाए तो अंदर का रास्ता मिलेगा। बाहर का भी हो सकता है। खुलेगा ही खुलेगा। इसमें कोई शक नहीं है। हां ये कहते हैं कि हमने कहा हो सकता है बाहर का भी खुले। हम निश्चित ही खुलेगा। लेकिन कैसे खुलेगा वह भगवान पर छोड़ दीजिएगा।
[30:24] तो रामायण की चर्चा शुरू करते हैं। पहले गुरु वंदना।
[31:09] रामायण का प्रसंग कहां तक हो चुका था? सीता राम लक्ष्मण माता-पिता की आज्ञा से और सभी से आज्ञा लेकर जंगलों की ओर चल पड़े हैं। राम, लक्ष्मण, सीता और राम जी दशरथ जी ने कहा दशरथ रथ पर बैठाकर इनको ले जाओ। उन्होंने प्रार्थना की और खूब इधर-उधर जंगलों में घुमाओ। हो सकता है सीता जी सुकुमारी हैं। हो सकता है उनका मन वहां पर ना लगे। तो प्यार से उनको वापस ले आना।
[31:54] तो खैर सभी आगे बढ़े केवट के पास पहुंच गए। किस प्रकार से एक युक्ति के द्वारा उन्होंने अयोध्या वासियों को अयोध्या नगरी में भेज दिया। रास्ता ऐसा दिखाया उनको और वो केवट गंगा किनारे उसकी कॉलोनी थी। मतलब छोटा सा नगर कह दे, बड़ा गांव कह दे जहां सारे केवट वासी रहते थे। तो राम लक्ष्मण सीता के चरणों में प्रणाम किया। उसने बहुत भक्त था। कहते महाराज जंगल में कोई बात नहीं हमारे घर है वहीं आ जाइए। वहीं निवास करिएगा रात को। तो राम जी ने
[32:43] कहा भी हमें तो जंगलों में वनों में निवास करने की आज्ञा मिली है। घरों में नहीं जाना। हम घर नहीं जा सकते हमें। आज्ञाबद्ध है। अब अपने क्या करते हैं? जंगलों में जाते हैं, तीर्थों में जाते हैं, इधर जाते हैं और जहां बड़ा होटल बड़ा सा बढ़िया होटल बुक करते हैं। आराम से रहेंगे और खाने पीने की ऐसी बढ़िया व्यवस्था करते हैं और तीर्थ यात्रा कर रहे हैं। जंगलों की यात्रा भी तो एक प्रकार से तीर्थों की ही यात्रा है। हम देखते हैं सच में तीर्थ यात्रा करते हैं कि नहीं। पुराने समयों में तो पैदल ही तीर्थों की
[33:29] यात्रा होती थी। आप गाड़ियां मोटे चल नहीं सकते तो कोई हानि नहीं। लेकिन वहां जाकर शरीर के अनुकूल भोजन भी ले लीजिएगा। जरूरी नहीं कि स्वादिष्ट यही खाना है। यही खाना है। यदि शरीर की आवश्यकता हो। शरीर की आवश्यकता आवश्यकता के अनुसार किसी घर में भी रह ले लेकिन और मुख्य रूप से क्या करें? सत्संग सुने। तीर्थ यात्रा का तो अभिप्राय यही है। महापुरुषों की खोज ढूंढढूंढ करे। ये महापुरुष हैं। पूछे यहां के बड़े-बड़े महात्मा इस तीर्थ में कौन है? उनके दर्शन करें। उनकी सेवा करें। सत्संग सुने। तब तो
[34:17] तीर्थ यात्रा होगी ना और यहां पर राम जी वही कर रहे हैं। मुख्य प्रयोजन तो था रावण आदि निशाचरों का वध करना। सीधे जाकर लंकापुरी में डेर डाल देते। रावण वध का संहार का असरों का संहार करना शुरू कर देते। लेकिन वह संतों की कुटियाओं में, आश्रमों में भी जा रहे हैं। वहीं से उन्होंने अपने वनवास की यात्रा शुरू की। तो यह प्रसंग आ ही चुका है। गंगा पार करके वो आगे चले गए। निषाद को वापस भेज दिया कि अब आप जाइएगा हम आगे जाएंगे। तो सबसे पहले कहां पर गए?
[35:06] भारद्वाज मुनि के आश्रम में ऐसे नहीं कि हम आ रहे हैं। पहले उन्होंने संदेशा भिजवाया उनके शिष्यों को कहा कि राम मैं और सीता लक्ष्मण के साथ भरद्वाज जी के दर्शन करना चाहते हैं। भरद्वाज जी को पता लगा। वो तो पूरे भक्त थे, ज्ञानी थे, महापुरुष थे। उनको तो सारा एक प्रकार से अंदर से पता ही है कहां हो रहा है। तो वहां पर वह बड़े प्यार से उनसे मिले। बाहर तक आए और और राम जी की अच्छी प्रकार से पूजा पाद अर्घ करके वह भी किया नमस्कार किया और राम जी ने भी उनको दंडवत प्रणाम किया।
[35:52] तो इस प्रकार भरत जी के संग रहे और भारद्वाज जी के संग रहे। हरि चर्चा हुई, सत्संग की चर्चा हुई। भारद्वाज जी तो जानते ही थे यह अवतारी भविष्य। प्रभु आपने कृपा करके मेरी कुटिया में आए। मुझे दर्शन दिया। मैं बड़ा धन्य भाग हूं। और सत्संग आदि होता रहा। फिर वह भरत जी राम जी कहते यहां से अब आगे चलते हैं तो कोई रास्ता तो अपने शिष्यों को भेज दिया आगे और यमुना आदि पार करके और जगह गए जाते रहे
[36:42] वाल्मीकि जी का आश्रम आ गया वाल्मीकि ने तो आधी रामायण तो उन्होंने ही लिखी है। वह तो राम कथा जानते ही हैं। तो वाल्मीकि जी के आश्रम गए। उन्होंने बहुत सत्कार से, प्यार से, आदर से उनको अपने पास बुलाया, बैठाया और फिर वह अपनी कहानी सुनाने लग पड़े कि अब तो आपकी कृपा हो गई है। मेरा यह स्थिति बन गई है। महर्षि पद महर्षि वाल्मीकि लेकिन पहले समय की बात है मेरा कुछ तो अच्छे घराने में हुआ।
[37:28] मेरा संग शूद्रों के साथ हो गया। उनके साथ ही रहता था। उसी के साथ उसी के कुल में उनका विवाह भी हुआ और खूब बच्चे हुए और जैसा संग वैसा रंग चढ़ गया। हाथ में सदा धनुष बाण लिए ही जंगलों में विचरण करते थे। कोई भी यात्री आए उसे वह धन छीन लेते थे। डराधमका कर। इस प्रकार से बहुत साल बीत गए। और एक समय कोई पूर्व पुण्य कर्म फल उसके अनुसार सत ऋषि आ गए वहां पर और ये
[38:16] कहता है बहुत ये तो चमकीले चेहरे वाले हैं। बड़े तेजस्वी लगते हैं। वस्त्र भी बहुत ऐसे पहन रखे हैं जैसे ऐसे वस्त्र तो कहीं मिलेंगे ही नहीं। वो तो अलौकिक वस्त्र थे। तो वहां पर कहते हैं ठहरो आप तो सप्त ऋषि ठहर गए जो कुछ आपके पास धन मान है और जो वस्त्र आदि है वो मुझे दे दो कहते दे देंगे कोई बात नहीं पहले हमारी एक बात तो सुन लो अब राज्षियों ने कोई नया नाह नहीं की कोई डरे नहीं कोई भागे नहीं और सब कुछ हांजी हां जी कर रहे हैं तो सप्तर्षि एक नारद ऋषि बीच में आकर कहते
[39:04] हैं कि एक बात हमारी मानोगे। कहते हां मानोगे बाकी सब कुछ मुझे लेना है। तो कहते जाओ अपने परिवार में जाओ अपनी पत्नी के पास अपने बच्चों के पास रिश्तेदारों के पास क्योंकि वहां पर बाद में नाम वाल्मीकि पड़ा और जो ऐसे थे उनका ही रोप चलता था। मुखिया थे। जाकर उनसे पूछो कि यह जो इस प्रकार राहगीरों से धन छीनकर ऐसेसे डरा धबका कर आप जो पैसे इकट्ठे करते
[39:49] हो और साधन इकट्ठे करते हो। है ना? तो मैं तो गलत तरीके से करता हूं। इतना तो समझ में आ गया। लूटमार करता हूं। वाल्मीकि को यह समझ में आ गया। क्या इसका फल भी आप भोगोगे? इतना पूछ लेना। तो वाल्मीकि जी गए वाल्मीकि नाम बाद में पढ़ा तो नाम ऐसा ले रहे हैं। तो परिवार वाले इकट्ठे क्या लाए? अभी क्या लाए? कहते अभी मैं कुछ नहीं लाया हूं। मेरा एक प्रश्न है कि इस प्रकार आपको भी पता है मैं हिंसा करे करता करता हूं लूट मार करता हूं ऐसे करता हूं
[40:35] उसका फल भी आप लोगोगे कहते हमें तो धन चाहिए आपका धर्म है हमारी पालना करो कैसे भी करो लूट मार करके करो चाहे लूटपाट करके करो चाहे कैसे भी करो हमें तो धन चाहिए हम धन में हिस्सा बटाएंगे आपके गलत कामों में नहीं वो आपकी जिम्मेवारी आप कर रहे हो महापुरुषों का दर्शन हुआ था पुराने संस्कार जागे थे वाल्मीकि जी को एकदम होश आई अरे ये क्या कर रहा हूं मैं इन लोगों के लिए मैं उल्टे काम कर रहा हूं और वो मेरे से साथ तो देंगे नहीं कभी भी तो वो
[41:20] वो आ गए ऋषियों के पास तो उन्होंने कहा जी वो तो मेरा साथ छोड़ गए हैं। मैं उनके साथ जरूर रहा वो तो मेरे साथ कभी थे ही नहीं। ना है वो तो स्पष्ट बात हो गई है। का रहस्य कल भी चर्चा हुई थी। वो समझ लेना है। तुलसीदास जी ने लिखा उल्टा नाम जपत जग जाना। बाल्मीकि भय ब्रह्म समाना नाम में कोई उल्टा सीधा होता ही नहीं। गुरु मंत्र में कोई उल्टा सीधा होता ही नहीं है। अब देखिए जैसे आप मरा शब्द का उच्चारण करें। तरीका बता
[42:07] दिया। आपने मरा शब्द का उच्चारण ऐसे करना है। कैसे करना है? मा रा मा रा ऐसे नहीं मरम ऐसे करते ऐसे नहीं करना है युक्ति बता दी गंभीर युक्ति जिसकी चर्चा हमने कल की ही थी मां रुको क्षण भर के लिए मा रा मा रा मा राम हो गया महारा ही हो गए। है ना? मंत्र में यह होता है कहां से वर्ण आ रहा है। मा फिर शांत हो जाइएगा और वहां
[42:55] से फिर अगला वर्ण का उच्चारण करो। रा और वहां से अगला उच्चारण मा फिर मा के साथ अगला शांत करके रा मरा राम में कोई फर्क नहीं रहा। मरा भी ठीक है। अहंकार का मरण और राम जो सर्वव्यापी है उसकी जागृति तो जो अपने गुरु मंत्र में कहा जाता है उसकी भी विधि यही है। बार-बार कहते हैं जिस समझ में आ जाए तो उसकी ज्यादा चर्चा ना कहते हुए
[43:40] जिनको यह पूरी बात स्पष्ट नहीं है वह अलग से पूछ सकते हैं। तो इस प्रकार से वो जाप चलना शुरू हो गया। मंत्र जाप शुरू हो गया। तो सप्त ऋषि कहने लगे अब यही बैठे रहना है। छोड़कर जाना नहीं है कहीं। जब हम आएंगे तभी उठना। तो ठीक है जी। जब अंदर चेतना जा ही रही है। गुरु की आज्ञा का पालन हो गया है। आज्ञा पालन से अहंकार खत्म होता है। और जब अहंकार खत्म निर्मूल होना शुरू हो गया है तो कर रहे हैं जाप। और सप्त ऋषि चले गए। वो तो जानते थे ये
[44:27] असल में कौन है? ये जो इस प्रकार जाप कर रहे हैं। इनकी तो बहुत बड़ी स्थिति होनी है। बीज रूप में जानते ही थे। और वो कहते हैं कई युगों के बाद आए सप्तऋषि लिखा हुआ ऐसा है यह कह सकते हैं जल्दी नहीं आए सुबह गए अब के बाद आ गए 10 दिन के बाद नहीं वो जहां चल ही रहा है और वो दिव्य दृष्टि से देख रहे हैं ऋषि इनकी स्थिति कैसी बन रही है हम यहां पर कहे हम सेवा को जोड़ देते हैं तो वाल्मीकि जी ने उल्टे कर्म किए उसको भी उन्होंने सेवा का फल जो है वह प्राप्त हो गया।
[45:13] ऋषियों के संग में वैराग्य पैदा हो गया। सेवा के द्वारा भी तो वैराग्य ही पैदा होना है। मेरा तेरा ही तो खत्म करना होता है। है ना? और ऋषियों की कृपा से जो अपने पत्नी आदि और आदि आदि गलत काम करते थे। उनसे वैराग्य पैदा गलत काम से वैराग्य पैदा हो गया ना कि उनको धक्का दे दिया बाहर तो इस प्रकार साधना करतेकरते युग बीत गए मतलब एक पूर्ण संख्या और उनके शरीर पर मिट्टी चढ़ गई बलमीक होती है ना जैसे मिट्टी का आवरण उसके शरीर पर
[45:59] और शरीर में क्या हो रहा है उनके स्थूल सूक्ष्म कारण सभी शरीरों में मन में प्राणों में है ना मंत्र की गूंजे लहरा रही हैं। शक्तिशाली तरंगे उठ रही हैं। ये कुंडली शक्ति आदि जागृत ये सब कुछ अपने आप हो रहा है। वर्तमान समय में यदि ऐसा करना कठिन है तो सेवा और सिमरन दोनों करते चले जाए। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। परिवार की भी सेवा करें, मालिक बनकर नहीं करें और सिमरन भी करें भगवान की शरण होकर, गुरु आज्ञा होकर, गुरु की शरण होकर, गुरु मंत्र
[46:47] का। तो इस प्रकार करते करते बलमीक शरीर पर जम गई। हां, वो शरीर सत्ययुगी थे। यह भी हम कह सकते हैं। आजकल ऐसा गंभीर साधना करना मुश्किल है। हम कहेंगे क्योंकि कलयुगी शरीर है। अस्थि मांस ये सारे हैं। इसमें मल ये जो पृथ्वी जल और जल तत्व की औरत वर्तमान शरीरों में प्रधानता है। तो नकल तो किसी रास्ते में हो नहीं सकती। जैसा मार्गदर्शक बताएं वैसी साधना करते चले जाए। और जब सप्त ऋषि आए उन्होंने
[47:32] आवाज दी और वेदम उठ खड़े और मिट्टी सारी झड़ गई। उनके चेहरे में शरीर में दिव्यता का प्रकाश फैला हुआ है। वो वाल्मीकि ऋषि बने। और आदि रामायण सबसे पहले उन्होंने ही लिखी। रामायण ही नहीं कोई भी काव्य कोई भी ग्रंथ आदि ग्रंथ वो वाल्मीकि जी का पहला ग्रंथ है। वेद उपनिषद तो सनातन है। कहते वेद बाद में लिखे गए नहीं वेद तो सनातन है। युगों युगों से वो वेदों की रचना में कोई फर्क नहीं पड़ता है।
[48:20] कल्प हो जाएगा, संहार हो जाएगा, लेकिन वेदों का नाश नहीं होता है। भगवान का नाश नहीं। भगवान के मुख से ही तो वेद प्रादुर्भूत हुए हैं। और फिर आगे वही वेद वही चंद ताल आदि स्वर्ग आदि वो फिर अगले कल्प में अगले युग में वही वेद प्रकट होते हैं। भगवान करते हैं और पहला वेद की स्वर्ण कम होती है। है ना? पहले वेद ब्रह्मा जी को सुना है। गुरु वाणी में आता है। सबसे पहले वेदों का ज्ञान ब्रह्मा जी को दिया। भगवान ने दिया क्योंकि भगवान की वाणी है।
[49:07] उसके बाद परसों में चलते रहे चलते रहे। आजकल होती है जी। वेदों का जो प्रादर्भाव हुआ 500 5000 साल पहले यह साले वो प्रकट हुआ किसी के। वेद लेकिन वही है जो समय से चलते हैं। गुरु वाणी में वेदों की महिमा तो है। वेदा में नाम उत्तम सो सुने ही नहीं फरे जो बेतालिया वेदों में जो नाम उत्तम नाम है महावाक्य आदि उसको हम सुनते नहीं है और बेताल की तरह ताल चलने में गड़बड़ होती है। इधर उधर सारी इंद्रियां बिखरी रहती है। तो हां यह गुरु परंपरा से जैसा गुरु वाणी में तो सीधा श्वास श्वास जाप का ही महिमा
[49:53] है। तो यह जो ऋषियों ने किया, सन सुना ने किया, ध्रुव प्रहलाद ने किया, इधर इधर 84 सिद्धों ने किया। यही मंत्र है। हां, मंत्र मूल तो एक ही है लेकिन ऊपर के छिलके के आवरण में कहीं-कहीं कोई अक्षर थोड़ा बहुत आगे पीछे हैं। अलग से हो सकते हैं। तो अपनी परंपरा में जो मंत्र चल रहे हैं। अब उसकी बात तो करते ही करते हैं। और भी परंपराएं हैं श्वास श्वास जाप की। मुख्य श्वास श्वास और श्वास श्वास जाप जो मंत्र वैकरी शब्द है। उनके मूल में जो तत्व है वह सब जगह एक ही एक है। तो इस प्रकार वाल्मीकि का वर्णन आता है।
[50:40] अब तो वाल्मीकि के नाम पर अब तो नाम ही वाल्मीकि से पैदा हुए तो नाम ही वाल्मीकि वाल्मीकि मुनि वाल्मीकि ऋषि ऐसी उपाधि जुड़ गई। इस प्रकार राम जी फिर आगे चलते गए। आगे चलते हुए वह अत्री मुनि के आश्रम में गए। अत्री मुनि और उनकी पत्नी अनुसूया जहां भी वह रास्ते में आते हैं महापुरुषों के आश्रम तो वहां जाते हैं अत्री मुनि ने खूब वंदना की और कहती मेरी पत्नी जो अनुसूया है अब वृद्ध शरीर हो गया
[51:26] है आप अंदर बैठी है वो आप उनके पास भी चले जाओ तो सीता माता दी सारे गए सीता को तो मेरी मेरी बेटी आ गई है। अनुसूया ऋषि ने ऐसे माता ने कहा और उसको खूब क्योंकि वो राम लक्ष्मण ने तो बलकल वस्त्र धारण कर लिए थे। सीता के लिए कहा था कि आपने नहीं धारण करना। माता ने कह दिया था तो उनको रेशमी साड़ियां प्रदान किए अनुसूया ने इनकी पत्नी ने और खूब प्यार से भोजन कराया। सबको कराया और हरी चर्चा हुई। भगवान की चर्चा होती रही और फिर धीरे-धीरे यात्रा और आगे बढ़ती चली गई।
[52:13] ये यात्रा की चर्चा बाद में करेंगे। अभी अयोध्या की चर्चा कर ले। अयोध्या में सुमंत्र पहुंच गए राम जी को जंगलों में छोड़कर और उधर दशरथ जी के पास। ये कहते हैं आप अकेले ही आए हो राम जी कहां पर है तो सुमंत्र ने सब समझा दिया जैसेजैसे यह सीता माता ने विशेष रूप से निर्देश दिए थे लक्ष्मण ने कहा था विशेष रूप से सीता का था तो उनको कहा कि आप चिंता ना करें वो वहां पर बहुत खुश है यह जो वनवास वन है वह तो एक अल अलौकिक
[53:01] जहांजहां राम जाते हैं बिल्कुल एक नया दृश्य है। जहांजहां राम सीता लक्ष्मण जाते हैं बादल छाया करते हैं। पुष्पों की वर्षा वर्षा होती है। जब गर्मी होती थोड़ी-थोड़ी होती है। आगे आगे राम बीच में सीता पीछे लक्ष्मण। इस प्रकार यात्रा चल रही है। जैसे राम आगे हैं। बीच में माया शक्ति है और पीछे जीव रूपी लक्ष्मण है। और चलते कैसे हैं? राम जी के चिन्ह ही अलग थे। शंख चक्र गदापन उनके पैरों में छपे हुए थे। बिल्कुल प्रिंटेड थे। तो वहां पर जहां राम के चिन्ह पड़ते हैं। सीता तो अपनी मस्ती से चली जा रही है और
[53:46] लक्ष्मण जी कैसे यात्रा कर रहे हैं। जहांजहां राम के चिन्ह है वहां उस पर अपना पैर नहीं धरते। थोड़ा दाएं की ओर चलते हैं। अनुगमन कर रहे हैं। उनके पीछे चल रहे हैं। तो इस प्रकार यात्रा चल रही है। और खैर ये सुमित्र जी ने सारा थोड़ा देख लिया था, समझ लिया था। तो उन्होंने दशरथ जी को कहा वह आ नहीं सकते हैं। आपकी जो प्रतिज्ञा है सत्य प्रतिज्ञा है उसको वो पूरा करके ही रहेंगे। है ना? रघुकुल रीत सदा चल जाए। प्राण जाए पर वचन ना जाए।
[54:33] यह रीति उनकी है। सत्य इसकी चर्चा पहले भी कर चुके हैं। सत्य प्रतिज्ञा जो वचन कर दिया ऐसे है गलत वचन तो उनके मुख से निकलेगा ही नहीं। कमली वालों के बारे में भी कल चर्चा हुई थी कि जो कह दिया वो करके दिखाया चाहे दांत अपना निकलवा दिया। दूसरे ने मना कर यदि कर दिया। तो फिर यहां डेरे में भी कमली वालों ने परंपरा चलाई कि करो जो मैंने यह कहा है वह करना ही करना है। हर हालत में करना है। पूरा जोर लगाकर करना है। आगे हरी इच्छा ये जोड़ दीजिएगा। हो सकता है कोई परिस्थिति कोई कारण त भी कोई आदेश ऐसा विधान ऐसा हो
[55:18] जाए। हम ना कर सके लेकिन अपनी ओर से जो निर्णय कर लिया इस पथ पर चलना है उससे पीछे कभी नहीं हटना है आपके सत्य निष्ठ प्रतिज्ञा है ना आपको पाप ना लगे वचन भंग का पाप ना लगे तो राम जी नहीं आए हैं और ऐसा सुनते ही वचन भंग तो दशरथ भी नहीं करना चाहते थे। वो नहीं कहते थे कि मैं भजन भंग कर लूं। वो राम जी को कहते थे मुझे बांध लो ये कर लो आप राजा बन जाओ। मुझे खुशी होगी। लेकिन वचन भंग तो दशरथ भी नहीं करना चाहते थे।
[56:05] इस प्रकार जब उन्होंने सुना दशरथ ने कि राम नहीं आ रहे हैं। सारी रानियों ने भी सुना राम नहीं आ रहे हैं तो राम दशरथ जी की क्या हालत हुई? उनका वियोग सह नहीं सके। अब यह देख लीजिए बार-बार यह कह रहे हैं वियोग चाहे हो मरण जाए स्वीकार हो वचन भंग नहीं किया। राम राम कही राम कही राम राम कही राम तन पर हर रघुवीर विरह राव गयो सुरधाम। राम राम का अंदर बाहर से उच्चारण करते करते अपना शरीर छोड़कर वह सुरलोक में
[56:51] पहुंच गए और वहां पर उनकी स्थिति क्या बनी? इंद्र के सिंहासन पर विराजित हुए। जैसे इंद्र बैठे हैं उसी सिंहासन पर दशरथ जी को भी स्थान मिला है। सिंहासन को छोटा-मोटा तो नहीं। आधे आसन पर आप बैठ जाओ। आधे आसन पर आप बैठ जाओ। ऐसी कोई बात नहीं है। है ना? वो तो आसन ही दिव्य होते हैं। दशरथ जी राम जी के साथ ही ये ऐसे जो स्वर्ग के अधिष्ठाता देवता वैसा पद उनको प्राप्त हुआ। तो यह प्रसंग चलता गया और उधर
[57:39] भरत जी और शत्रुघ्न दूर गए हुए थे। यहां पर यह ना कहे कि राजतिलक में भरत शत्रुघ्न को क्यों नहीं बुलाया। वो तो समय ही ऐसा था। काल योग ही ऐसा था कि फटाफट एक दिन हुआ और निर्णय हो गया। कल राजतिलक देना है। यह विधि का विधान था। तो और दूसरी बात है भरत जी को शत्रुघ्न को बुलाए ना मिलाएं वह तो चाहते ही थे कि राम ही सिंहासन पर बैठेंगे हम उनकी सेवा करेंगे। उनकी ओर से कुछ शंका शिकायत कि हमसे पूछा नहीं हमें भी कोई अधिकार मिलना चाहिए। ये तो आजकल के कलयुगी जी भी करते
[58:24] हैं। वहां तो ऐसी संभावना ही नहीं वशिष्ठ जी भी जानते थे और दशरथ आदि सारी माताएं भी यह जानती ही थी। तो फटाफट राजतिलक की तैयारी हुई। लेकिन ईश्वर का विधान तो कुछ और ही था। देवताओं का जो वध का रावण का जो असुरों का संहार करने का जो मुख्य प्रयोजन खास प्रयोजन मुख्य तो नहीं कहेंगे। विशेष प्रयोजन था उसके तैयारी के लिए उसके करने के लिए उनका जंगलों में जाना जरूरी ही था और जब जहां गव हैं 14 साल बाद रावण का निधन नियत ही था एक प्रकार से वो तो राम
[59:09] का संकल्प ही था उन्होंने अभी ऋषि मुनियों के आश्रमों में जाना था इधर जाना था इधर जाना था तो इस प्रकार राम और भरत और लक्ष्मण शत्रुघ दशरथ जी का निधन हो चुका है। वो वहां पर अयोध्या पूरी में पहुंच गए। आते ही उनके अपशकुन होने शुरू हो गए। देखते हैं अपशकुन। अब यहां पर यह देख लीजिए अपशकुन क्या होते हैं? बाहर के चक्करों में नहीं पड़ना। बाहर ये हो रहा है। बाहर ये हो रहा है। बाहर जो रहा जो हमारे हृदय में उथल-पुथल मचती है।
[59:57] हमारे शरीर में प्राणों में हलचल पैदा होती है। है ना? वही बाहर दिखाई देती है। बाहर के अपशकुन कोई अपशकुन नहीं है। उसके चक्करों में नहीं पड़ना। जो हमारे मन में प्राणों में हलचल जो आगामी कोई विशेष घटना होने वाली होती है उसके कारण हमारी आंखों में कानों में ऐसे दाएं हाथ बाएं हाथ फड़कना शुरू जैसे हुआ तो इस प्रकार के अपशकन तो अंदर से ही होते हैं। कुछ होने वाला है ईश्वरी योजना के अनुसार ईश्वरी घटना के अनुसार चाहे कर्म कुछ भी करो वो होना ही है तो हमारे प्राणों में पहले ही हलचल होनी शुरू हो जाती है। देखते ही मन में आ जाता है ना कि यह बुरा
[1:00:43] हो जाएगा, यह हो जाएगा। जो होना होता है प्रारब्ध कर्मु। तो, फिर यहां पर कहते हैं बाहर का अपशुन हो गया, वह हो गया। ये बिल्ली काट गई, छिपकली काट गई। इसके चक्कर में नहीं पड़ने की जरूरत। बिल्ली तो हमारा मन ही बन जाता है। सिकुड़ा हुआ और भागता है डर डर के। वह अपशकुन होता है। तो इस प्रकार करते करते भरत लक्षण को शत्रुघ को अपशकुन होने कुछ कुछ समझ में नहीं आ रहा। कुछ बहुत अजीब सी बात होने वाली है। तो जब वो भरत शत्रुघ अयोध्या में पहुंचे देखते सब और सुनसान छाया हुआ है। शांति
[1:01:33] दुख भरी शांति तो ऐसी स्थिति में वो जो आगे मुखी थे सुमंत्र जी थे दशरथ तो थे नहीं माता कैकई के घर ले गए माता कई तो प्रसन्न हो गई भरत शत्रुघ्न को देखकर खूब प्यार से उसको को अपनी आलिंगन किया, गोद में बैठाया तो वो कैकई पूछती है मेरे माता-पिता भाई बंधु कैसे हैं? जहां से वो आए थे। तो भरत ने क्या प्रश्न किया?
[1:02:18] दशरथ पिता कहां है? वो तो सदा आपके पास ही रहते थे ज्यादा। वो मेरे पिता कहां पर है? तो कैकई कहते हैं वह तो भी जैसे सबका होता है बड़े आराम से उन्होंने शरीर छोड़ दिया। मुक्त हो गए वह तो सुरलोक में चले गए हैं। तो भरत जी फिर पूछने लगे आखरी समय उन्होंने क्या कहा था? बस यही कहते रहे हां राम हां सीते हां लक्ष्मण तो भरत जी कहते राम लक्ष्मण सीता वहां नहीं थे क्या नहीं उसकी तो चिंता ना करो तुम वह जंगलों में तप करने के लिए गए हैं। मैंने सब ठीक कर रखा है। तू चिंता ना कर।
[1:03:05] तो लक्ष्मण भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न वो तो व्याकुल हो गए। ये क्या हो रहा है? तो कैकई अपनी धुन में बातें करती चली जा रही है। अब तुम राजा बनोगे। दशरथ जी ने कहा है अब मेरे बाद आप राजा बनोगे। कहते वो भरत को मिलना चाहिए था। मैं तो कहता हूं मुझे तो राज्य का मतलब ही कोई नहीं। नहीं नहीं तू चिंता ना कर सब ठीक कर रखा है। मैंने सब योजना बना रखी है। तू चिंता ना कर। बार-बार वो ये कह रही है। फिर उसने कहा क्या कारण हो गया? राम लक्ष्मण सीता जंगलों में क्यों चले गए हैं? तो कहते ऐसे ऐसे मैंने वरदान दिए थे।
[1:03:52] युद्ध के समय में दशरथ जी ने मुझे दो वरदान दिए थे और मंथना दासी ने उसने बहुत समझदारी से काम किया। मुझे याद दिलाया तू अपने दो वरदान मांग ले। उसमें तेरा ही भला है सबसे ज्यादा। तेरे लिए राजतिलक और भरत जी के वनवास मांग लिया मैंने। तो दशरथ जी ने हां कर दी। अब तो राम जी बेहोश है। दशरथ जी भरत जी बेहोश जैसे हो गए। शत्रुघन भी आग बबूला हुए हैं। ये क्या हो रहा है? क्या हुआ है?
[1:04:38] अब यहां पर कहानी एक मोड़ लेती है। भरत जी को होश आया। कहते तू मेरी माता नहीं है। माता होकर ऐसा राक्षसी जैसा कर्म तूने किया है। इस प्रकार से खूब कठोर वाणी बनी। उधर मंथरा भी आ गई कि शायद हमारी बात बन रही होगी। मंथरा की टेढ़ी मंथरा थी। उस पर शत्रुघंज ने खूब लाटकाई। खूब झटका सो दिया। तो माहौल ऐसा बन गया। अब यहां पर विचार करिएगा। एक खास संदेश है।
[1:05:26] माता-पिता का मान सत्कार जरूर होना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं है। कल भी जो चर्चा हुई थी यदि माता ही गलत रास्ते पर चले। गलत रास्ता कौन है? भगवान के विरुद्ध जो रास्ता होता है और बच्चों को भी उस रास्ते पर चलने की मजबूर करे। आप भी इसी रास्ते पर चलो। है ना? हम कहते माता-पिता की हर आज्ञा पालन करनी चाहिए। हर आज्ञा पालन करने का संदेश कहीं भी नहीं है। किसी शास्त्र में नहीं है। यदि माता या पिता या संबंधी कोई भी
[1:06:16] साधना के विरुद्ध परमेश्वर प्राप्ति के विरुद्ध चलने की प्रेरणा दें, मजबूर करें। तो यहां तो यह कहा है उनको सही रास्ते पर चल चलने की प्रेरणा दें, शक्ति दे, विचार करें नहीं तो फिर उसका चाहे त्याग करना पड़े, त्याग बेशक कर दें लेकिन गलत रास्ते पर नहीं चलना है। इसी प्रकार उल्टा भी कह सकते हैं। यदि बच्चा सतोगुणी है संस्कारी है वो भी माता-पिता को परमार्थ के पथ पर चलाने की ही प्रेरणा दे रास्ता दे यदि बच्चा उल्टा के रास्ते
[1:07:02] पर चले है ना तो यहां तो जैसे भरत जी ने कहा माता का बच्चे का सबका त्याग कर दिया बच्चे का त्याग कर सकते हैं तो करें लेकिन उसके पीछे कभी ना लगे लगे तो रास्ता सही कौन सा है? सिर्फ एक ही रास्ता है। परमात्मा की प्राप्ति का रास्ता। यहां बहुत बड़ा संदेश जाता है। यदि वो परमात्मा की प्राप्ति के रास्ते पर चलते हैं। आप कल भी कह रहे थे पति पत्नी तो दोनों मिलकर चलते हैं। हमारे पास कोई देवी आई थी। नहीं जी अपने तो सब मिलजुलकर चलते हैं। हमने कहा पता है कैसे? दुनिया के धन मान मोह में फंसे हुए हैं। कभी पत्नी कहती
[1:07:49] है ऐसे कर लो काम करना तो पति उसके पीछे है। और यदि पति कहता है ऐसे व्यापार करना है। ऐसे कामकाज करना है तो पत्नी उसके पीछे चल चल दोनों मिलकर रहते हैं। यह मिलकर रहना नहीं हुआ है। लक्ष्य ही उल्टा है। लक्ष्य ही गलत है। तो लक्ष्य एक ही है जिसमें पति पत्नी दोनों मिलकर चल सकते हैं। वह है परमानंद की प्राप्ति। इसी के लिए तो भगवान बार-बार जन्म देते 84 लाख योनियों से एक बार प्राप्ति नहीं होती। अगले जन्म में और नहीं तो अगले जन्म में बार-बार उसको यह
[1:08:35] जन्म मरण के चक्कर में चलता ही रहेगा। कभी मुक्ति नहीं हो सकी। हमारे इस पर कई आते हैं विवाह करने। बहुत बढ़िया है। गृहस्थ एक आश्रम है। कलयुग में दो ही आश्रम प्रसिद्ध है। एक गृहस्थ आश्रम और दूसरा है सन्यास आश्रम। यदि सन्यासी भी केवल भगवा वस्त्र पहन लिया और डेरों पर आश्रमों पर कब्जा करने की वो सन्यासी नहीं है। और यदि स्त्री पुरुष ने विवाह भी कर लिया और लक्ष्य क्या है? धन मान आदि आदि विषयों की प्राप्ति जो नश्वर पदार्थ है वो गृहस्ती तो है गस्थ आश्रम में नहीं बना है
[1:09:25] तो यहां गस्थ आश्रम यदि हो तो वो आश्रम धारी हो जाए नहीं तो सीधा सीधा गृहस्थ ही है सीधा साधा सन्यास भगवान पहनने से कोई सन्यास नहीं विवाह करने से ही कोई गृहस्थ आश्रमी नहीं बन सकता है तो यहां पर भरत जी ने और आदि आदि सब ने यही संदेश दिया है। यदि मिलकर हां कह भी कह रहे हैं यदि पति का पथ आगे है थोड़ा सा पीछे हटे पत्नी को भी साथ ले बच्चों को भी साथ ले यदि पत्नी की साधना पथ आगे बढ़ा हुआ है थोड़ा पीछे हटे नित्य कर्म आदि कोई हानि नहीं हो तो पति को भी साथ ले बच्चों को भी अपने साथ चलाए और यदि ऐसा नहीं होता है तो इसका मतलब
[1:10:11] सिर्फ एक ही है परमात्मा का नाम जितना में मर्जी ले ले भगवान का नाम जितना मर्जी ले ले हम कुछ नहीं जानते हैं। भगवान की ना प्राप्ति की इच्छा है ना यह इच्छा ही है। लक्ष्य हमारा बाहर का ही है। और फिर भी यदि हम कहे गस्थ आश्रम है तो भटकनी तो होती है। अब इसके आगे प्रसंग चलता है। अब वशिष्ठ जी आ गए। वशिष्ठ जी ने जब देखा भरत बहुत व्याकुल है, दुखी है, अशांत है कि पिता चले गए हैं तो
[1:10:57] भरत जी वशिष्ठ जी भरत जी को एक मार्गदर्शक प्रसंग कहते हैं। निसारे खल संसारे वियोगो ज्ञानी नाम यदा भवे वैराग्य हेतु स शांति सौख्यम तनोति च निसार संसार में हम तो संसार को तो बिल्कुल सत्य मानते हैं। जमीन कोठियां ये जायदाद वो जायदाद इसको ही सत्य मान रहे हैं। ये तो कहां साथ जाने वाली है? निसारे खलु संसारे यदि किसी योगी को साधक को किसी
[1:11:42] का वियोग हो जाए सदा के लिए वियोग हो जाए किसी का मरण हो जाए तो क्या है यदि कोई अच्छा साधक है तो जो वियोग होता है मृत्यु काल का जैसे भवे वैराग्य हेतु सा शांति सौख्यम तनो चा वो वैराग्य का कारण बन जाएगा। है ना? किसी का पूरा और वो वैराग्य के कारण से क्या है? शांति मिलेगी। सुख परमात्मा की प्राप्ति के रास्ते पर वो और आगे बढ़ेगा और आगे बढ़ता चला जाएगा। तो हम देख ले कि सचमुच भगवान की प्राप्ति करना
[1:12:28] चाहते हैं कि नहीं। यह वियोग तो लंबी करता नहीं करेंगे इस विषय में प्राणियों का वियोग संबंधियों का वियोग तो होता ही रहता है। यदि हम वियोग के समय में हाय क्या हो गया ये हो गया वो हो गया तो मोह के कारण है। परमात्मा के साथ प्यार नहीं है। यदि आ भी गया कुछ मोह हो गया ऐसे हो गया है। कष्ट हो भी गया है तो ये सोचे कि मैंने भी तो जाना है। मैंने कौन सा बैठे रहना है? युधिष्ठिर से एक प्रसंग उसमें आता है। उन्होंने पूछा कि
[1:13:14] प्रश्न दुनिया में आश्चर्य क्या है? सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? निसारे खलु संसारे यह जाते हैं सब अशेषती किचता परम ये आश्चर्य है संसार में ऐसे सब छोड़कर जा रहे हैं। आश्चर्य यही है कि हमने यही बने रहना है। तब योग काल में तो वैराग्य यदि पैदा हो जाए तो हम भगवान के भक्त कहलाने के हकदार बन जाते हैं। हमें अंदर का रास्ता अब योग क्या कोई धर्मान का भी हो जाए उस समय भी वैराग्य यदि हो जाए
[1:14:00] तो हम सचमुच भगवान के भक्त बनेंगे जो प्रारब्ध में वो तो होते ही रहना सब कुछ मिलते ही रहना है तो खैर इस प्रकार भरत जी को शांति मिली फिर थोड़े दिन के बाद वशिष्ठ जी आ गए और भी पुरोहित लोग आ गए कहते जी दशरथ जी की आज्ञा थी कि आपको राजतिलक देना है तो उनकी आज्ञा तो पालन करना चाहिए तो आप राजतिलक में करता हूं आप राजा बन जाइएगा तो भरत जी फिर वही कर राजा तो भगवान ही है मैं राजा नहीं कर सकता मैं राज्य धारण नहीं कर सकता हूं तो बिल्कुल साफ मना कर दिया
[1:14:46] मैं जंगलों में जाऊंगा तो अकेला चाहे साथ किसने चलना है चलो मैं वहां वहां पर राम का राज तिलक करेगा। वशिष्ठ जी भी साथ चले और वहां पर राज कर वहीं पर तिलक करेंगे और उनको वापस अयोध्या ले आएंगे। भरत जी ने तो यही सीधा कह दिया। अब संक्षेप में आगे करते हैं। फिर यहां पर उस समय राम लक्ष्मण थे पंचवटी में तो वहां जाने की तैयारियां कर दी। माताएं कहती हम भी जाएंगे। अयोध्या आदिवासी कहते हम भी जाएंगे। इस प्रकार जो चल नहीं सकते थे उनके लिए रथ घोड़े आदि का हाथ रथों का बंदोबस्त किया
[1:15:34] गया तो सारा लश्कर चला। पहले वो भरत जी केवट ने 500 नौकाएं लाई। चलो हम चलते हैं गंगा पार करके। उसके बाद भरद्वाज जी के पास गए वाल्मीकि के आश्रम में। जहांजहां जिस रास्ते से राम जी गए थे उसी रास्ते पर चलते हुए आगे वहां पर वह चित्रकूट में पहुंच गए जहां पर राम जी डेरा डाले हुए थे और आगे तो फिर जहांजहां चरण चिन्ह भगवान के राम के पड़े थे वो लोटपोट होते हुए आगे से आगे चलते गए और वहां पर पहुंच गए और दंडवत प्रणाम किया राम जी के चरणों में भरत ने माताओं को नमस्कार किया राम
[1:16:20] लक्ष्मण लक्ष्मण ने सीता ने और इस प्रकार सभी बैठ गए और जब राम जी को पता लगा कि दशरथ ने शरीर छोड़ दिया है तो उनका वो जैसी कर्म होता है वो किया गंगा जम में जाकर और उस दिन सब ने उपवास रखा अगले दिन फिर आपस में वार्ता शुरू हो गई चर्चा क्या चली वशिष्ठ जी भी आ गए हैं। सब कुछ आ गए हैं। भरत जी कहते हैं हम यहीं पर आपका राजतिलक कर देंगे। आपको ही राजा बनाएंगे और आप फिर हमारे साथ अयोध्या चलना। तो राम जी का तो सीधा सा उत्तर था।
[1:17:08] यह दशरथ की जो वचन प्रतिज्ञा थी उसके उलट मैं नहीं जा सकता। उनकी जो प्रतिज्ञा थी उनको हम भंग नहीं कर सकते हैं। तो भरत जी कहते हैं तो मैं यही आपके साथ ही रहूंगा। जंगलों में ही यह बलकल वेश आदि रखकर जैसे आप रह रहे हैं मैं यहीं पर आपके साथ रहूंगा। आपकी सेवा में क्या रहूंगा? तो राम जी का तो वही वाक्य राम भरत दशरथ पिता की आज्ञा तो फिर भी भंग हो गई। उन्होंने तो आपको राज तिलक
[1:17:55] राजा बनाएगा वचन दिया है तो वचन भंग तो तब भी हो गया। दोनों हालतों में वचन भंग है। आप यदि यहां रहे तो भी भंग। मैं वहां जा तो भी भंग वचन है। तो वशिष्ठ जी ने भरत जी को एक तरफ कहा आप मानते हो राम भगवान है कहते हां वह तो मैं मानता हूं तो एक बात आप भूल रहे हो वशिष्ठ जी ने भरत को कहा कि राम का अवतार हुआ है किस लिए हुआ है उसको याद करो राम ने अवतार लिया है कि मैंने असुरों का संहार करना है अधर्म धर्म का
[1:18:42] नाश करना है। धर्म की स्थापना करनी है। लेकिन धर्म की स्थापना के साथसाथ उससे भी पहले असुरों का संहार तो हो जाए। तो उस वास्ते ये जंगलों में आए हैं। तो भरत जी को भी ठीक है अभी। जैसे प्रभु की इच्छा वैसे ही करते हैं। मुझे जाना पड़ेगा तो कोई बात नहीं। लेकिन मैं अयोध्या के राजतिलक पर नहीं बैठूंगा। राज कार्य सारे कार्य करूंगा। लेकिन जैसे राम जंगलों में रहे रहते हैं वैसे ही मैं वहां पर भी रहूंगा।
[1:19:30] इसके लिए मुझे एक सहारा चाहिए। राम जी मुझे अपनी चरण पादुका दे दे। वो मैं सिंहासन पर रखूंगा और उनसे जो कुछ भी होगा निवेदन करूंगा। यह समस्या आ रही है आ रही है और जो आवाज आएगी अंदर से बाहर से उसके अनुसार मैं राज शासन करूंगा। लेकिन अयोध्या में नहीं अयोध्या के बाहर नंदी ग्राम वहां पर मैं रहूंगा। कंद मूल फल खाऊंगा। सेवा सारी करूंगा। जैसे राम जी यहां जमीन पर सोते हैं वैसे मैं भी वहां पर सोऊंगा। खाना पीना भी वैसे ही है
[1:20:16] और सारी जिम्मेवारी भी निभा रहे हैं। यह भरत जी ने फिर ऐसा कहा। अब यहां पर वो तुलसीदास जी ने बात लिखी है। भरत सरस को जग माही जग जप राम राम जप ते भरत सरस के समान ऐसा कौन होगा? सारा संसार तो राम का जप करता है। और राम जी भरत का जाप करते हैं। यहां हनुमान चालीसा में जैसे भरत मुझे प्रिय
[1:21:03] हैं। हनुमान जी ऐसे ही आप प्रिय हो। सुग्रीव के प्रसंग में आता है। हे सुग्रीव जैसे राम प्रिय हैं ऐसे ही मुझे भी तुम ही प्रिय हो और लक्ष्मण तो खैर उनके अंग संग ही हैं। लक्ष्मण तो शेष के अवतार हैं उसके आधा उसके ऊपर ही तो बैठे हैं राम। तो इस प्रकार का प्रसंग हुआ और फिर वो भरत जी माताओं को साथ लेकर चले गए। जाने की तैयारी है। इधर कैकई भी साथ आ गई थी। कैकई को भी समझ में आ गया कि राम जी का वनवास ग्रहण करना कोई एक अलौकिक दिव्य
[1:21:52] प्रयोजन था। देवताओं की ब्रह्मा आदि की योजना ही थी। पहले से बनी हुई थी। तो राम जी ने उसको पास बुलाया। कैकई को बुलाया। आप तो मेरे बहुत नजदीक हो। कैकई को बड़े प्यार से, बड़े मान से रखा कि आपको ही निमित्त बनाकर ब्रह्मा सरस्वती ने मुझे जंगलों में आने का रास्ता खुलवाया है और अपनी निंदा भी स्वीकार करी आपने। अपमान भी स्वीकार किया कैकई ने माता ने आपने और फिर भी जो देवी योजना थी उसमें आप मददगार बनी हैं।
[1:22:39] तो कैकई की महिमा विशेष प्रकट होती है। निंदा सहकर भी राम काज के लिए कदम आगे बढ़ाए हैं। देवी शक्तियों ने उनको माध्यम बनाया। कि यह दशरथ की बहुत प्रिय है। राम की बहुत प्रिय हैं। और उन्होंने सब सहा और जब उनको यह बोध हो गया ये करण है। तो कैकई की आंखों में भी आंसू राम जी की आंखों में भी आंसू और सभी भक्ति रस में सराबोर होकर यह कैकई आदि सारे उनको आगे करके वह अयोध्या पहुंचे
[1:23:28] भरत जी नंदी ग्राम में पहुंच गए और वहां पर उन्होंने तप करना शुरू किया। खाना पीना ज्यादा कुछ है ही नहीं है। तप शरीर उनका क्षीण होता जा रहा है। लेकिन तेज प्रेम का रस पान करते करते शक्ति कम नहीं हो रही है। तो यहां पर भरत जी चले गए। थोड़ा सा प्रसंग और ले लेते हैं। तो आगे से आगे कथा चलती गई। उसके बाद भरत, लक्ष्मण, सीता ऋषियों के आश्रमों में जाते हैं।
[1:24:16] ये अत्री मुनि अनुसूया के यह शायद बात हो गई है। उनके आश्रम में गए और फिर और आगे चलते चलते और आगे बढ़ते बढ़ते अगस्त मुनि के आश्रम में पहुंचे। अगस्त मुनि के एक शिष्य थे सुतीक्षण बहुत बुरे भक्त थे उनको खबर हुई कि राम जी आ रहे हैं लक्ष्मण सीता आ रहे हैं तो सबसे दौड़ते हुए हो गए इधर राम जी आ रहे हैं दौड़ते हुए गए इतने मस्त हो गए उनको रास्ता ही भूल गया दौड़ रहे हैं कभी
[1:25:02] इधर चक्कर काटते गोला करके काटते हैं। कभी खड़े हो जाते हैं, कभी पीछे भागते, कभी आगे भागते हैं। रास्ता मिल ही नहीं रहा। और राम जी को पता लग गया था वो वृक्ष की ओठ में खड़े हैं। सुदीक्षण की प्रेम विबला दशा देखकर भरत जी भी राम जी भी आनंदित हुए तो उन्होंने उसके हृदय में अपने आप को प्रकट कर दिया। सुिक्षण के हृदय में राम प्रकट हो गए। अब वह तो वही मग्न हो गए। वहीं पर समाधि लग गई। आगे पीछे जा ही नहीं रहे हैं। तो राम जी और आगे आए। जरा उसको हिलाया।
[1:25:50] समाधि खुल नहीं रही है। तो राम जी ने क्या कहा? जो उनके सुतीक्षण के हृदय में स्वयं बैठे थे वो रूप हटा लिया वो दिखाई नहीं दे रहा राम जी नहीं दिखाई दे रहे हृदय में एकदम व्याकल हुए आंखें खुली बाहर देखते हैं राम जी स्वयं खड़े हैं लक्ष्मण सीता स्वयं खड़े हैं और ज्यादा पहले तो सूक्ष्म में ही था हृदय में ही था अब इंद्रियों से भी कारण सुख सूक्ष्म शरीर और इंद्रिय छिद्र सब जगह राम ही राम उनको दिखाई दे रहे हैं। लक्ष्मण सीता उनके दर्शन हो रहे हैं तो भाव में भर गए। बहुत ही व्याकुल बहुत ही
[1:26:37] आनंदित हुए और राम जी ने कहा बोलो वर मांगो क्या चाहता हूं। मैंने कहते वर की तो कोई बात कभी सोची नहीं। आपसे क्या मांगना आप सब जानते हो वह यही है कि मुझे मुक्ति नहीं चाहिए केवल्य मुक्ति मुझे नहीं चाहिए बस भक्ति का ही वरदान दीजिएगा आप मेरे अंग संग रहो यह ज्ञान के बाद की भक्ति है अज्ञान निवत्ति के बाद की भक्ति है वो भक्ति का वर मांगा तो वह वरदान मिल गया और उन्होंने क्या किया चिता बनाई उसके ऊपर बैठ गए और अंदर ही ध्यान अंदर ही
[1:27:27] ध्यान करते करते जो बाहर के इंद्र छिद्र तो सारे अंदर उलट चुके थे स्थूल शरीर भी रहा जैसे नहीं था अयोग अग्नि प्रचंड हुई उस योग अग्नि में ही उनका सारा शरीर अग्नि में हो गया और वह शरीर छोड़कर साकेत धाम में चले गए। इस प्रकार यह सुतीक्षण की कथा है। इसी प्रकार का प्रसंग एक और ऋषि हुए हैं। शरभंग ऋषि। वो कुटिया बनाकर ऐसे ऐसे तपस्वी जंगलों में तप किया करते थे। शरभंग ऋषि तप कर रहे हैं। वहां पर भी राम लक्ष्मण सीता पहुंच
[1:28:14] गए। उनकी भी वही भक्ति थी जैसे सुतीक्षण की थी और वहां पर वह पहुंच गए और सरभंग ऋषि तो आनंदित बहुत मस्त हो गए और खूब प्रणाम किया नमस्कार किया ऐसे ऐसे ऐसे करते करते वरदान मांगा कहते हमें वरदान भक्ति सी चाहिए हमें मुक्ति नहीं चाहिए लेकिन यह जो भक्ति है मुक्ति के बाद की मुक्ति है भक्ति है अज्ञान खत्म हुआ। राम और सरभंग का देवताओं और श्रभंग का मिलन भी हुआ। यह अद्वैत में ही भाव की प्यार की भक्ति है।
[1:29:07] जो मोह पूर्वक द्वैत होता है वह तो अलग चीज है। लेकिन द्वैत होने के बाद जो द्वैत होता है वह अद्वैत से भी अद्वैता सुंदरम। तो ऐसी भक्ति इनको सुरभंग ऋषि को भी मिली और इसके द्वारा फिर वह और गहरे गहरे रास्ता चलते गए। थोड़ा सा प्रसंग और लेंगे। इसके बाद राम जी सुतीक्षण के गुरु जो अगस्त ऋषि थे उनके आश्रम में पहुंच गए। वहां पर जाकर ये अगस्त ऋषि वो तो महर्षि थे ही। उनको तो सब पता था क्या होने वाला
[1:29:54] है क्या हो चुका है कैसे होना है यह सब उनको पता था और वहां पर जाकर राम लक्ष्मण सीता ने खूब दंडवत प्रणाम किया अगस्त जी के चरणों में ऋषि पद था तो वहां पर फिर अगस्त जी ने उनकी खूब स्तुति की खूब वंदना की ऐसे ऐसे किए उनको पता था ये रावण आदि असुरों का वध करने के लिए आए हैं। तो कहते हैं बहुत समय पहले बहुत युग पहले इंद्र ने मुझे एक धनुष दिया था कि यह राम जी को देना है। मेरी सेवा लगी हुई थी। तो वह
[1:30:42] दिव्य धनुष अगस्त जी ने राम जी को दे दिया और साथ ही साथ दो तरकश जिसमें बाण कभी खत्म ही नहीं होते थे। अक्षय तरकश एक रत्न जाते खड़क भी थी। किसके यह जो आयु है इंद्र ने भिजवाए हैं। यह रावण के संहार में आपकी मदद करेंगे। तो इस प्रकार वंदना करके आपका पथ आगे बढ़ेगा। आप चलो ऐसे ऐसे ऐसे इसी प्रसंग में आता है जब युद्ध होने वाला था राम जी ने नौ रात्रि पहले युद्ध से पहले वो शक्ति की उपासना भी की। इसका निर्देश भी अगस्त जी ने दिया लोक प्रदर्शन के लिए।
[1:31:31] तो इस प्रकार कथा चलती रही। थोड़ा सा और ले सकते हैं अभी ज्यादा। चलो राम राम थोड़ी चर्चा कर लेते हैं पहले।
[1:34:41] आगे थोड़ा और प्रसंग चलता है थोड़ा संक्षेप में करते जाते हैं। कुछ छूट जाए तो कोई बात नहीं। और वहां पर एक यह कदम जो नया अध्याय आने वाला है दंडकार कारण में खर दूषण और सुरपखा रहती थी। विरा आदि हुए उसको हमने छोड़ दिया है तो दंडकारण्य में सूप नखा रहती थी तो राम जी दंडकारण्य सारा वही क्षेत्र था वहां पर पहुंच गए देवता सारे मुनियों ने कहा वहां आप जा सकते हैं और नीचे तो सीधे-सीधे
[1:35:28] आश्रम भी थे बहुत बढ़िया बढ़िया कोई कदा कष्ट नहीं था दंडकारण में शेर चीते बाघ आदि सब रहते थे और वहां पर असुरों का राज्य था। असुरों का बाल्य था। तो वहां पर जाकर उन्होंने देखा राम जी ने देखा हड्डियां पड़ी हुई है। मुनि तो वही भी रहते थे। शुरू में मुनियों का वास ही वहां पर था। ज्यादा मुनि ही रहते थे। असर तो बाद में आए रावण की आज्ञा से। तो वहां पर देखते हैं हड्डियों का ढेर पड़ा हुआ है। तो यह कहते यह क्या हड्डियां है? और मुनियों से पूछा कहते यह
[1:36:14] तपस्वी साधक जो यहां पर तप किया करते थे। उनका संहार राक्षसों ने किया। भाग जाओ यहां से। लेकिन वह अपने तप में विघ्न तप में डामाडोल नहीं हुए। तप का व्रत नहीं तोड़ा, अहिंसा का व्रत नहीं तोड़ा, किसी को श्राप नहीं दिया, श्राप देने में, समर्थ होते हुए भी तपस्या करते ही रहे। पीछे नहीं हटे। तो ऐसे तप सिद्ध जो तपरत जो मुनि जन थे उनको राक्षसों ने उनका संघार कर दिया। उनकी हड्डियां पड़ी है। तो राम जी को भाव हुआ। हाथ उठाकर वह प्रतिज्ञा करते हैं
[1:37:00] निश्चर हीन करो मोह सारी निश्चय हीन सारी जो धरा पृथ्वी है मैं निशाचरों के हीन उनको नष्ट कर दूंगा बिल्कुल निशाचरों का खात्मा करूंगा इस प्रकार से प्रतिज्ञा करके आगे बढ़े और वहां पर एक जगह देख के थोड़ा सा उन्होंने कहा अच्छा हम यहां कुटिया बनाकर रहेंगे तो लक्ष्मण जी की सेवा थी कुटिया बनाने की। उन्होंने राम जी ने कहा यहां कुटिया बना लीजिएगा। तो राम जी ने माता सीता और भरत के लिए एक बहुत सुंदर जैसी भी वहां संभलता घास फूस की ऐसे ऐसे कुटिया बना दी। यज्ञा आदि के
[1:37:47] लिए वह भी बना दिया। जल की व्यवस्था जगह ही ऐसी चुनी कि वह पानी ऐसे गोलाकार वहां पर घूमता रहता था। फिर राम जी ने भरत जी को कहा अब आप भी अपने लिए जहां ठीक है जगह बना लो कुटिया बना लो। राम जी ने यही कहा अब अपने लिए जहां आपको ठीक है वहां अपना घर बना लो। कुटिया बना लो। तो राम जी तो रो लक्ष्मण जी तो रो पड़े। कहते यह कैसे संभव हो सकता है? मेरी मर्जी ही क्या है? मैं तो आपका आज्ञाकारी अनुचर हूं। मैं अपनी मर्जी से कहां कुटिया बनाऊं? मेरी मर्जी तो आपके चरणों में है। आपके इशारे में है। आप इशारा करें मैं वही
[1:38:35] करूंगा। तो भरत तो बहुत उदास हुए कि राम जी मुझे कह रहे मनमर्जी कर लो। तो फिर राम जी ने मुस्कुराते हुए कहा अच्छा इस जगह पर बना पास ही उनकी भी जगह निश्चित कर दी वहां पर लक्ष्मण जी ने कुटिया बनाई जैसे कि उनकी नजर राम जी की कुटिया पर पड़ती रहे कोई जानवर ना आए कोई अतिथि आ जाए कोई मुनि आ जाए वह सारी मुझे सूचना मिलती रहे द्वार प्रेरित बन गए तो वहां पर रहते हुए कुछ समय उनको हो गया और उस दंडकारण्य में जिनका साम्राज्य था
[1:39:20] वह कौन थे खर दूषण और शूर प्रणखा उनकी चलती थी सारी मुनियों पर शासन चलता था तो एक बार वो शरपणाखा दूस उसके भाई थे सुरखा घूमते फिरती हुई राम जी के निवास की तरफ गई। वहां पर उसने राम जी को देख लिया। राम जी को देखते ही सार वो तो बिल्कुल व्याकुल हो गई। काम का आवेश ऐसे बढ़ गया कि बस यही मेरे पति होने चाहिए। शूरपणका के मन में ये ज्वाला उठ खड़ी हुई। राम जी
[1:40:05] को ही मैं पति बनाऊंगी। तो वहां पर गई मैं ऐसे काम रूपणी शूरपखा हूं मेरा नाम है और मैं चाहती हूं आप मेरे पति बने मेरे संग रहे यहां जंगलों में क्या रखा है और जगह-जगह जाएंगे सुंदर लोकों में जाएंगे यहां पर जाएंगे मेरा भाई ऐसे ऐसे है सचना ऐश्वर्य है सब सब सब सुख साधन तो राम जी कहने लगे देखो भाई मेरी पत्नी है सीता। आप देख रहे हो मैं सीता को छोड़कर कैसे करूंगा कि यदि तू मेरी पत्नी बन गई तो ये सीता की सेवा करनी पड़ेगी।
[1:40:52] अच्छा अब मेरा भाई अभी को आ रहा है उसके पास चली जा। तो लक्ष्मण के पास चली गई। इधर से उधर चली गई और लक्ष्मण को कहते हैं कि आप भी बहुत सुंदर हो। बहुत गौर वर्ण हो। है ना? मुझे अपनी पत्नी बना लो। तो लक्ष्मण जी ने क्या जवाब दिया? मैं तो राम जी का दास हूं। उनकी सेवा करता हूं। यदि मुझसे तुम विवाह करोगे, तुझे तो राम सीता दोनों की दासी बनना पड़ेगा। वो कहते ऐसे कैसे हो सकता है? कभी राम के पास जाती कभी सीता उधर लक्ष्मण के पास जाती है। कोई बात नहीं बन रही। फिर उसको
[1:41:38] एकदम बहुत गुस्सा आ गया। क्रोध आ गया। कहते सीता ही सब प्रसाद की जड़ है। भयानक रूप धरा उसने। मुंह करा मैं सीता को ही खा जाऊंगी। इस प्रकार भयंकर का रूप करके जैसे वो सीता की दौड़ी लक्ष्मण ने उसके नाक कान काट दिए। कुरूप कर दिया और वह चीखें चिल्लाती हुई रोती हुई दौड़ी गई मैं तुम्हारा संहार कर दूंगा तो खरद दूषण उसके भाई थे वहां चली गई खरदूषण को कहा तुम्हारे रहते हुए मेरी यह हालत हो गई यहां पर राम लक्ष्मण आए हैं उनकी एक नारी है बहुत सुंदर है उन्होंने मेरी यह हालत कर दी है तुम भी तुम भी उनसे
[1:42:26] बदला बदला नहीं लोगे उनको मारोगे नहीं मैं मर जाऊंगी मैं प्राण त्याग दूंगी तो खरदूषण कहते कोई चिंता ना कर हम अभी चलते हैं मनुष्य ही तो हैं राजकुमार तो हैं उनको क्या पता होता है हम अभी उनका संार करते हैं तो सेनाओं को सजाया खरदूषण ने कहते हमारी जाने की हम तो पीछे रहेंगे यह सेना ही हमारी उनका वध कर देगी तो वहां पर खरदूषण की सेना खूब ललकारे मारते हुए चिल्लाते हुए सारे अस्त्र शस्त्र खड़ा पद्म धनुष आदि लेते हुए वो राम लक्ष्मण सीता जहां पर थे वहां पहुंच गए और हमला बोल दिया तो राम जी कहते हैं लक्ष्मण को आप सीता जी के पास रहो चिंता मत करो
[1:43:15] और वहां पर इतने समीप आ गए थे वो शस्त्रधारी कि थोड़ा सा दो कदम पीछे हटे बाण चढ़ाने के लिए और बाणों पर बाणों की इतनी वर्षा की कि सारी सेना का संहार हो गया। अब खरदूषण अच्छा ऐसा हो गया फिर तो जरा हम मुकाबला करेंगे। हमारे बारे में तो बराबर तो कोई ठहर नहीं सकता। तो खरदूषण आगे आ गए और वहां पर देखते हैं राम वो तो अलौकिक है ही। भरत का स्वरूप भी बहुत आकर्षण है और सीता पर नजर पड़ी वो व्याकुल हो गए करदूषण। तो कहते हैं आप राजकुमार हो। हम आपका संघार करने के लिए आए हैं। आए थे लेकिन हम
[1:44:02] आपको छोड़ देंगे। आपको मारेंगे नहीं। बस यह करो सीता को हमारे साथ भेज दो। इसको लेकर हम कहीं भी चले जाएं। आप अपने जो मर्जी करो। अब राम जी ने सोचा यह क्या कर रहे हैं? तो यह उन्होंने कहा यह तो संभव ही नहीं है। यह तो मेरी शक्ति है, पत्नी है। यह मेरा भाई है। हमें मारे बगैर आप आगे सीता को ले ही नहीं जा सकते।
[1:53:01] अब आंखें बिल्कुल ऐसे जोर से नहीं बंद करनी। आराम से आंखें बंद करो। थोड़ा ऊपर देखो आंखों को अंदर। बाहर से हल्की सी पलकें बंद और यह ऊपर को पलकें उठी हुई। नीचे को पलकें चढ़ी हुई और अपने शरीर को देखिएगा ऊपर नीचे दाएं बाएं। यदि पलकें बंद चाहे हैं लेकिन बाहर की ओर भी पूरी खुली है और अंदर की ओर भी आंखें पूरी खुली है। आंखें ऐसे बंद पलकें नहीं पलकें नहीं देखे खुले लेकिन पलकें पूरी ऊपर की ओर चढ़ी हुई
[1:53:47] ऊपरी पलक और निचली पलक नीचे की ओर खुली हुई और जब आंख अंदर की ओर पलकें खुली ऊपर नीचे तो आंख भी अंदर की ओर ऊपर नीचे बाहर से बंद है। और मन ही मन जब पलकें बाहर नहीं देख रही है। मन ही तो आंखों के द्वारा देखता है और बाहर कुछ नहीं देखना है। पलकें बंद है। मानी ही मान ऐसी पलकें ऊपर चढ़ी, नीचे पड़ी, दाएं बाएं सब खुली हैं। पलकें बंद हैं। अपने मस्तक को देखकर नाम लेते चले जाएंगे। अपने बालों का अनुभव करें।
[1:54:33] दाई आंख बाई आंख दाया कान बाया कान दाया नासा छिद्र बाया नासा छिद्र मुख जि्हा सारे दांत नजर डालें गला कंठ गले के नीचे का हिस्सा दाहिना कंधा बाया बाया कंधा कोनी तक देखें दाई ओर कलाई तक देखें दाई ओर पांचों उंगलियों को देखें फिर बाया कंधा कोहनी तक
[1:55:20] बाई कलाई सारी उंगलियों को मन ही मन देखें ये मेरी उंगलियां है ये सारा शरीर है और हृदय को देखें छाती को देखें नाभि को देखें मूलाधार जहां रीड की हड्डी खत्म होती है और वहां से जंघाओं दाई जंघा बाई जंघा दाया पैर घुटने से नीचे बाया पैर पैर की उंगलियां दाएं पैर की अंगूठा और फिर सारी धीरे धीरे धीरे करके सारी उंगलियां बाएं पैर का अंगूठा
[1:56:07] और सारी उंगलियां पैर का निचला हिस्सा देखें। दोनों पैरों का निचला हिस्सा देखें। और वह निचला हिस्सा जैसे आगे की ओर फैलता ही जा रहा है। आल तक सिरे तक और मस्तक को देखें ऊपर छत तक मन फैलता चला जा रहा है। शरीर में रहते हुए सारा शरीर अनुभव में आए और सारा शरीर यह सारी चेतना एक शरीर को केंद्र बन के मस्तक और पैरों को सारे हाल में विराजित है। दूसरा कोई नहीं है।
[1:56:57] मैं ही मैं हूं सारे हाल में। उससे भी परे सारे विश्व में मैं हूं। सारे डेरे में मैं हूं। सारे विश्व में मैं ही मैं हूं। मन ही मन यह धारणा करें। शरीर को केंद्र बनाकर। अपने पिंड को केंद्र बनाकर। जो ब्रह्मांडे सोई पिंड इसको खोज करो अंदर। अंदर बाहर सब वही है। इस प्रकार शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दे। स्थूल शरीर में कोई चेतना नहीं है। शरीर स्थूल की कोई होश नहीं है। अकड़ाव सारा बैठे-बैठे ही जैसे हमें पता लगे हमारा शरीर सो गया है।
[1:57:46] हमारा शरीर सो गया है। इसका हमें पता लगता रहे। नहीं तो नी में तो पता ही नहीं लगता कुछ भी। तो हम सो गए हैं। शरीर सो गया है और मैं देख रहा हूं मेरा सारा शरीर सो गया। अनुभव कर रहा हूं। और इस सोए हुए शरीर को आसन बना लें। कुशासन आदि तो नीचे जमीन पर ही होते हैं। यह शरीर ही आसन बना है। नीचे भी है, ऊपर भी, दाएं बाएं भी है। अब इसके अंदर प्रवेश कर जाएं। अंदर ऊपर ही देख रहे थे। अब अपनी सारी
[1:58:34] चेतना अंदर शरीर के अंदर ऊपर नीचे सब जगह श्वास चलता है। जैसे भी चलता है चलने दे। पता लगता रहे श्वास चल रहा है। जैसे बाहर आ ही नहीं रहा है श्वास। और ऐसी स्थिति में मंत्र का उच्चारण नहीं करना है। केवल मंत्र को सुनना है। मन ही मन मंत्र का उच्चारण और मन ही मन उसको सुनते चले जाएं। कोई जीभ नहीं हिले, कोई आंखें नहीं हिले, कोई शरीर नहीं हिले, हाथ नहीं हिले। मन तो सारे शरीर में ही होता है भाई।
[1:59:21] तो मन ही मन मंत्र का उच्चारण करें। यदि एक जगह नहीं तो धीरे-धीरे सारे शरीर में फैल जाए। मन ही मन मंत्र का उच्चारण करते चले जाएं। मन ही मन सुनते चले जाएं। सारे शरीर से यदि मंत्र का उच्चारण कर रहा है। सारे शरीर से सुने। यदि गले या हृदय आदि में कहीं से उच्चारण हो रहा है तो वहीं से सुने और सुनते सुनते ऐसा महसूस करें कि मंत्र सारे शरीर में व्याप्त हो रहा है।
[2:00:08] मान लो बुराइयां गुरु शब्द ये मन हो। यदि मन में कोई दूसरा पुरना आ भी गया, अनजाने आ भी गया तो सावधानी कोई चिंता नहीं करें। कोई घबराए नहीं। बिल्कुल नहीं सोचे कि मेरा मन भटक गया है। बिल्कुल नहीं सोचना। जैसे यदि मन गया भी है तत्काल उसी क्षण उसको शरीर के अंदर ले जाए। चाहे बार-बार अंदर जाना पड़े कोई निराश नाना कोई उपराह नहीं बस मंत्र को सुनते चले जाएं ओ रुके मां रुके इस प्रकार रुक रुक कर
[2:00:57] अपने सारे मंत्र के अक्षर एक एक बीच में एक शून्य विश्राम देते हुए और गहरे और गहरे और आगे और ऊपर और नीचे।
[2:01:50] यदि कर सकते हैं श्वास पूरा भरे और आराम से रोक ले। शरीर को अकड़ाना नहीं है। शरीर बिल्कुल शव की तरह रहे श्वास भरे और सहज भाव से रोक ले जितनी देर तक रोक सकते हैं। फिर आराम से श्वास ना भरना रोकना अपने आप जहां जाता चला जाए। रोम रोम। बाहर से शरीर जरा भी कंपित ना हो बिल्कुल शव की तरह लेकिन अंदर जो मंत्र के कंपन है वो तरंगे उठाए उछाले कूदे नाचे सारे शरीर में अंदर
[2:02:39] से कंपन शुरू है सूक्ष्म शरीर में प्राणों के कंपन मंत्र के कंपन चाहे जितने मर्जी तेजी से हो और सूक्ष्म शरीर में इतने कंपन कि स्थूल भी नृत्य जैसा करना लग पड़े। अपने आप करना नहीं है। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर सारा कारण शरीर सब मंत्र के स्पंदनों से नृत्य करने लग जाए।
[2:03:29] हां फिर देखिए शरीर यदि श्वास रोक सकते हैं रोक कर सारा शरीर कांप उठे श्वास रुका हुआ है अंदर ही अंदर प्राण अंदर ही अंदर है बाहर से श्वास रुका हुआ है और जैसे सारा शरीर नाच रहा है नृत्य कर रहा है। कंपन पैदा करें शरीर के अंदर सूक्ष्म है। मंत्र का उच्चारण गाते हुए करें। नाचते हुए करें।
[2:04:25] अब बिल्कुल थोड़ा सा समय है। लाल सीधी करनी है तो सीधे कर ले, टेढ़ी कर ले, दाएं बाएं हो जाए। जैसी भी इच्छा है वैसा हो जाए। शस को थोड़ा रोक सकते तो रोके लेकिन रोकने के द्वारा शरीर को अकड़ाना नहीं है। आराम से रोके जैसे बच्चा श्वास भरता है। तो बस अब विश्राम की ओर आते हैं।
[2:05:52] दोनों हाथ ऊपर भी कर ले जैसे लेते हुए थोड़ा फिर जाप कर सकते लेते हुए नाचते हुए राम राम कहीं जे अंगड़ाई ना पाप पुंज समाई शरीर को नचाएं